भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 434, कुल 1063 में से

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ये अग्नि देव सभी प्रकार से बाधा पहुंचाने वाले राक्षसों का विनाश करते हैं. अग्नि देव दीप्ति प्रकाश वाले, मृत्यु रहित, शुद्ध और सब को पवित्र करने वाले हैं. (२६) सूक्त-४ देवता—मंत्र में बताए गए इंद्र आदि इन्द्रासोमा तपतं रक्ष उब्जतं न्यर्पयतं वृषणा तमोवृधः. परा शृणीतमचितो न्योषितं हतं नुदेथां नि शिशीतमत्रिणः.. (१) हे इंद्र और सोम! राक्षसों को संतप्त करो तथा मार डालो. हे अभिलाषाएं पूर्ण करने वालो! अंधकार में बढ़ने वाले ज्ञानहीन राक्षसों को निम्न गति प्रदान करो तथा अत्यधिक जलाओ. मनुष्यों का भक्षण करने वाले राक्षसों को मारो तथा मारे हुए राक्षसों को हम से दूर ले जाओ. इस प्रकार उन की संख्या कम करो. (१) इन्द्रासोमा समघशंसमभ्य १ घं तपुर्ययस्तु चरुरग्निमाँ इव. ब्रह्मद्विषे क्रव्यादे घोरचक्षसे द्वेषो धत्तमनवायं किमीदिने.. (२) हे इंद्र और सोम! अनर्थ बोलने वाले एवं पापी राक्षस को पराजित करो. वह राक्षस संताप को प्राप्त हो तथा अग्नि में डाले गए अन्न के समान जल जाए. तुम दोनों ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले मांसाहारी एवं अब किसे, अब किसे खाऊं कहते हुए राक्षस के पीछे द्वेष और विरोध धारण करो. (२) इन्द्रासोमा दुष्कृतो वव्रे अन्तरनारम्भणे तमसि प्र विध्यतम्. यतो नैषां पुनरेकश्चनोदयत् तद् वामस्तु सहसे मन्युमच्छवः.. (३) हे इंद्र और सोम! तुम दुष्कर्म करने वाले राक्षसों को ढकने वाले तथा बिना सहारे वाले अंधकार में धकेलो, जिस से अंधकार में पड़े हुए राक्षसों में से एक भी बाहर न आ सके. तुम दोनों का यह बल राक्षसों को हराने के लिए क्रोध युक्त हो. (३) इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवो वधं सं पृथिव्या अघशंसाय तर्हणम्. उत् तक्षतं स्वर्यं १ पर्वतेभ्यो येन रक्षो वावृधानं निजूर्वथः.. (४) हे इंद्र एवं सोम! अंतरिक्ष से वध का साधन आयुध एक बार ही चलाओ. पाप की बातें करने वाले राक्षसों के वध के लिए अपना आयुध पृथ्वी से भी एक बार ही चलाओ. उन के वध के लिए अपने हिंसक वज्र को तेज करो तथा शब्द करते हुए जिस आयुध वज्र से तुम ने मेघों से जल प्राप्त किया है, उस से राक्षसों का वध करो. (४) इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवस्पर्यग्नितप्तेभिर्युवमश्महन्मभिः. तपुर्वधेभिरजरेभिरत्रिणो नि पर्शने विध्यतं यन्तु निस्वरम्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*