अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमृतक होय सो साधु
विश्वास कर मम बचन को, चढ़ सत की राह हो। ज्यों सूरमा रन में धसे, फिर पाछे चितवत नाहिं हो ॥ सती शूरा भाव निरखि के, सत्य को मग धारिये। मृतक दसा विचार गुरुगम, काल कष्ट निवारिये ॥
साहिब कह रहे हैं कि मेरी बात पर विश्वास करो और सत्य की राह पर ऐसे ही पाँव रखो जैसे कोई शूरमा युद्ध क्षेत्र में एक बार घुस जाता है तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखता। सती और शूरमा की भाँति सत्य की राह पर दृढ़ होकर गुरु प्रेम से जीवित मरने की स्थिति प्राप्त करो, जिससे काल के कष्टों से छूट जाओगे।
कोई सूरा जीव, जो ऐसी करनी करै ॥ ताहि मिलैगो पीव कहहिं कबीर बिचार कै ॥
साहिब कह रहे हैं कि ऐसी दृढ़ता से गुरु प्रेम के मार्ग पर चलने वाला, मरने की परवाह न करने वाला कोई शूरमा ही हो सकता है और निश्चय ही उसे साहिब रूपी प्रियतम की प्राप्ति होगी।
धर्मदास पूछते हैं
मृतक भाव प्रभु कहो समुझाई। जाते मन की तपन बुझाई ॥ केहि विधि मिरतक होय सजीवन। कहो विलोय नाथ अमृत धन ॥
धर्मदास जी ने पूछा कि मरने का भाव क्या है, कृपया मुझे समझाकर कहिए, जिससे मेरे मन की जिज्ञासा दूर हो। किस प्रकार यह जीव जीते जी मरकर उस अमृत को पा सकता है!
साहिब कहते हैं
धर्मदास यह कठिन कहानी। गुरु नाम ते कोई बिरले जानी ॥
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