भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 78 में से

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पृष्ठ 68

पहले तो निमाई बात ही खा गई। इधर-उधर ताका, फिर एक-बारगी उसका मुंह फूलकर कुप्पा हो गया! इसके बाद वह रो पड़ी, बोली-“लड़की न दूंगी।' निमाई अपनी उल्टी हथेलियो से आंसू पोछने लगी। जीवानंद ने कहा- “अरे बहन! तू रोती क्यों? ऐसा दूर भी तो नही है- न हो, बीच-बीच में उन लोगो के घर जाकर लड़की को देख आया करना।' निमाई ने होठ फुलाकर कहा- “तो तुम लोगो की लड़की है, ले क्यो नही जाते? मुझसे क्या मतलब?" यह कहकर निमाई लड़की को उठा लाई और जीवानंद के पैर के पास पटककर वही बैठकर रोने लगी। अतः जीवानंद और कोई फुसलाने की राह न देखकर इधर-उधर की बाते करने लगे। लेकिन निमाई का क्रोध न गया। निमाई उठकर सुकुमारी के पहनने के कपड़े, उसके खेलने के खिलौने- बोझ के बोझ लाकर जीवानंद के सामने पटकने लगी। सुकुमारी स्वयं उन सबको बटोरने लगी। उसने निमाई से पूंछा- “क्यो मां ! मैं कहां जाऊंगी?" अब निमाई सह न सकी। उसने सुकुमारी को गोद मे उठा लिया ओर चली गयी।द्मद्मद्म पदचिन्ह के नये दुर्ग मे आज बड़े सुख से महेन्द्र, कल्याणी, जीवानंद, शांति निमाई के पति और सुकुमारी – सब एकत्र है। सब आज सुख में विभोर है-आनंदमग्न है। शांति जिस रात कल्याणी को ले आयी, उसी रात उसने कह दिया था कि वह अपने पति महेन्द्र से यह न कहे, कि नीवनानंद जीवानंद की पी है। एक दिन कल्याणी ने उसे अंतःपुर मे बुला भेजा! नवीनानंद अतःपुर मे घुस गया। उसने प्रहरियो की एक न सुनी। शांति ने कल्याणी के पास आकर पूछा-“क्यो बुलाया है?" कल्याणी -“पुरुष-वेश मे कितने दिनो तक रहेगी? न मुलाकात हो पाती है, न बाते होती है। मेरे पति के सामने तुम्हे प्रकट होना पड़ेगा।" नवीनानंद बड़ी चिन्ता मे डूब गये- कुछ देर तक बोले ही नही। अन्त मे बोले-“इनमे अनेक विघ्न है, कल्याणी !“ दोनो मे इसी तरह बाते होने लगी। इधर जो प्रहरी नवीनानंद को जोर देकर अन्तःपुर मे जाने से मना कर रहे थे, उन्होने महेन्द्र से जाकर कहा कि नवीनानंद जबरदस्ती, मना करने पर भी अन्दर चले गये हैं। कौतूहलवश महेन्द्र भी अन्तःपुर मे गये। महेन्द्र ने सीधे कल्याणी के कमरे मे जाकर देखा कि नवीनानंद कमरे मे खड़े हैं और कल्याणी उनके शरीर के बाघम्बर की गांठ खोल रही है। महेन्द्र बड़े अचम्भे मे आए- बहुत ही नाराज हुए। नवीनानंद ने उन्हे देख हंसकर कहा- “क्यो, गोस्वामी जी! सन्तान पर अविश्वास? “ महेन्द्र ने पूछा- “क्या भवानंद विश्वासी थे?" नवीनानंद ने आंखे दिखाकर कहा-“कल्याणी क्या भवानंद के शरीर पर हाथ रखकर बाघ की खाल खोलती थी?" यह कहते हुए शांति ने कल्याणी का हाथ दबाकर पकड़ लिया बाघम्बर खोलने न दिया। महेन्द्र -“तो इससे क्या हुआ?" नवीनानंद-“मुझ पर अविश्वास कर सकते है लेकिन कल्याणी पर कैसे अविश्वास कर सकते है?" अब महेन्द्र अप्रतिभ हुए बोले- “कहां, मै अविश्वास कब करता हूं?" नवीनानंद -“नही तो मेरे पीछे अंतःपुर मे क्यो आ उपस्थित हुए?" महेन्द्र - “कल्याणी से कुछ बाते करनी थी, इसलिए आया हूं।" नवीनानंद -“तो इस समय जाइए! कल्याणी के साथ मुझे भी कुछ बाते करनी है। आप चले जाइए, मै पहले बात करूंगा। आपका तो घर है, आप जब चाहे आकर बात कर सकते है। मैं तो बड़े कष्ट से आ पाया हूं।"

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