आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिससे कोई भी उठकर खड़ा न हुआ। इसके बाद वह तपस्वी महात्मा एक तरफ से लोगो को चेहरा गौर से देखते हुए आगे बढ़ने लगे, जैसे किसी को खोजते हो । खोजते-खोजते अन्त मे वह पुरुष मिला और ब्रह्मचारी के उसका अंग स्पर्श कर इशारा करते ही वह उठ खड़ा हुआ। ब्रह्मचारी उसे साथ लेकर दूर आड़ मे चले गए। वह पुरुष युवक और बलिष्ठ था- लंबे घुंघराले बाल कंधे पर लहरा रहे थे। पुरुष अतीव सुंदर था। गैरिक वस्त्रधारी तथा चंदनचर्चित अंगवाले ब्रह्मचारी ने उस पुरुष से कहा- “भवानंद! महेंद्र सिंह की कुछ खबर मिली है?” इस पर भवानंद ने कहाझ्र-“आज सबेरे महेंद्रसिंह अपनी पी और कन्या के साथ गृह त्यागकर बाहर निकले हैं-बस्ती मे........." इतना सुनते ही ब्रह्मचारी ने बात काटकर कहा-‘बस्ती मे जो घटना हुई है, मै जानता हूं। किसने ऐसा किया?‘‘ भवानंद-‘गांव के ही किसान लोग थे। इस समय तो गांवो के किसान भी पेट की ज्वाला से डाकू हो गए है। आजकल कौन डाकू नही हैं? हम लोगो ने भी आज लूट की है- दारोगा साहब के लिए दो मन चावल जा रहा था, छीनकर वैष्णवो को भोग लगा दिया है।‘‘ ब्रह्मचारी ने कहा-‘चोरो के हाथ से तो हमने स्त्री-कन्या का उद्धार कर लिया है। इस समय उन्हे मठ मे बैठा आया हूं। अब यह भार तुम्हारे ऊपर हैं कि महेंद्र को खोजकर उनकी स्त्री-कन्या उनके हवाले कर दो। यहां जीवानंद के रहने से काम हो जाएगा।‘‘ भवानंद ने स्वीकार कर लिया। तब ब्रह्मचारी दूसरी जगह चले गए। बस्ती मे बैठे रहने और सोचते रहने का कोई प्रतिफल न होगा- यह सोचकर महेंद्र वहां से उठे। नगर में जाकर राजपुरुषो की सहायता से स्त्री-कन्या का पता लगवाएं- यह सोचकर महेंद्र उसी तरफ चले। कुछ दूर जाकर राह मे उन्होने देखा कि कितनी ही बैलगाड़ियो को घेरकर बहुतेरे सिपाही चले आ रहे है। बंगला सन् 1173 मे बंगाल प्रदेश अंग्रेजो के शासनाधीन नही हुआ था। अंग्रेज उस समय बंगाल के दीवान ही थे। वे खजाने का रुपया वसूलते थे, लेकिन तब तक बंगालियो की रक्षा का भार उन्होने अपने ऊपर लिया न था। उस समय लगान की वसूली का भार अंग्रेजो पर था, और कुल सम्पत्ति की रक्षा का भार पापिष्ठ, नराधम, विश्वासघातक, मनुष्य-कुलकलंक मीरजाफर पर था। मीरजाफर आत्मरक्षा मे ही अक्षम था, तो बंगाल प्रदेश की रक्षा कैसे कर सकता था? मीरजाफर सिर्फ अफीम पीता था और सोता था, अंग्रेज ही अपने जिम्मे का सारा कार्य करते थे। बंगाली रोते थे और कंगाल हुए जाते थे। अतः बंगाल का कर अंग्रेजो को प्राप्य था, लेकिन शासन का भार नवाब पर था। जहां-जहां अंग्रेज अपने प्राप्य कर की स्वयं अदायगी कराते थे, वहां-वहा उन्होने अपनी तरफ से कलेक्टर नियुक्त कर दिए थे। लेकिन मालगुजारी प्राप्त होने पर कलकत्ते जाती थी। जनता भूख से चाहे मर जाए, लेकिन मालगुजारी देनी ही पड़ती थी। फिर भी मालगुजारी पूरी तरह वसूल नही हुई थी- कारण, माता-वसुमती के बिना धन-प्रसव किए, जनता अपने पास के कैसे गढ़कर दे सकती थी? जो हो, जो कुछ प्राप्त हुआ था, उसे गाड़ियो पर लादकर सिपाहियो के पहरे मे कलकत्ते भेजा जा रहा था- धन कंपनी के खजाने मे जमा होता। आजकल डाकुओ का उत्पात बहुत बढ़ गया है, इसीलिए पचास सशस्त्र सिपाही गाड़ी के आगे-पीछे संगीन खड़ी किए, कतार मे चल रहे थे : उनका अध्यक्ष एक गोरा था जो सबसे पीछे घोड़े पर था। गरमी की भयानकता के कारण सिपाही दिन मे न चलकर रात को सफर करते थे। चलते-चलते उन गाड़ियो और सिपाहियो के कारण महेंद्र की राह रुक गई। इस तरह राह रुकी होने के कारण थोड़ी देर के लिए महेंद्र सड़क के किनारे खड़े हो गए। फिर भी सिपाहियो के