भारतकोश
संग्रह पर लौटें

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

को देख लेना चाहिए। यह सोचकर महेंद्र घोड़े पर चढ़कर धीरे-धीरे टीले पर चढ़ने लगे। अभी तक टीले पर आधा ही चढ़े थे, कि उनकी संतान-सेना मे एक युवक वैष्णव आ पहुंचा। उसने संतानो से कहा-"चलो, टीले पर चढ़ चले।" उसके समीप जो सैनिक खड़े थे, उन्होने पूछा-"क्यो?" यह सुनकर वह योद्धा एक छोटी चट्टान पर खड़ा हो गया, उसने ललकारकर कहा-"आओ, वीरो ! आज इसी टीले पर चढ़कर चांदनी का आनंद और मधुर वन्य पुष्पो का सौरभ-पान करते हुए शत्रुओ से बदला ले....युद्ध करे।" संतानो ने देखा कि यह योद्धा और कोई नही, हमारे सेनापति जीवानंद है। इस पर सारी सेना-"हरे मुरारे!" कहती हुई गगनभेदी जयोल्लास से हुंकार करती हुई, भालो पर बोझा दे उठ खड़ी हुई और जीवानंद के पीछे-पीछे टीले पर चढ़ने लगी। एक ने सजा हुआ घोड़ा जीवानंद को लाकर दिया। दूर से महेंद्र ने जो यह देखा, तो विस्मित हुए। सोचने लगे- यह क्या? बिना कहे ये सब क्यो चले आ रहे है। यह सोचकर महेंद्र ने तुरंत घोड़े का मुंह फिराया और एंड लगाते ही धूल बादल उड़ाते हुए नीचे आए। संतान-वाहिनी के अग्रवर्ती जीवानंद को देखकर उन्होने पूछा-"यह क्या आनंद?" जीवानंद ने हंसकर उत्तर दिया-"आज बड़ा आनंद है। टीले के उस पार एडवर्ड पहुंच गए है। टीले पर जो पहले पहुंचेगा, उसी की जीत होगी।" इसके बाद जीवानंद ने संतान सेना से कहा-"पहचानते हो? मैं जीवानंद हूं। मैने सहस्र-सहस्र शत्रुओ का वध किया है।" तुमुल निनाद से दिगन्त कांप उठा। सैनिको ने एक स्वर से कहा-"पहचानते है, हम अपने सेनापति को पहचानते है।" जीवानंद-"बोलो, हरे मुरारे!" जंगल का कोना-कोना कांप उठा, प्रतिध्वनित हुआ-"हरे मुरारे" जीवानंद-"वीरो ! टीले के उस पार शत्रु है। आज ही इस स्तूप के ऊपर, विमल चांदनी मे संतानो का महार ण होगा। जल्दी चढ़ो- जो पहले चढ़ेगा, उसी की जीत होगी। बोलो-बन्देमातरम्" फिर प्रतिध्वनि हुई-"वन्देमातरम्-" धीरे-धीरे संतान-सेना पर्वत शिखर पर चढ़ने लगी। किंतु उन लोगो ने सहसा देखा कि महेंद्र बड़ी ही तेजी से उतरे चले आ रहे हैं। उतरते हुए महेंद्र ने महानिदान किया। देखते- देखते पर्वत-शिखर पर नीलाकाश मे अंग्रेजो की तोपे आ लगी। उच्च स्वर में वैष्णवी सेना ने गाया- "तुमी विद्या तुमी भक्ति, तभी मां बाहुते शक्ति, त्वं हि प्राणः शरीरे!"... लेकिन इसी समय अंग्रेजो की तोपे गर्जन कर उठी- आग उगलने लगी, उस महानिनाद मे गीत की आवाज गायब हो गई। बार-बार 'गुड़म-गुड़म' करती हुई अंग्रेजो की तोपे गर्जन पर संतान-सेना का नाश करने लगी। खेत मे जैसे फसल काटी जाती है, उसी तरह संतान-सेना कटने लगी। यह ऊपर की भयानक मार संतान-सेना न सह सकी, तुरंत भाग खड़ी हुई- जिसे जिधर राह मिली, वह उधर ही भागा। इस पर "हुर्र, हुर्र" करती हुई ब्रिटिश वाहिनी संतानो का समूल नाश करने के लिए उतरने लगी। संगीने चढ़कर, पर्वत से गिरनेवाली भयंकर शिला की तरह, शिक्षित गोरी फौज संतानो को खदेड़ती हुई तीव्र वेग से उतरने लगी। जीवानंद ने महेंद्र को सामने देखकर कहा-"बस आज अंतिम दिन है। आओ यही मरे।"

