अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 366, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्वानों का समाज एवं संग्राम करने वाले योद्धा जनों का समूह मेरी रक्षा करे. सारे संसार की सृष्टि करने वाले प्रजापति की वे दोनों पुत्रियां मेरी रक्षा करें. जो मेरी रक्षा के विषय में एकमत हैं, उन से मैं संगत होऊं तथा विद्वान् मेरे समीप आ कर मुझे शिक्षा दें. हे सभासदजनो! जो मेरी कही बात का ‘साधुसाधु’ कह कर समर्थन करें, उन के साथ मिल कर मैं वादविवादों में न्याय युक्त उत्तर दूं. (१) विद्म ते सभे नाम नरिष्टा नाम वा असि. ये ते के च सभासदस्ते मे सन्तु सवाचसः.. (२) हे सभा! मैं तेरे नामों को जानता हूं. तेरा नाम नरिष्टा अर्थात् दूसरों के द्वारा अभिभूत न होने वाली है. तुझ से संबंधित जो सभासद हैं, वे सब मेरे समान वचन वाले अर्थात् मेरा अनुमोदन करने वाले हों. (२) एषामहं समासीनानां वर्चो विज्ञानमा ददे. अस्याः सर्वस्याः संसदो मामिन्द्र भगिनं कृणु.. (३) सभा में सामने बैठे हुए इन बोलने वालों के तेज और विज्ञान को मैं स्वीकार करता हूं. हे इंद्र! मुझे इस समुदाय में स्थित सभा का विजयी बनाओ. (३) यद् वो मनः परागतं यद् बद्धमिह वेह वा. तद् व आ वर्तयामसि मयि वो रमतां मनः.. (४) हे सभासदो! तुम्हारा जो मन हम से हट कर दूर चला गया है तथा जो मन इस विषय से संबंधित है, मैं तुम्हारे उस मन को अपने अनुकूल करता हूं. तुम्हारा मेरी ओर आया हुआ मन मेरे अनुकूल चिंतन करे. (४) सूक्त-१४ देवता—सूर्य यथा सूर्यो नक्षत्राणामुद्यंस्तेजांस्याददे. एवा स्त्रीणां च पुंसां च द्विषतां वर्च आ ददे.. (१) उदय होता हुआ सूर्य जिस प्रकार तारों का प्रकाश छीन लेता है, उसी प्रकार मैं द्वेष करने वाले स्त्रीपुरुषों के तेज का अपहरण करता हूं. (१) यावन्तो मा सपत्नानामायन्तं प्रतिपश्यथ. उद्यन्त्सूर्य इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आ ददे.. (२) शत्रुओं के मध्य में जिन शत्रुओं को मैं युद्ध के लिए आता हुआ देख रहा हूं, उन के तेज का अपहरण मैं उसी प्रकार करता हूं, जिस प्रकार सूर्य उदय के समय सोने वाले पुरुषों का तेज छीन लेते हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*