भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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२ अर्थसंग्रहः—

बतलाते हैं। यथा—प्रतिपाद्य-प्रतिपादक भाव सम्बन्ध है। वेद-वेदांग पढ़कर धर्म जिज्ञासु अधिकारी है। धर्म विषय है। यद्यपि अधर्मका भी विचार है तथापि निराकरण करने के लिये ही उसका प्रतिपादन किया गया है। विचारित धर्मानुष्ठानसे होने वाला स्वर्गादि प्रयोजन है। तन्त्रारम्भकसूत्रावतरणम्। अथ परमकारुणिको भगवान्जैमिनिर्धर्मविवेकाय द्वादशलक्षणीं प्रणि- नीय तत्रादौ धर्मजिज्ञासां सूत्रयामास-‘अथातो धर्मजिज्ञासे'ति। अत्रा- थशब्दो वेदाध्ययनानन्तर्यवचनः। अतःशब्दो हि वेदाध्ययनस्य दृष्टार्थ- त्वं ब्रूते। धर्मविचारशास्त्रस्यावश्यकता। 'स्वाध्यायोऽध्येतव्य' इत्यध्ययनविधौ तदध्ययनस्यार्थज्ञानरूपदृष्टार्थ- कत्वेन व्यवस्थापनात्। तथा च वेदाध्ययनानन्तरं यतोऽर्थज्ञानरूपदृष्टा- र्थकं तदध्ययनमतो हेतोर्धर्मस्य वेदार्थस्य जिज्ञासा कर्त्तव्येति शेषः। जिज्ञासापदस्य विचारे लक्षणा। अतो धर्मविचारशास्त्रमिदमारम्भणीय- मिति शास्त्रारम्भसूत्रार्थः। परमकारुणिक भगवान् जैमिनि ने वेदाध्ययनके बाद धर्मविचारके लिये द्वादशाध्याय-लक्षणात्मक मीमांसा शास्त्रको हृदयमें रखकर निर्माणार्थ सर्वप्रथम धर्मजिज्ञासा-सूत्र बनाया। इस सूत्रमें भी अथ शब्द वेदाध्ययनानन्तर्यका ही वाचक है। यद्यपि अथ शब्दका कोशादिसे आनन्तर्यमात्र अर्थ प्रतीत होता है तथापि किसके अनन्तर यह आकांक्षा होनेपर वेदाध्ययनका लाभ होता है। "स्वाध्यायोऽ- ध्येतव्यः” इस अध्ययन विधिके विचारात्मक प्रथमाधिकरणमें वेदाध्ययनका वेदा- र्थज्ञानरूप दृष्ट प्रयोजन बतलाया है इसलिये इस सूत्रमें भी अतः शब्दसे वेदाध्ययनके दृष्टार्थत्व (दृष्टप्रयोजन) को, सूचित करते हैं। यहां पर 'कर्त्तव्या' इस पदका अध्याहारकर जिस हेतुसे वेदाध्ययनका अर्थज्ञानरूप दृष्ट प्रयोजन है इसलिये वेदा- ध्ययनके बाद वेदार्थधर्मकी जिज्ञासा करनी चाहिये। यहां पर जिज्ञासा शब्दका 'ज्ञान- विषयक इच्छा' अर्थ है और कृधातुका बनाना अर्थ है अतः इच्छा बनायी नहीं जा सकती क्योंकि जैसे घट, कुम्भकारके व्यापारका विषय होनेसे ही किया जाता है वैसे इच्छा किसीके व्यापारका विषय नहीं है और इच्छामात्रसे अनुष्ठानोपयोगी धर्म ज्ञान नहीं हो सकता। इसलिये ज्ञानार्थक ज्ञाधातुका अजहल्लक्षणासे अनुष्ठानोपयोगि ज्ञान