महेन्द्र ने कहा-“मरने से यदि रण-विजय हो, तो कोई हर्ज नही, किंतु व्यर्थ प्राण गंवाने से क्या मतलब? व्यर्थ मृत्यु वीर-धर्म नही है।‘‘ जीवानंद-“मै व्यर्थ ही मरूंगा, लेकिन युद्ध करके मरूंगा।‘‘ कहकर जीवानंद ने पीछे पलटकर कहा-‘‘भाईयो ! भगवान की शपथ लो कि जीवित न लौटेगे।‘‘ जीवानंद ने घोड़े की पीठ पर से ही, बहुत पीछे खड़े महेन्द्र से कहा-‘‘भाई महेन्द्र ! नवीनंद से मुलाकात हो तो कह देना कि परलोक मे मुलाकात होगी।‘‘ यह कहकर वह वीरश्रेष्ठ बाएं हाथ मे बलम आगे किए हुए और दाहिने हाथ से बंदूक चलाते, मुंह से 'हरे मुरारे ! हरे मुरारे !!' कहते हुए तीर की तरह उस बरसती हुई आग को चीरते हुए टीले पर बड़े वेग से आगे बढ़ने लगे। इस तरह महान् साहस का परिचय देते हुए और शत्रुक्षय करते हुए जीवानंद अकेले अभिमन्यु की तरह शत्रु-व्यूह मे घुसते चले जा रहे थे, मानो एक मस्त हाथी कमल-वन को रौंदता चला जाता हो। भागती हुई संतान-सेना को दिखाकर महेन्द्र ने कहा-‘‘देखो, कायरो ! भागनेवालो- अपने सेनापति का साहस देखो ! देखने से जीवानंद मर नहीं सकते।‘‘ संतानो ने पलटकर जीवानंद का अद्भुत साहस प्रत्यक्ष देखा। पहले उन सबने देखा, फिर बोले-‘‘स्वामी जीवानंद मरना जानते है, तो क्या हम नही जानते ? चलो जीवानंद के साथ बैकुंठ चले !‘‘ बस, यही से रण ने पलटा खाया। संतान-सेना पलट पड़ी। पीछे भागनेवालो ने देखा कि पलट रहे है, तो उन्होने समझा कि संतानो की विजय हुई है। अतः वे भी तुरत चल पड़े। महेन्द्र ने देखा कि जीवानंद शत्रुओ की सेना मे घुस गए हैं, अब दिखाई नही पड़ते। उन्मत्त संतान-सेना ने टीले से उतरी हुई अंग्रेज-वाहिनी पर प्रचंड आक्रमण किया- अंग्रेजो के पैर उखड़ गए। वे लोग इस आक्रमण को सह न सके, उनकी संगीने पलटकर भागने की तरफ दिखाई दी। पीछे चढ़ती हुई संतान-सेना उनका विनाश करती जा रही थी। भागी हुई संतान-सेना अभी तक बराबर पलटती हुई रण भूमि मे चढ़ती जाती थी। महेन्द्र खड़े यह देख रहे थे। सहसा पर्वत-शिखर पर संतानो की पताका उड़ती दिखाई दी। वहां सत्यानंद महाप्रभु, स्वयं चक्रपाणि विष्णु की तरह बाएं हाथ में ध्वजा लिए हुए और दाहिने मे रक्त से लाल तलवार लिए खड़े थे। वह देखते ही संतानो मे अपूर्व बल आ गया-‘‘हरे मुरारे !