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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

साथ काबू में रखे और प्रतिदिन नाम रूपी अमृत का पान करे, वो साधु है।

प्रथमहिं चक्षु इन्द्री कहँ साधे। गुरु गम पंथ नाम अवराधे ॥

सुंदर रूप चक्षु की पूजा। रूप कुरूप न भावे दूजा ॥

रूप कुरूपहिं सम कर जाने। दरस विदेहि सदा सुख माने ॥

सबसे पहले वो नयन इन्द्री को वश में करे और गुरु-प्रेम के मार्ग पर चलते हुए नाम में लगा रहे। नयन सुन्दर रूप की पूजा करते हैं और कुरूपता को नहीं देखना चाहते, पर साधु को रूप-कुरूप दोनों के प्रति समान भाव रखते हुए आत्मा की ओर देखकर सदा सुख मानना चाहिए।

इन्द्री श्रवण वचन शुभ चाहै। उक्तव वचन सुनत चित दहै ॥

बोल कुबोल दोउ सम लेखे। हृदय शुद्ध गुरुज्ञान विशेषै ॥

कान इन्द्री अच्छे-अच्छे वचन ही सुनना चाहती है, उग्र, बुरे शब्द सुनते ही हृदय जलने लगता है, पर साधु को अच्छे-बुरे वचनों को समान समझना चाहिए।

नासिका इन्द्री सुबास अधीना। यहि सम राखै संत प्रवीना ॥

नासिका इन्द्री अच्छी सुगन्ध के अधीन रहती है, पर चतुर साधु को इस दृष्टि से भी समभाव से रहना चाहिए, उसे सुगन्ध की तरफ आकर्षित नहीं होना चाहिए।

जिभ्या इन्द्री चाहै स्वादू। खट्टा मीठा मधुर स्वादू ॥

सहज भाव में जो कछु आवै। रूखा फीका नहिं बिलगावै ॥

जो कोई पंचामृत ले आवै। ताहि देख नहिं हरष बढ़ावै ॥

तजे न रूखा साग अलूना। अधिक प्रेम सों पावै दूना ॥

जीभ इन्द्री विभिन्न प्रकार के खट्ट-मीठे स्वाद चाहती है, पर साधु को सहज में जैसा भी मिल जाए, चाहे वो रूखा-सूखा ही क्यों न हो, कुछ अन्तर नहीं पड़ना चाहिए यानी उसे जीभ इन्द्री के स्वाद के पीछे नहीं भागना चाहिए। यदि कोई पंचामृत ले आए तो ज्यादा खुश नहीं