आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहेन्द्र बेवकूफ बन गये। वे कुछ भी समझा न पाते थे- यह सब बात तो अपराधियो जैसी नही है। कल्याणी का भाव भी विचित्र है। वह भी तो अविश्वासिनी की तरह भागी नही, न डरी, न लज्जित ही हुई, वर्न् मृदु भाव से मुस्करा रही है। वही कल्याणी, जिसने पेड़ के नीचे सहज ही विष खा लिया- वह क्या अपराधिनी हो सकती है?.... महेन्द्र के मन मे यही तर्क-वितर्क हो रहा था। इसी समय शांति ने महेन्द्र की यह दुरवस्था देख, कुछ मुस्कराकर कल्याणी की तरफ एक विलोल कटाक्षपात किया। सहसा अंधकार मिट गया- भला ऐसा कटाक्षपात भी कभी पुरुष कर सकते है। समझ गए कि नवीनानंद कोई स्त्री है। फिर भी शक था। उन्होने साहस बटोरा और आगे बढ़कर एक झटके मे नवीनानंद की दाढ़ी खींच ली- दाढ़ी-मूंछ हाथ मे आ गई। इसी समय अवसर पाकर कल्याणी ने बाघम्बर की गांठ खोल दी पकड़ी जाकर शांति शरमा कर सिर नीचा कर खड़ी रह गई। अब महेन्द्र ने शांति से पूछा- ‘‘तुम कौन हो?‘‘ शांति- ‘‘ श्रीमान नवीनानंद गोस्वामी?‘‘ महेन्द्र- ‘‘ वह तो ठगी थी, तुम तो स्त्री हो!‘‘ शांति- ‘‘ यह तो देखते ही हैं आप!‘‘ महेन्द्र- ‘‘ तब एक बात पूछूं- तुम स्त्री होकर जीवानंद के साथ हर समय क्यो रहती थी?‘‘ शांति- ‘‘ यह बात आप को न बताऊंगी।‘‘ महेन्द्र-‘‘तुम स्त्री हो, यह जीवानंद स्वमी जानते है?‘‘ शांति- ‘‘ जानते है।‘‘ यह सुनकर विशुद्धात्मा महेन्द्र बहुत दुखी हुए। यह देखकर अब कल्याणी चुप न रह सकी, बोली- ‘‘ये जीवानंद स्वामी की धर्मपी शांति देवी है?‘‘ एक क्षण के लिए महेन्द्र का चेहरा प्रसन्न हो उठा। इसके बाद ही उनका चेहरा फिर गंभीर हो गया। कल्याणी समझ गई, ‘‘ये पूर्ण ब्रह्मचारिणी है।‘‘ उत्तर बंगाल मुसलमानो के हाथ से निकल गया- यह बात मुसलमान मानते नही, दलील पेश करते है कि बहुतेरे डाकुओ का उपद्रव है- शासन तो हमारा ही हैं। इस तरह कितने वर्ष बीत जाते नही कहा जा सकता। लेकिन भगवान की इच्छा से वारेन हेर्टिंग्स इसी समय कलकत्ते मे गवर्नर- जनरल होकर आए। वारेन हेर्टिंग्स मन ही मन सतोष करने वाले आदमी न थे, अन्यथा भारत मे अंग्रेजी साम्राज्य स्थापित कर न पाते। उन्होने तुरंत संतानो के दमनार्थ मेजर एडवर्ड नाम के एक दूसरे सेनापति को खड़ा कर दिया। मेजर ताजा गोरी फौज लेकर तैयार हो गए। एडवर्ड ने देखा कि यह यूरोपीय युद्ध नही है। शत्रुओ की सेना नही, नगर नही, राजधानी नही, दुर्ग नही, फिर भी सब उनके अधीन है। जिस दिन जहां ब्रिटिश सेना का पड़ाव पड़ा, उस रोज वहां ब्रिटिश अधिकार रहा, दूसरे दिन शिविर टूटते ही फिर ‘वन्देमातरम’ की ध्वनि गूंजने लगी। साहब सर पटककर रह गये, पर यह पता न लगा कि एक क्षण मे कहां से टिड्डियो की तरह विद्रोही सेना इकट्ठी हो जाती, ब्रिटिश अधिकृत गांवो को फूंक देती है और रक्षको की छोटी टुकड़ियो का सफाया करने के बाद फिर गायब हो जाती है? बड़ी खोज के बाद उन्हे मालूम हुआ कि पदचिन्ह मे सन्तानो ने दुर्ग -निर्माण कर रखा है उसी दुर्ग पर अधिकार करना युक्तिसंगत समझा। वह खुफियो द्वारा यह पता लगाने लगा कि पदचिन्ह मे कितनी सन्तान-सेना रहती है। उसे जो समाचार मिला, उससे उस समय उसने दुर्ग पर आक्रमण करना उचित समझा। मन-ही-मन उसने एक अपूर्व कौशल की रचना की।