‘‘ का गगन मे वह जयनाद हुआ कि वस्तुतः वसुंधरा कांपती हुई नजर आई। इस समय अंग्रेजी सेना दोनो दलो के बीच मे थी- ऊपर प्रभु सत्यानंद ने तोपो पर अधिकार कर लिया था, नीचे से संतान-सेना पलटकर चढ़ती हुई मार रही थी। महेन्द्र ने देखा कि ऊपर से ‘‘वन्देमातरम्‘‘ का निनाद करते हुए सत्यानंद, अवशिष्ट ब्रिटिश वाहिनी के नाश के लिए उतरे। इधर से बची हुई सेना लेकर महेन्द्र ने संतानो को साहस दिलाते हुए भयंकर आक्रमण कर दिया। मध्य टीले पर भयंकर युद्ध हुआ। अंग्रेज चक्की के दो पाटो मे फंसे चने की तरह पिसने लगे। थोड़ी ही देर मे एक भी ब्रिटिश सैनिक खड़ा न दिखाई दिया। धरती लाल हो गई- रक्त की नदी बह गई। वहां ऐसा भी कोई न बचा, जो वारेन हेस्टिंग्स के पास खबर ले जाता। पूर्णिमा की रात है। यह भीषण रणक्षेत्र इस समय स्थिर हैं। वह घोड़ो की टाप की आवाज, बंदूको की गरज और गोलो की वर्षा गायब हो गई हैं। न कोई हुर्रे करता है न कोई हरे मुरारे। आवाज आती हैं, तो केवल कुत्तो और स्यारो की। रह-रहकर घायलो का क्रंदन सुनाई पड़ता है। किसी का पैर कटा है, किसी का हाथ कटा है, किसी का पंजर घायल हुआ है। कोई राम को पुकारता है, कोई गॉड। कोई पानी मांगता है, कोई मृत्यु का

आह्वान करता है। उस चांदनी रात मे श्याम भूमि लाल वसन पहनकर भयानक हो गई थी। किसकी हिम्मत थी कि वहां जाता? साहस तो किसी का नही है लेकिन उस निस्तब्ध भयंकर रात मे भी एक रमणी उस अगम्य रणक्षेत्र मे विचरण कर रही है। वह एक मशाल लिए रणक्षेत्र मे किसी को खोज रही है- हरेक शव का मुंह रोशनी मे देखकर दूसरे के पास चली जाती है। कही कोई मृत देह अश्व के नीचे पड़ी है, तो वही मुश्किल से मशाल रख, दोनो हाथो से अश्व को हटाकर शव देखती और हताश हो आगे बढ़ जाती है। वह जिसे खोज रही थी, उसे न पाया। अब वह मशाल छोड़, रक्तमय जमीन पर पछाड़ खा गिरकर रोने लगी। पाठको ! यह शांति है वीर जीवानंद के शव को खोज रही है। शांति जिस समय जमीन पर गिरकर रो रही थी, उसी समय उसे एक मधुर करुण शब्द सुनाई पड़ा-‘‘उठो, बेटी!, रोओ नही !‘‘ शांति ने देखा, चांदनी रात मे सामने एक जटाजूटधारी विराट महापुरुष खड़े है। शांति उठकर खड़ी हो गई ! जो आए थे, उन्होने कहा-‘‘रोओ नही, बेटी ! जीवानंद शांति ने पहचाना-वह जीवानंद की देह थी। सर्वांग क्षत-विक्षत, रुधिर से सने हुए थे। शांति यह कहकर वे महापुरूष शांति को रणक्षेत्र के मध्य मे ले गए। वही शवो का एक स्तूप लगा हुआ था। शांति उसे हटा न सकी थी। उस महापुरुष ने स्वयं शवो को हटाकर एक शव बाहर निकाला। शांति ने पहचाना- वह जीवानंद की देह थी। सर्वांग क्षत-विक्षत रुधिर से सने हुए थे। शांति सामान्य स्त्री की तरह जोरो से रो पड़ी !‘‘ महापुरुष ने फिर कहा-‘‘रोओ नही बेटी! क्या जीवानंद मर गए है ? शांत होकर उनका शरीर देखो, नाड़ी की परीक्षा करो !‘‘ शांति ने शव की नाड़ी देखी, नाड़ी का पता न था। वे बोले-‘‘छाती पर हाथ रखकर देखो !‘‘ शांति ने छाती पर हाथ रखकर देखा, गतिहीन ठंडा था ! फिर महापुरुष ने कहा-‘‘नाक पर हाथ रखकर देखो, कुछ भी श्वास नही है?