अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 810, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहम श्मशान में अपने बांधव की मृत्यु के दुःख का त्याग करते हुए तथा शव के स्पर्श के पाप से मुक्त होते हुए अपने घर जाते हैं. इस प्रकार हम दुःख से छूट गए हैं. इस कारण हम पुत्र, पौत्र, पशु, सुवर्ण, धन, सुंदर गंध और वायु से संपन्न रहें. (१७) अञ्जते व्यञ्जते समज्जते क्रतुं रिहन्ति मधुनाभ्यञ्जते. सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षणं हिरण्यपावाः पशुमासु गृह्णते.. (१८) ऋत्विज् सोमयाग के आरंभ में यजमान की आंखों में अंजन लगाते हैं. सागर की वृद्धि के समय उदय होने वाले, रश्मियों द्वारा देखने वाले तथा प्रकाशमय चंद्रमा की रक्षा करने वाले सोम के रूप में स्थापित करते हुए हम चार थालियों में उस का शोधन करते हैं. (१८) यद् वो मुद्रं पितरः सोम्यं च तेनो सचध्वं स्वयशसो हि भूत. ते अर्वणः कवय आ शृणोत सुविदत्रा विदथे हूयमानाः.. (१९) हे पितरो! तुम अपने सोमरूपी धन के सहित हम से मिलो, क्योंकि तुम अपने यज्ञ के कारण यशस्वी हो. तुम हमें हमारा अभीष्ट प्रदान करो और बुलाए जाने पर हमारे आह्वान को सुनो. (१९) ये अत्रयो अङ्गिरसो नवग्वा इष्टावन्तो रातिषाचो दधानाः. दक्षिणावन्तः सुकृतो य उ स्थासद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम्.. (२०) हे पितरो! तुम अत्रि और अंगिरा गोत्र वाले हो. तुम नौ महीने तक सत्र याग करने के कारण स्वर्ग में आरोहण करने वाले होता हो. तुम दस मास वाला याग पूर्ण करने पर दक्षिणा देने वाले पुण्य आत्मा हो. इस कारण इस विस्तृत कुश पर बैठ कर हमारी हवि से तृप्ति करो. (२०) अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऋतमाशशानाः. शुचीदयन् दीध्यत उक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन्.. (२१) हे अग्नि! जिस प्रकार हमारे श्रेष्ठ पितर स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं, उसी प्रकार उक्थों का गान करने वाले पितर रात्रि के अंधकार को अपने तेज से दूर कर के उषाओं को प्रकाशित करते हैं. (२१) सुकर्माणः सुरुचो देवयन्तो अयो न देवा जनिमा धमन्तः. शुचन्तो अग्निं वावृधन्त इन्द्रमुर्वीं गव्यां परिषदं नो अक्रन्.. (२२) सुंदर कर्म तथा सुंदर तेज वाले देव काम्य तप से अपने जन्म का शोधन करने वाले देवत्व को प्राप्त हुए. गार्हपत्य अग्नि को प्रदीप्त करते हुए तथा अपनी स्तुतियों से इंद्र को प्रबुद्ध बनाते हुए वे पितर गायों को हमारे यहां निवास करने वाली बनाएं. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*