आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“हरे मुरारे! मधुकैटभारे! गोपाल, गोविंद मुकुंद प्यारे! हरे मुरारे मधुकैटभारे!.......“ कल्याणी बचपन से पुराणो का वर्णन सुनती आती थी कि देवर्षि नारद हाथों मे वीणा लिए हुए आकाश पथ से भुवन-भ्रमण किया करते है- उसके हृदय मे वही कल्पना जागरित होने लगी। मन-ही-मन वह देखने लगी- शुभ्र शरीर, शुभ्रवेश, शुभ्रकेश, शुभ्रवसन महामति महामुनि वीणा लिए हुए, चांदनी से चमकते आकाश की राह पर गाते आ रहे है । “हरे मुरारे! मधुकैटभारे!.......“ क्रमशः गीत निकट आता हुआ, और भी स्पष्ट सुनाई पड़ने लगा- “हरे मुरारे! मधुकैटभारे!.......“ क्रमशः और भी निकट, और भी स्पष्ट- “हरे मुरारे! मधुकैटभारे!.......“ अंत मे कल्याणी के मस्तक पर, वनस्थली मे प्रतिध्वनित होता हुआ गीत होने लगा- “हरे मुरारे! मधुकैटभारे!.......“ कल्याणी ने अपनी आंखे खोली। धुंधले अंधेरे की चांदी मे उसने देखा- सामने वही शुभ्र शरीर, शुभ्रवेश, शुभ्रकेश, शुभ्रवसन ऋषिमूर्ति खड़ी है। विकृत मस्तिष्क और अर्धचेतन अवस्था मे कल्याणी ने मन मे सोचा-
- प्रणाम करूं, लेकिन सिर झुकाने से पहले ही वह फिर अचेत हो गयी और गिर पड़ी। इसी वन मे एक बहुत विस्तृत भूमि पर ठोस पत्थरो से निर्मित एक बहुत बड़ा मठ है। पुरातत्त्ववेत्ता उसे देखकर कह सकते हैं कि पूर्वकाल मे यह बौद्धो का विहार था- इसके बाद हिंदुओ का मठ हो गया है। दो खंडो मे अट्टालिकाएं बनी है, उसमे अनेक देव-मंदिर और सामने नाट्यमंदिर है। वह समूचा मठ चहारदीवारी से घिरा हुआ है और बाहरी हिस्सा ऊंचे-ऊंचे सघन वृक्षों से इस तरह आच्छादित है कि दिन मे समीप जाकर भी कोई यह नही जान सकता कि यहां इतना बड़ा मठ है। यो तो प्राचीन होने के कारण मठ की दीवारे अनेक स्थानो से टूट-फूट गई है, लेकिन दिन मे देखने ने से साफ पता लगेगा कि अभी हाल ही मे उसे बनाया गया है। देखने से तो यही जान पड़ेगा कि इस दुर्भेद्य वन के अंदर कोई मनुष्य रहता न होगा। उस अट्टालिका की एक कोठरी मे लकड़ी का बहुत बड़ा कुन्दा जल रहा था। आंख खुलने पर कल्याणी ने देखा कि सामने ही वह ऋषि महात्मा बैठे हैं। कल्याणी बड़े आश्चर्य से चारो तरफ देखने लगी। अभी उसकी स्मृति पूरी तरह जागी न थी। यह देखकर महापुरुष ने कहा- “बेटी! यह देवताओं का मंदिर है, डरना नही। थोड़ा दूध है, उसे पियो; फिर तुमसे बाते होगी।“ पहले तो कल्याणी कुछ समझ न सकी, लेकिन धीरे-धीरे उसके हृदय मे जब धीरज हुआ तो उसने उठकर अपने गले मे आंचल डालकर, जमीन से मस्तक लगाकर प्रणाम किया। महात्माजी ने सुमंगल आशीर्वाद देकर दूसरे कमरे से एक सुगंधित मिट्टी का बरतन लाकर उसमे दूध गरम किया। दूध के गरम हो जाने पर उसे कल्याणी को देकर बोले- “बेटी! दूध कन्या को भी पिलाओ, स्वयं भी पियो, उसके बाद बाते करना।“ कल्याणी संतुष्ट हृदय से कन्या को दूध पिलाने लगी। इसके बाद उस महात्मा ने कहा- “मै जब तक न आऊं, कोई चिंता न करना।“ यह कहकर कमरे के बाहर चले गए। कुछ देर बाद उन्होने लौटकर देखा कि कल्याणी ने कन्या को तो दूध पिला दिया है, लेकिन स्वयं कुछ नही पिया। जो दूध रखा हुआ था, उसमें से बहुत थोड़ा खर्च हुआ था। इस पर महात्मा ने कहा- “बेटी! तुमने दूध नही पिया? मैं फिर बाहर जाता हूं; जब तक तुम दूध न पियोगी, मैं वापस न आऊंगा।“