भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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प्रस्तावना

प्रत्येक प्राणी स्वभावतः सुखप्राप्ति के लिये अनवरत कुछ न कुछ प्रयास करता रहता है । वस्तुतः सुख प्राप्त करना ही जीवन का परम उद्देश्य समझा जाता है, इसमें किसी का भी मतभेद नहीं है। परन्तु उसके सामने यह एक जटिल प्रश्न उठ खड़ा होता है कि वह सुख कैसे प्राप्त हो ? इसी के समाधान को दृष्टिकोण में रखते हुए महान आचार्यों ने कर्म के साथ-साथ उसके साधनों की जानकारी प्राप्त करना ही परम उपाय बतलाया है । उनमें भी ज्ञान के साथ कर्म का इतना गहरा सम्बन्ध है कि एक के बिना दूसरे का सफल होना असम्भव है ; ऐसा कहें तो कोई अत्युक्ति न होगी। इसीलिये जगन्नियन्ता परम- पिता प्रभु ने नानाविध विचित्र विश्वसर्जन कर्म कौशल को दर्शाते हुए विश्व को ही कर्ममय एवं ज्ञानमय करने की भावना से कर्म-ज्ञान के भण्डार वेद को ही अपना एक प्रतीक स्थापित किया है। उसी प्रभु की प्रेरणात्मक आज्ञा को वहन करते हुए महर्षि भगवान् जैमिनि ने कर्मप्रधान जगत् में प्राणिमात्र के कल्याणार्थ ऐहिकामुष्मिक उद्देश्यों के परम साधनभूत उत्तम कर्मों में प्रवृत्ति कराने की भावना से प्रेरित होकर मानवों को वेदार्थतत्त्वों की जानकारी प्राप्त कराने के लिये कर्म- काण्डप्रधान मीमांसा शास्त्र का द्वादश अध्यायों में निर्माण किया। उसी को पूर्वमीमांसा या कर्ममीमांसा कहते हैं । उससे वेदों के वास्तविक अर्थतत्त्वों का ज्ञान अच्छी तरह होता है । किन्तु उसमें अत्यन्त विशाल रूप से प्रतिपादित जटिलतम कर्मकलापों का ज्ञान कराने में समर्थ किसी सरलतम ग्रंथ को नहीं देखकर महामहोपाध्याय लौगाक्षि भास्कराचार्य ने उक्त मीमांसा शास्त्र में प्रवेश कराने के लिये सभी वैदिक यज्ञ-सम्बन्धी पदार्थों का संक्षेप में संग्रह कर ‘अर्थ- संग्रह’ नाम का ग्रन्थ बनाया। मीमांसा का सारभूत यह ग्रन्थ छोटा होने पर भी कितना उपादेय है यह विषय प्रायः किसी से छिपा नहीं है। अतएव प्रत्येक प्रान्त की संस्कृत परीक्षा में भी यह ग्रन्थ तत्तत्प्रान्तीय शिक्षासमिति द्वारा पाठ्य पुस्तकों में निर्धारित किया गया है। स्वतन्त्र भारत की वाणी ( हिन्दी ) से सुसज्जित होकर यह पुस्तक आज प्रथम बार राष्ट्रभाषा का अभिनन्दन करने जा रही है-यह एक महान हर्ष का विषय है, क्योंकि इसमें बहुत से ऐसे पारिभाषिक शब्द आ गये हैं, जिनके पूर्वापर सम्बन्ध के साथ वास्तविक भावार्थों को एक सरल एवं ठोस रूप में जानने के