अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे ईर्ष्यायुक्त पुरुष! स्त्री के विषय में तेरा जो क्रोध है, उसे मैं त्वष्टा संबंधी मंत्र से दूर करता हूं. हे इस के पति! तेरा जो क्रोध है उसे भी मैं शांत करता हूं. (३) व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह. तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वै.. (४) हे व्रत के पालन कर्ता अग्नि! दर्श, पौर्णमास आदि यज्ञकर्मों द्वारा सम्मानित तुम सभी दिनों में प्रसन्न मन वाले हो कर हमारे घर में दीप्त बनो. हे जातवेद अग्नि! भलीभांति दीप्त तुम्हारे चारों और हम पुत्र, पौत्र आदि के साथ बैठें. (४) सूक्त-७९ देवता—गौ प्रजावतीः सूयवसे रुशन्तीः शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः. मा व स्तेन ईशत माघशंसः परि वो रुद्रस्य हेतिर्वृणक्तु.. (१) हे गायो! तुम संतान से युक्त, शोभन घास वाले प्रदेश में घास चरती हो तथा सुख से जल पीने योग्य तालाब आदि में जल पीती हो. तुम्हें कोई चोर न चुरा सके. बाघ आदि दुष्ट पशु भी तुम्हें न खा सकें. ज्वर के देव रुद्र के आयुध तुम्हें त्याग दें. (१) पदज्ञा स्थ रमतयः संहिता विश्वनाम्नीः. उप मा देवीर्देवेभिरेत. इमं गोष्ठमिदं सदो घृतेनास्मान्त्समुक्षत.. (२) हे गायो! तुम अपनी सहचरी गायों के खुरों के चिह्नों को जानो. बछड़ों एवं दूसरी गायों के साथ मिल कर तुम अनेक नामों वाली बनो. हे दीप्तिशालिनी धेनुओ! तुम देवों के सहित मुझ पुष्टि के इच्छुक के समीप आओ तथा यहां आ कर मेरी गोशाला, घर एवं मुझ गृहस्वामी को घी और दूध से सींचो. (२) सूक्त-८० देवता—अपचित ओषधि आदि आ सुस्रसः सुस्रसो असतीभ्यो असत्तराः. सेहोररसतरा लवणाद् विक्लेदीयसीः.. (१) अत्यधिक पीब टपकाने वाली और बाधा पहुंचाने वाले रोग के लक्षणों से भी अधिक कष्ट पहुंचाने वाली गंडमालाएं सभी ओर से बहने वाली बनें. तात्पर्य यह है कि मंत्र तथा ओषधि के प्रयोग से गंडमालाएं समाप्त हो जाएं. गंडमालाएं रुई से भी अधिक नीरस तथा नमक से भी अधिक भीगने वाली बनें. (१) या ग्रैव्या अपचितो ऽ थो या उपपक्ष्याः. ebook converter DEMO Watermarks*