‘‘ शांति ने देखा, किंतु हताश हो गई। महापुरुष ने फिर कहा-‘‘मुंह मे उंगली डालकर देखो, कुछ गरमी मालूम पड़ती है?‘‘ आशामुग्धा शांति ने वह भी किया, बोली-‘‘मुझे कुछ पता नही लगता है !‘‘ महापुरुष ने बायां हाथ शव पर रखकर कहा-‘‘बेटी, तुम घबरा गई हो। देखो अभी देह मे हलकी गरमी है !‘‘ अब शांति ने फिर नाड़ी देखी- देखा कि मन्द, अतिमन्द गति है। विस्मित होकर उसने छाती पर हाथ रखा- मृदुधड़कन है। नाक पर हाथ रखकर देखा- हल्की सांस है। शांति ने विस्मित होकर पूछा-‘‘क्या प्राण था? या फिर से आ गया है?‘‘ उन्होने कहा-‘‘भला ऐसा कभी हुआ है, बेटी! तुम इन्हे उठाकर तालाब के किनारे तक ले चल सकोगी? मैं चिकित्सक हूं, इनकी चिकित्सा करूंगा !‘‘ शांति जीवानंद को तालाब पर ले जाकर घाव धोने लगी। इसी समय उन महापुरुष ने लता आदि का प्रलेप लाकर घावो पर लगा दिया। इसके बाद वे जीवानंद का शरीर सहलाने लगे। अब जीवानंद के श्वास-प्रश्वास तेज हो गए। कुछ ही क्षण मे उठ बैठे। शांति के मुंह की तरफ देखकर उन्होने पूछा-‘‘युद्ध मे किसकी विजय हुई?‘‘ शांति ने कहा-‘‘तुम्हारी विजय ! इन महात्मा को प्रणाम करो?‘‘ अब दोनो ने देखा कि वहां कोई नही है, किसे प्रणाम करे ! समीप ही संतान-सेना का विजयोल्लास सुनाई पड़ रहा था। लेकिन शांति या जीवानंद मे से कोई भी न उठा।

दोनो विमल ज्योस्तना मे पुष्करिणी-तट पर बैठे रहे। जीवानंद का शरीर अद्भुत औषध बल से जल्द ही ठीक हो गया। जीवानंद ने कहा-“शांति! चिकित्सक की दवा मे गुण है। अब मेरे शरीर मे जरा भी ग्लानि या कष्ट नही है। बोलो, अब कहां चले संतान सेना का जयोल्लास सुनाई पड़ रहा है!‘’ शांति बोली-“अब वहां नही। माता का कार्योद्धार हो गया है। अब यह देश संतानो का है। अब वहां क्या करने चले?‘’ जीवानंद-“जो राज्य छीना है उसकी बाहुबल से रक्षा तो करनी होगी।‘’ शांति-‘’रक्षा के लिए महेंद्र है। तुमने प्रायश्चित कर संतान-धर्म के लिए प्राण-त्याग दिया था। अब पुनः प्राप्त इस जीवन पर संतानो का अधिकार नही है। हमलोग संतानों के लिए मर चुके है। अब हमे देखकर संतान लोग कह सकते है कि प्रायश्चित के भय से ये लोग छिप गए थे, अब विजय होने पर प्रकट हो गए है- राज्य-भाग लेने आए है।‘’ जीवानंद-“यह क्या शांति? लोगो के अपवाद-भय से अपना कर्त्तव्य छोड़ दे। मेरा कार्य मातृसेवा है। दूसरा चाहे जो कहे, मै मातृ-सेवा करूंगा।‘’ शांति-“अब तुम्हे इसका अधिकार नही है, क्यो कि तुमने मातृ-सेवा के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। अब-यदि सेवा करोगे, तो तुमने उत्सर्ग क्या किया? मातृ-सेवा से वंचित होना ही प्रधान प्रायश्चित है। अन्यथा जीवन त्याग देना क्या कोई बड़ा काम है?‘’ जीवानंद-“शांति! तुमने ठीक समझा। लेकिन मै अपने प्रायश्चित को अधूरा न रखूंगा। मेरा सुख संतान-धर्म मे है, लेकिन कहां जाऊंगा? मातृ-सेवा त्यागकर घर जाने में क्या सुख मिलेगा?