भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 230

हे शक्तिशाली वरुण! तुम ने जगत् के पालन करने वाले सूर्य से क्या कहा था? तुम सूर्य को दक्षिणा देते हो एवं मन से चिकित्सा करते हो. (१) न कामेन पुनर्मघो भवामि सं चक्षे कं पृश्निमेतामुपाजे. केन नु त्वमथर्वन् काव्येन केन जातेनासि जातवेदाः.. (२) मैं इच्छा मात्र से ही संपत्तिशाली नहीं बन गया हूं, अपितु सूर्य देव से प्रार्थना करता हूं. मैं यह सुख प्राप्त करता रहूं. हे ऋत्विज्! तुम किस विद्या और चातुर्य के द्वारा सभी जन्म लेने वालों के ज्ञाता बन गए हो? (२) सत्यमहं गभीरः काव्येन सत्यं जातेनास्मि जातवेदाः. न मे दासो नार्यो महित्वा व्रतं मीमाय यदहं धरिष्ये.. (३) यह सत्य बात है कि मैं काव्य अर्थात् अथर्व के द्वारा प्राप्त चतुरता से ज्ञानी बन गया हूं तथा अग्नि के समान सब का मार्गदर्शन करता हूं. मैं जिस व्रत को धारण करूंगा, उसे कोई भंग नहीं कर सकता. (३) न त्वदन्यः कवितरो न मेधया धीरतरो वरुण स्वधावन्. त्वं ता विश्वा भुवनानि वेत्थ स चिन्नु त्वज्जनो मायी बिभाय.. (४) हे स्वधा वाले वरुण! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी दूसरा विद्वान् मेधावी और वीर नहीं है. तुम सभी भुवनों को जानते हो, इसलिए सब लोग तुम से भयभीत रहते हैं. (४) त्वं ह्य १ ङ्ग वरुण स्वधावन् विश्वा वेत्थ जनिमा सुप्रणीते. किं रजस एना परो अन्यदस्त्येना किं परेणावरममुर.. (५) हे सुधा के पात्र एवं नीति पालक वरुण! तुम प्राणियों के सभी जन्मों को जानते हो. तुम सभी से मोह रखते हो. इस रजोगुण युक्त धन से श्रेष्ठ कौन सी वस्तु है. इस से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है. (५) एकं रजस एना परो अन्यदस्त्येना पर एकेन दुर्णशं चिदर्वाक्. तत् ते विद्वान् वरुण प्र ब्रवीम्यधोवचसः पणयो भवन्तु नीचैर्दासा उप सर्पन्तु भूमिम्.. (६) इस रजोगुण युक्त धन से श्रेष्ठ गुण युक्त धन है. सतोगुण युक्त से श्रेष्ठ ब्रह्म है. हे वरुण देव! तुम इस विषय के जानने वाले हो, इसलिए मैं तुम से निवेदन करता हूं कि बुरा व्यवहार करने वाले लोग मेरे सामने निकृष्ट वचन न बोलें और दास जन झुक कर चलें. (६) त्वं ह्य १ ङ्ग वरुण ब्रवीषि पुनर्मघेष्ववद्यानि भूरि. मो षु पर्णीँ रभ्ये ३ तावतो भून्मा त्वा वोचन्नराधसं जनासः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*