आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंको देख लेना चाहिए। यह सोचकर महेंद्र घोड़े पर चढ़कर धीरे-धीरे टीले पर चढ़ने लगे। अभी तक टीले पर आधा ही चढ़े थे, कि उनकी संतान-सेना मे एक युवक वैष्णव आ पहुंचा। उसने संतानो से कहा-"चलो, टीले पर चढ़ चले।" उसके समीप जो सैनिक खड़े थे, उन्होने पूछा-"क्यो?" यह सुनकर वह योद्धा एक छोटी चट्टान पर खड़ा हो गया, उसने ललकारकर कहा-"आओ, वीरो ! आज इसी टीले पर चढ़कर चांदनी का आनंद और मधुर वन्य पुष्पो का सौरभ-पान करते हुए शत्रुओ से बदला ले....युद्ध करे।" संतानो ने देखा कि यह योद्धा और कोई नही, हमारे सेनापति जीवानंद है। इस पर सारी सेना-"हरे मुरारे!" कहती हुई गगनभेदी जयोल्लास से हुंकार करती हुई, भालो पर बोझा दे उठ खड़ी हुई और जीवानंद के पीछे-पीछे टीले पर चढ़ने लगी। एक ने सजा हुआ घोड़ा जीवानंद को लाकर दिया। दूर से महेंद्र ने जो यह देखा, तो विस्मित हुए। सोचने लगे- यह क्या? बिना कहे ये सब क्यो चले आ रहे है। यह सोचकर महेंद्र ने तुरंत घोड़े का मुंह फिराया और एंड लगाते ही धूल बादल उड़ाते हुए नीचे आए। संतान-वाहिनी के अग्रवर्ती जीवानंद को देखकर उन्होने पूछा-"यह क्या आनंद?" जीवानंद ने हंसकर उत्तर दिया-"आज बड़ा आनंद है। टीले के उस पार एडवर्ड पहुंच गए है। टीले पर जो पहले पहुंचेगा, उसी की जीत होगी।" इसके बाद जीवानंद ने संतान सेना से कहा-"पहचानते हो? मैं जीवानंद हूं। मैने सहस्र-सहस्र शत्रुओ का वध किया है।" तुमुल निनाद से दिगन्त कांप उठा। सैनिको ने एक स्वर से कहा-"पहचानते है, हम अपने सेनापति को पहचानते है।" जीवानंद-"बोलो, हरे मुरारे!" जंगल का कोना-कोना कांप उठा, प्रतिध्वनित हुआ-"हरे मुरारे" जीवानंद-"वीरो ! टीले के उस पार शत्रु है। आज ही इस स्तूप के ऊपर, विमल चांदनी मे संतानो का महार ण होगा। जल्दी चढ़ो- जो पहले चढ़ेगा, उसी की जीत होगी। बोलो-बन्देमातरम्" फिर प्रतिध्वनि हुई-"वन्देमातरम्-" धीरे-धीरे संतान-सेना पर्वत शिखर पर चढ़ने लगी। किंतु उन लोगो ने सहसा देखा कि महेंद्र बड़ी ही तेजी से उतरे चले आ रहे हैं। उतरते हुए महेंद्र ने महानिदान किया। देखते- देखते पर्वत-शिखर पर नीलाकाश मे अंग्रेजो की तोपे आ लगी। उच्च स्वर में वैष्णवी सेना ने गाया- "तुमी विद्या तुमी भक्ति, तभी मां बाहुते शक्ति, त्वं हि प्राणः शरीरे!"... लेकिन इसी समय अंग्रेजो की तोपे गर्जन कर उठी- आग उगलने लगी, उस महानिनाद मे गीत की आवाज गायब हो गई। बार-बार 'गुड़म-गुड़म' करती हुई अंग्रेजो की तोपे गर्जन पर संतान-सेना का नाश करने लगी। खेत मे जैसे फसल काटी जाती है, उसी तरह संतान-सेना कटने लगी। यह ऊपर की भयानक मार संतान-सेना न सह सकी, तुरंत भाग खड़ी हुई- जिसे जिधर राह मिली, वह उधर ही भागा। इस पर "हुर्र, हुर्र" करती हुई ब्रिटिश वाहिनी संतानो का समूल नाश करने के लिए उतरने लगी। संगीने चढ़कर, पर्वत से गिरनेवाली भयंकर शिला की तरह, शिक्षित गोरी फौज संतानो को खदेड़ती हुई तीव्र वेग से उतरने लगी। जीवानंद ने महेंद्र को सामने देखकर कहा-"बस आज अंतिम दिन है। आओ यही मरे।"