आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाघी पूर्णिमा सामने उपस्थित थी। उनके शिविर के निकट ही नदी तट पर बहुत बड़ा मेला लगेगा। इस बार मेले की बड़ी तैयारी है। मेले मे सहज ही कोई एक लाख आदमी एकत्र होते हैं। इस बार वैष्णव राजा हुए हैं- शासक हुए हैं, अतः वैष्णवो ने इस बार मेले मे आने का संकल्प कर लिया है। पदचिन्ह के रक्षक भी अवश्य ही मेले मे पहुंचेगे, इसकी कल्पना मेजर ने कर ली। उन्होने निश्चय किया कि पदचिन्ह पर उसी समय आक्रमण कर अधिकार करना चाहिए। यह सोचकर मेजर सने अफवाह उड़ा दी कि वे मेले पर आक्रमण करेगे, उसी दिन वहां तमाम वैष्णव सन्तान इकट्ठे रहेगे, अतः एक बार मे ही उनका समूल विध्वंस होगा- वे वैष्णवो का मेला होने न देगे। यह खबर गांव-गांव मे प्रचारित की गयी। अतः स्वभावतः जो संतान जहां था, वह वही से अस्त्र ग्रहण कर मेले की रक्षा के लिए चल पड़ा। सभी संतानें माघी पूर्णिमा के मेले वाले नदी-तट पर आकर सम्मिलित होने लगे। मेजर साहब ने जो जाल फेका था, वह सही होने लगा। अंगरेजो के सौभाग्य से महेन्द्र ने भी उस जाल मे पांव डाल दिया। महेन्द्र ने पदचिन्ह मे थोड़ी सी सेना छोड़कर शेष सारी सेना के साथ मेले के लिए प्रयाण किया। यह सब होने के पहले ही जीवानंद और शांति पदचिन्ह से बाहर निकल गये थे। उस समय तक युद्ध की कोई बात नही थी, अतः युद्ध की तरफ उनका कोई ध्यान भी न था। माघी पूर्णिमा के दिन पवित्र जल मे प्राण- विसर्जन कर वे लोग अपना प्रायश्चित करेगे, यह पहले से निश्चित हो चुका था। राह मे जाते-जाते उन्होने सुना कि मेले मे समस्त संतानो पर अंगरेजो का आक्रमण होगा तथा भयानक युद्ध होगा। इस पर जीवानंद ने कहा- ‘‘तब चलो, युद्ध मे ही प्राण-विसर्जन करेगे।‘‘ वे लोग जल्दी-जल्दी चले। एक जगह रास्ता टीले के ऊपर से गया था। टीले पर चढ़कर वीर-दम्पति ने देखा कि नीचे थोड़ी दूर पर अंगरेजो का शिविर पड़ा हुआ है। शांति ने कहा- ‘‘मरने की बात इस समय ताक पर रखो, बोली - वन्देमातरम!‘‘ इस पर दोनो ने ही चुपके-चुपके कुछ सलाह की। फिर जीवानंद पास के एक जंगल मे छिप गए। शांति एक दूसरे मे घुसकर अद्भुत काण्ड मे प्रवृत्त हुई। शांति मरने जा रही थी, लेकिन उसने मृत्यु के समय स्त्री-वेश धारण करने का निश्चय किया था। महेन्द्र ने कहा था कि उसका पुरुष वेश ठगैती है, ठगी करते हुए मरना उचित नही। अतः वह साथ मे अपना पिटारा लाई थी। उसमे उसकी पोशाक रहती थी। इस समय नवीनानंद पिटारा खोलकर अपना वेश परिवर्तन करने बैठे। चिकने बालो को पीठ पर फहराए हुए, उस पर खैंर का टीका-फटीका लगाकर नवीन लता-पुष्पो से सर ढंककर शांति खासी-वैष्णवी बन गई। सारंगी उसने हाथ मे ले ली। इस तरह का वह अंगरेज-शिविर पहुंच गई। काली मूंछोवाले सिपाही उसे देखकर पागल हो उठे। चारो तरफ से लोगो ने उसे घेरकर गवाना शुरू किया। कोई ख्याल गवाता, तो कोई टप्पा, कोई गजल। किसी ने दाल दिया, किसी ने चावल, तो किसी ने मिठाई। किसी ने पैसे दिए, तो किसी ने चवन्नी ही दे दी। इसी तरह वैष्णवी अपनी आंखे से शिविर का हाल-चाल देखती घूमने लगी। सिपाहियो ने पूछ-‘‘अब कब आओगी?‘‘ वैष्णवी ने कहा-‘‘कैसे बताऊं, मेरा घर बड़ी दूर है।‘‘ सिपाहियो ने पूछा-‘‘कितनी दूर?‘‘ वैष्णवी ने कहा-‘‘मेरा घर पदचिन्ह मे है।‘‘