अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयम् यो अभिशोचयिष्णुर्विश्वा रूपाणि हरिता कृणोषि. तस्मै ते ऽरुणाय बभ्रवे नमः कृणोमि वन्द्याय तक्मने.. (३) सभी ओर से पूरे शरीर को शोकयुक्त करता हुआ, जो यह पित्त ज्वर है, वह सभी प्राणियों का रक्त दूषित कर के उन्हें हल्दी के समान पीला बना देता है. उस रक्त वर्ण एवं पीत वर्ण तथा सेवा करने योग्य ज्वर को नमस्कार है. (३) सूक्त-२१ देवता—चंद्रमा इमा यास्तिस्रः पृथिवीस्तासां ह भूमिरुत्तमा. तासामधि त्वचो अहं भेषजं समु जग्रभम्.. (१) ये जो पृथ्वी आदि तीन लोक हैं, उन में यह पृथ्वी उत्तम है, जिस पर हम स्थित हैं. पृथ्वी की त्वचा के समान ऊपर वर्तमान जो भूमि है, मैं उस पर उत्पन्न ओषधियों का संग्रह करता हूं. (१) श्रेष्ठमसि भेषजानां वसिष्ठं वीरुधानाम्. सोमो भग इव यामेषु देवेषु वरुणो यथा.. (२) हे हरिद्रा! तू अमोघ शक्ति के कारण अन्य भेषजों में उसी प्रकार प्रशंसनीय है तथा वीरुधों में मुख्य है, जैसे रात्रि और दिन के काल विभाग के कारण चंद्रमा एवं सूर्य मुख्य हैं. (२) रेवतीरनाधृषः सिषासवः सिषासथ. उत स्थ केशदृंहणीरथो ह केशवर्धनीः.. (३) हे धनवती ओषधियो! तुम किसी के द्वारा हिंसित नहीं हो. तुम आरोग्य देने के लिए इच्छुक हो, इसलिए मुझे आरोग्य प्रदान करो. तुम केशों को दृढ़ बनाने वाली हो, इसलिए मेरे केशों को दृढ़ करो. (३) सूक्त-२२ देवता—आदित्य रश्मि, मरुत् कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत् पतन्ति. त आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवीं व्यू दुः.. (१) कृष्ण वर्ण अंतरिक्ष को पा कर सूर्य की किरणें पृथ्वी के पदार्थों का रस ग्रहण करती हुई द्युलोक में पहुंच जाती हैं. वे सूर्य किरणें जल को सूर्य मंडल से वृष्टि के रूप में लाती हैं और बाद में धरती को जल से गीला कर देती हैं. (१) पयस्वतीः कृणुथाप ओषधीः शिवा यदेजथा मरुतो रुक्मवक्षसः. ebook converter DEMO Watermarks*