भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

साहब-“एक दूसरा आदमी ले जाएगा।” शांति-“गोद मे बैठाकर ले जाएगा? मुझे लज्जा नही है?” साहब-“केया मुस्किल! पान सौ रूपी देगा।” शांति-“कौन जाएगा-तुम खुद जाएगा?” इस पर एडवर्ड ने पास मे खड़े एक युवक अंग्रेज को दिखाकर कहा-“लिंडले, तुम जाओ!” लिंडले ने शांति का रूप-यौवन देखकर कहा-“बड़ी खुशी से!” इसके बाद बड़ा जानदार अरबी घोड़ा सजकर आ गया, लिंडले भी तैयार हो गया। शांति को पकड़कर वह घोड़े पर बैठने चला। शांति ने कहा-“छिः, इतने आदमियो के सामने? क्या मुझे लज्जा नही है? आगे चलो, बाहर चलकर घोड़े पर चढ़ेगे।” लिंडले घोड़े पर चढ़ गया। घोड़ा धीरे-धीरे चला, शांति पीछे-पीछे पैदल चली। इस तरह वे लोग छावनी के बाहर आए। शिविर के बाहर एकांत आने पर शांति लिंडले के पैर पर पांव रखकर एक छलांग मे पीठ पर पहुंच गई। लिंडले ने हंसकर कहा-“तुम तो पक्क घुड़सवार है!” शांति-“हम लोग ऐसे पक्के घुड़सवार है कि तुम्हारे साथ चढ़ने मे लज्जा लगती है। छीः, रकाब के सहारे तुम लोग चढ़ते हो?” मारे शान के लिंडले ने रकाब से पैर निकाल लिया। इसी समय शांति ने पीछे से लिंडले को गला पकड़ कर छक्क दिया। वह तड़ाक से घोड़े पर से गिरा। घोड़ा भी भड़क उठा। फिर क्या था! शांति ने एक एंड लगाई और घोड़ा हवा से बाते करने लगा। शांति चार वर्ष तक सन्तानो के साथ रहकर पक्की घुड़सवार हो गई थी। बिना सीखे क्या जीवानंद का साथ दे सकती थी? लिंडले का पैर टूट गया और वह कराहने लगा। शांति हवा मे उड़ती जाती थी। जिस वन मे जीवानंद छिपे हुए थे, वहां पहुंचकर शांति ने जीवानंद को सारा समाचार सुनाया। जीवानंद ने कहा-“तो मै शीघ्र जाकर महेंद्र को सतर्क करूं। तुम मेले मे जाकर सत्यानंद को खबर दो। तुम घोड़े पर जाओ, ताकि प्रभु शीघ्र समाचार पा सके।” इस तरह दोनो आदमी दो तरफ रवाना हुए। यह कहना व्यर्थ है कि शांति फिर नवीनानंद के रूप मे हो गई। एडवर्ड भी पक्क अंग्रेज जनरल था। छोटी घाटी मे उसके आदमी थे-शीघ्र ही उन्हे खबर मिली कि उस वैष्णवी ने लिंडले को घोड़े से गिराकर स्वयं रास्ता लिया। सुनते ही एडवर्ड ने हुक्म दिया-“टेट उखाड़ो-उस शैतान का पीछा करो!” खटाखट तम्बुओ के खूंटो पर हथौड़े पड़ने लगे। मेघरचित अमरावती की तरह सवार घोड़ो पर और पदातिक पैदल चलने को तैयार हो गए। हिंदू, मुसलमान, मद्रासी, गोरे, बंदूक कंधे पर लिए मच-मच चल पड़े। तापे खच्चरो द्वारा खींची जाकर घर्र-घर्र करती चल पड़ी। इधर महेंद्र संतान-सेना के साथ मेले की तरफ अग्रसर हुए। उसी दिन शाम को महेंद्र ने सोचा अंधेरा हो चला, अब शिविर डलवा देना चाहिए। उसी समय पड़ाव डाल देना ही उचित जान पड़ा। संतानो का शिविर कैसा? पेड़ के तनो से लगकर छाया मे सब चित-पट सो रहे। हरिचरणामृत पान कर डकार ली उन्होने। जो कुछ भूख बाकी थी, स्वप्न मे वैष्णवी के अधर-रस का पान कर उसे पूरा करने लगे। जहां पड़ाव पड़ा था, वहां बहुत सुंदर आम-कानन के पास ही एक बड़ा टीला था। महेंद्र ने सोचा कि इसी टीले पर यदि पड़ाव पड़े तो कितना सुखद हो! मन मे हुआ कि टीले