भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

आगन्तुक ने कहा, "मै तुम्हारा दासानुदास हूं। हे सुन्दरी! मुझ पर प्रसन्न हो।" कल्याणी बड़ी तेजी से वहां से हटकर गर्जन कर बोली- "क्या यह अपमान के लिए ही आपने मेरी रक्षा की थी? देखती हूं, ब्रह्मचारियो का क्या यही धर्म है? आज मैं निःसहाय हूं, नही तो तुम्हारे चेहरे पर लात लगाती।" ब्रह्मचारी ने कहा- "अयि स्मितवदने! मैं बहुत दिनो से तुम्हारे पुष्प समान कोमल शरीर के आलिंगन की कामना कर रहा हूं?" यह कहकर दौड़कर ब्रह्मचारी ने कल्याणी को पकड़ लिया और जबर्दस्ती छाती से लगा लिया। अब कल्याणी खिलखिला कर हंस पड़ी, बोली "यह तुम्हारा कपाल है। पहले ही कह देना था- भाई, मेरी भी यही दशा है।" शान्ति ने पूछा- "क्यो भाई! महेन्द्र की खोज मे चली हो?" कल्याणी ने कहा-"तुम कौन हो? तुम तो सब कुछ जानती हो!" शान्ति बोली- "मै ब्रह्मचारी हूं, सन्तान -सेना का अधिनायक -घोरतर वीर पुरुष! मैं सब जानता हूं आज राह मे सिपाहियो का बहुत हुड़दंग ऊधम है, अतः आज तुम पदचिन्ह जा न सकोगी!" कल्याणी रोने लगी। शान्ति ने त्योरी बदलकर कहा-"डरती क्यो हो? हम अपने नयनबाणो से हजारो का वध कर सकते हैं- चलो, पदचिन्ह चले।" कल्याणी ने ऐसी बुद्धिमती स्त्री की सहायता पाकर मानो हाथ बढ़ाकर स्वर्ग पा लिया। बोली- "तुम जहां कहोगी, वही चलूंगी।" शान्ति कल्याणी को लेकर जंगली राह से चल पड़ी। झ्रध्रह्वघ्रजब आधी रात को शान्ति अपना आश्रम त्यागकर नगर की तरफ चली, तो उस समय जीवानंद वहां उपस्थित थे। शान्ति ने जीवानंद से कहा- "मै नगर की तरफ जाती हूं । महेन्द्र की स्त्री को ले आऊंगी। तुम महेन्द्र से कह रखो कि तुम्हारी स्त्री जीवित है।" जीवानंद ने भवानंद से कल्याणी के जीवन की सारी बाते सुनी थी और उसका वर्तमान वास-स्थान भी सुन चुके थे। क्रमशः ये सारी बाते महेन्द्र को सुनाने लगे। पहले तो महेन्द्र को विश्वास न हुआ। अन्त मे अपार आनंद से अभिभूत अवाक हो रहे। उस रात के बीतने पर सबेरे, शान्ति की सहायता से महेन्द्र के साथ कल्याणी की मुलाकात हुई । निस्तब्ध जंगल के बीच अतिघनी शालतस् श्रेणी की अंधेरी छाया के बीच, पशु-पक्षियो की निद्रा टूटने के पहले उन लोगों का परस्पर मिलन हुआ। म्लान अरण्य मे फूटनेवाली पहली आभामयी किरणे और नक्षत्रराज ही साक्षी थे। दूर शिला-संघर्षिणी नदी का कलकल प्रवाह हो रह था तो कही अरुणोदय की लालिमा से प्रफुल्ल-हृदय कोकिल की कुहू ध्वनि सुनाई पड़ जाती थी। क्रमशः एक पहर दिन चढ़ा। वहां शांति और जीवानंद आये। कल्याणी ने शांति से कहा- "मै आप लोगो के हाथ बिना मूल्य के बिक चुकी हूं। मेरी कन्या का पता लगाकर मेरे उस उपकार को पूर्ण कीजिए।" शांति ने जीवानंद के चेहरे की तरफ देखकर कहा- "मै अब सोऊं गा। आठ पहर बीते, मैं बैठा तक नही । आखिर मैं भी पुरुष हूं!" कल्याणी जरा मुस्कुरा दी। जीवानंद ने महेन्द्र की तरफ देखकर कहा- "यह भार मेरे ऊपर रहा। आप लोग पदचिन्ह की यात्रा कीजिए- वही आपकी कन्या पहुंचा दूंगा!" जीवानंद भैरवीपुर-निवासी बहिन के पास से लड़की लाने चले। पर कार्य सरल न था!