अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २ ] लिये छात्रगणों को बहुत ही दिनों से बड़ी ही उत्कण्ठा बनी हुई थी । यद्यपि इसकी बहुत सी संस्कृत टीकायें प्रकाशित हो चुकी हैं तथापि अल्प समय में अत्यन्त सरल उपाय से विद्यार्थियों को समझाने के लिये वे अपर्याप्त ही मालुम पड़ती थीं । इसलिये आधुनिक युग के अनुसार एक सामयिक भाषा टीका का होना अत्यन्त ही आवश्यक समझा जाता था, जिसकी पूर्ति के लिये यह भगीरथ- प्रयास किया गया है । इस ग्रंथ के रचयिता महामहोपाध्याय लौगाक्षिवंशोद्भव प्रसिद्ध नामधेय महर्षि भास्कर हैं । आपने न्यायशास्त्र में भी प्रवेश कराने के लिये छात्रोपकारार्थ 'तर्ककौमुदी' नामक ग्रंथ रचा है । इससे स्थालीपुलाकन्यायेन आपका दर्शनशास्त्र- विषयक प्रगाढ पाण्डित्य सूचित होता है । प्रस्तुत संस्करण के हिन्दी टीकाकार त्यागमूर्ति स्वामी श्री टाटाम्बरी जी महाराज रामानन्द सम्प्रदाय के परम नैष्ठिक वैष्णव संन्यासी हैं । आपका सारा जीवन परोपकार में ही हमेशा लगा रहता है । आपने दर्शनशास्त्र का विशेष परिशीलन कर मीमांसा शास्त्र में अनुपम वैदुष्य प्राप्त किया है । अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी आपने छात्रों को अत्यन्त सुगमता से समझाने के लिये इस टीका में अत्यन्त सुन्दर एवं सरल पथ प्रदर्शित किया है । टीका में यत्र-तत्र आपने ग्रंथ के आशय को हृदय खोलकर रख दिया है—यह आपकी एक बड़ी विशेषता है। मुझे पूर्ण आशा है कि इस टीका से विद्यार्थियों को पूर्ण सहयोग मिलेगा । स्वामी टाटाम्बरी जी महाराज की इस स्तुत्य कीर्ति को निज अर्थव्यय से प्रकाशित करने वाले गोलोकवासी स्वनामधन्य श्रेष्ठिवर श्री हरिदास जी गुप्त के आत्मज चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालयाध्यक्ष बाबू श्री जयकृष्ण दास जी गुप्त महोदय भी विशेष धन्यवाद के योग्य हैं । आपने अपने ६२ वर्ष के वयोवृद्ध विश्वविख्यात चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय द्वारा जो अनवरत संस्कृत की सेवा की है, उसके लिये संस्कृत समाज ही नहीं प्रत्युत आज का स्वतन्त्र भारत भी आपका कृतज्ञ है । विनीत— वसन्त पंचमी | ताराकान्त झा शास्त्री वि० सं० २००९ | प्रधानाध्यापक श्री रघुवीर विद्यालय, शींगडा, काठियावाड़