‘’ शांति-“यह तो मै कहती नही हूं। हम लोग अब गृहस्थ नही है, हम दोनो ही संन्यासी रहेगे- फिर ब्रह्मचर्य का पालन करेगे। चलो हम लोग देश-पर्यटन कर देव-दर्शन करे।‘’ जीवानंद-“इसके बाद?‘’ शांति-“इसके बाद हिमालय पर कुटी का निर्माण कर हम दोनो ही देवाराधना करेगे- जिससे माता का मंगल हो, यही वर मांगेगे।‘’ इसके बाद दोनों ही उठकर हाथ मे हाथ दे, ज्योत्स्नामयी रात्रि मे अन्तर्हित हो गए। हाय मां ! क्या फिर जीवानंद सदृश पुत्र और शांति जैसी कन्या तुम्हारे गर्भ मे आएंगे? स्वामी सत्यानंद रणक्षेत्र मे किसी से कुछ न कहकर आनंदमठ मे लौट आए। वहां वे गंभीर रात्रि मे विष्णु-मंडप मे बैठकर ध्यानमग्न हुए। इसी समय उन चिकित्सक ने वहां आकर दर्शन दिया। देखकर सत्यानंद ने उठकर प्रणाम किया। चिकित्सक बोले-“सत्यानंद! आज माघी पूर्णिमा है।‘’ सत्यादंन-“चलिए मै तैयार हूं। किंतु महात्मन् ! मेरे एक संदेह को दूर कीजिए। मैने क्या इसीलिए युद्ध- जय कर संतान-धर्म की पताका फहरायी थी?‘’ जो आए थे, उन्होने कहा-“तुम्हारा कार्य सिद्ध हो गया, मुस्लिम राज्य ध्वंस हो चुका। अब तुम्हारी यहां कोई जरूरत नही, अनर्थक प्राणहत्या की आवश्यकता नही!‘’ सत्यानंद-“मुस्लिम राज्य ध्वंस अवश्य हुआ है, किंतु अभी हिंदु राज्य स्थापित हुआ नही है। अभी भी कलकत्ते मे अंग्रेज प्रबल है।‘’ वे बोले-“अभी हिंदु-राज्य स्थापित न होगा। तुम्हारे रहने से अनर्थक प्राणी-हत्या होगी, अतएव चलो !‘’ यह सुनकर सत्यानंद तीव्र मर्म-पीड़ा से कातर हुए, बोले-“प्रभो ! यदि हिंदू-राज्य स्थापित न होगा, तो कौन

राज्य होगा? क्या फिर मुस्लिम-राज्य होगा?‘‘ उन्होने कहा-‘‘नही, अब अंगरेज-राज्य होगा‘‘ सत्यानंद की दोनो आंखो से जलधारा बहने लगी। उन्होने सामने जननी-जन्मभूमि की प्रतिमा की तरफ देख हाथ जोड़कर कहा-‘‘हाय माता! तुम्हारा उद्धार न कर सका। तू फिर म्लेच्छो के हाथ मे पड़ेगी। संतानो के अपराध को क्षमा कर दो मां! रणक्षेत्र मे मेरी मृत्यु क्यो न हो गई?‘‘ महात्मा ने कहा-‘‘सत्यानंद कातर न हो। तुमने बुद्धि विभ्रम से दस्युवृत्ति द्वारा धन संचय कर रण मे विजय ली है। पाप का कभी पवित्र फल नही होता। अतएव तुम लोग देश-उद्धार नही कर सकोगे। और अब जो कुछ होगा, अच्छा होगा। अंगरेजो के बिना राजा हुए सनातन धर्म का उद्धार नही हो सकेगा। महापुरुषो ने जिस प्रकार समझाया है, मैं उसी प्रकार समझाता हूं- ध्यान देकर सुनो! तैंतिस कोटि देवताओ का पूजन सनातन-धर्म नही है। वह एक तरह का लौकिक निकृष्ट-धर्म, म्लेच्छ जिसे हिंदू-धर्म कहते है- लुस हो गया। प्रकृति हिंदू-धर्म ज्ञानात्मक- कार्यात्मक नही। जो अन्तर्विषयक ज्ञान है- वही सनातन-धर्म का प्रधान अंग है। लेकिन बिना पहले बहिर्विषयक ज्ञान हुए, अन्तर्विषयक