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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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अनुरागसागर वाणी

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और मृतक भाव सुनि लेहू । निरखि परखि गुरु मग पग देहू ॥

जैसे उख किसान बनावै । रती रती कै देह कटावै ॥

कोल्हू महँ पुनि आप पिरावे । रस निसरै पुनि ताहि तपावै ॥

निज तन दाहे गुड़ पुनि होई । बहु रि ताव दै खाँड बिलोई ॥

ताहु माहिं ताव पुनि दीन्हा । चीनी तबहि कहावै लीन्हा ॥

चीनी होय बहुरि तन जारा । ताते मिसरी हूँ अनुसारा ॥

मिसरी ते जब कंद कहावा । कहै कबीर सबके मन भावा ॥

याही बिधि ते जो शिष सहई । गुरु कृपा सहजे भव तरई ॥

साहिब कह रहे हैं कि मृतक का और स्वभाव बताता हूँ । जैसे किसान खेत में गन्ना बोता है तो पहले वो गन्ना एक-एक करके काटता है; फिर कोल्हू में पेश जाता है और रस निकाला जाता है; फिर रस को कड़ाही में पकाया जाता है और तब जाकर वो गुड़ बनता है; फिर आँच पर लाल खाँड बनती है और फिर आँच पर जाकर सफेद चीनी बनती है । पुनः उस चीनी से मिसरी तैयार होती है और फिर कुज्जे वाली मिसरी के रूप में तैयार होकर सबके मन को भाती है । ऐसे ही जो शिष्य सब कुछ सहता हुआ गुरु मार्ग में दृढ़ रहता है, वो गुरु-कृपा से सहज ही भवसागर से पार हो जाता है ।

मृतक होय सो साधु, सो सतगुरु को पावई ।

मेटे सकल उपाध, तासु देव आसा करें ॥

सच्चा साधु वही है जो जीवित मृतक हो जाए और वो ही सदगुरु को पा सकता है । उसकी सब चिंता दूर हो जाती है और वो उस चौथे पद मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, जिसकी आशा देवता लोग भी करते हैं ।

साधु मार्ग कठिन धर्मदासा । रहनी रहे सो साधु सुवासा ॥

पाँचों इन्द्री सम करि राखे । नाम अमीरस निशि दिन चाखे ॥

साहिब कह रहे हैं—हे धर्मदास ! साधु मार्ग बड़ा ही कठिन है । जो गुरु आज्ञा में रहे, वो ही पहुँचा हुआ साधु है; जो पाँचों इन्द्रियों को एक