ज्ञान असंभव है। स्थूल देखे बिना सूक्ष्म की पहचान ही नही हो सकती। बहुत दिनो से इस देश मे बहिर्विषयक ज्ञान लुस हो चुका है- इसीलिए वास्तविक सनातन-धर्म का भी लोप हो गया है। सनातन-धर्म के उद्धार के लिए पहले बहिर्विषयक ज्ञान-प्रचार की आवश्यकता है। इस देश मे इस समय वह बहिर्विषयक ज्ञान नही है- सिखानेवाला भी कोई नही, अतएव बाहरी देशो से बहिर्विषयक ज्ञान भारत मे फिर लाना पड़ेगा। अंगरेज उस ज्ञान के प्रकाण्ड पंडित है- लोक-शिक्षा मे बड़े पटु है। अतः अंगरेजो के ही राजा होने से, अंगरेजी की शिक्षा से स्वतः वह ज्ञान उत्पन्न होगा! जब तक उस ज्ञान से हिंदु ज्ञानवान, गुणवान और बलवान न होगे, अंगरेज राज्य रहेगा। उस राज्य मे प्रजा सुखी होगी, निष्कंटक धर्माचरण होगे। अंगरेजो से बिना युद्ध किए ही, निरस्त्र होकर मेरे साथ चलो!‘‘ सत्यानंद ने कहा-‘‘महात्मन्! यदि ऐसा ही था- अंगरेजो को ही राजा बनाना था, तो हम लोगो को इस कार्य मे प्रवृत्त करने की क्या आवश्यकता थी?‘‘ महापुरुष ने कहा-‘‘अंगरेज उस समय बनिया थे- अर्थ संग्रह मे ही उनका ध्यान था। अब संतानो के कारण ही वे राज्य-शासन हाथ मे लेगे, क्योकि बिना राजत्व किए अर्थ-संग्रह नही हो सकता। अंगरेज राजदण्ड ले, इसलिए संतानो का विद्रोह हुआ है। अब आओ, स्वयं ज्ञानलाभ कर दिव्य चक्षुओ से सब देखो, समझो!‘‘ सत्यानंद-‘‘हे महात्मा! मैं ज्ञान लाभ की आकांक्षा नही रखता-ज्ञान की मुझे आवश्यकता नही। मैने जो व्रत लिया है, उसी का पालन करूंगा। आशीर्वाद कीजिए कि मेरी मातृभक्ति अचल हो!‘‘ महापुरुष-‘‘व्रत सफल हो गया- तुमने माता का मंगल-साधन किया- अंगरेज राज्य तुम्ही लोगो द्वारा स्थापित समझो! युद्ध-विग्रह का त्याग करो- कृषि में नियुक्त हो, जिससे पृथ्वी श्स्यशालिनी हो, लोगो की श्रीवृद्धि हो!‘‘ सत्यानंद की आंखो से आंसू निकलने लगे, बोले-‘‘माता को शत्रु-रक्त से शस्यशालिनी करूं?‘‘ महापुरुष-‘‘शत्रु कौन है? शत्रु अब कोई नही। अंगरेज हमारे मित्र है। फिर अंगरेजो से युद्ध कर अंत मे विजयी हो- ऐसी अभी किसी की शक्ति नही?‘‘ सत्यानंद-‘‘न रहे, यही माता के सामने मैं अपना बलिदान चढ़ा दूंगा!‘‘ महापुरुष -‘‘अज्ञानवश! चलो, पहले ज्ञान-लाभ करो। हिमालय-शिखर पर मातृ-मंदिर है, वही तुम्हे माता की मूर्ति प्रत्यक्ष होगी!‘‘ यह कहकर महापुरुष ने सत्यानंद का हाथ पकड़ लिया। कैसी अपूर्व शोभा थी! उस गंभीर निस्तब्ध रात्रि मे

विराट चतुर्भुज विष्णु-प्रतिमा के सामने दोनो महापुरुष हाथ पकड़े खड़े थे। किसको किसने पकड़ा है? ज्ञान ने भक्ति का हाथ पकड़ा है, धर्म के हाथ मे कर्म का हाथ है, विसर्जन ने प्रतिष्ठा का हाथ पकड़ा है। सत्यानंद ही शांति है- महापुरुष ही कल्याण है- सत्यानंद प्रतिष्ठा है- महापुरुष विसर्जन है। विसर्जन ने आकर प्रतिष्ठा को साथ ले लिया। ॥ इति ॥