भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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पृष्ठ 809

पवित्र करें. (११) मित्रावरुणा परि मामधातामादित्या मा स्वरवो वर्धयन्तु. वर्चो म इन्द्रो न्यनक्तु हस्तयोरूर्जरदष्टिं मा सविता कृणोतु.. (१२) दिवस के अभिमानी देवता मित्र अर्थात् सूर्य तथा रात्रि के अभिमानी देव वरुण मुझे वस्त्र आदि प्रदान करें. आदित्य देव हम सब की वृद्धि करते हुए हमारे शत्रुओं को संतप्त बनाएं. इंद्र मुझे भुजाओं का बल दें तथा सविता मुझे दीर्घ आयु वाला बनाएं. (१२) यो ममार प्रथमो मर्त्यानां यः प्रेयाय प्रथमो लोकमेतम्. वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविषा सपर्यत.. (१३) यम मरणधर्मा मनुष्यों में उत्पन्न हुए थे. सब से पहले उन्हीं की मृत्यु हुई थी. इस के पश्चात ये दूसरे लोक में पहुंचे. यम सूर्य के पुत्र हैं. सभी प्राणी मृत्यु के पश्चात इन्हीं के पास जाते हैं. हे ऋत्विजो! इन यम का पूजन करो जो सब को पाप और पुण्य के अनुसार फल देते हैं. (१३) परा यात पितर आ च यातायं वो यज्ञो मधुना समक्तः. दत्तो अस्मभ्यं द्रविणेह भद्रं रयिं च नः सर्ववीरं दधात.. (१४) हे पितरो! तुम हमारे पितृयाग नामक कर्म से संतुष्ट हो कर अपने स्थान की ओर जाओ. हम जब तुम्हारा पुनः आह्वान करें, तब आना. हम ने तुम्हें मधु और घृत से युक्त यज्ञ दिया है. तुम इस यज्ञ को स्वीकार कर के हमारे घर में मंगलमय ऐश्वर्य तथा पुत्रों, पौत्रों, पशुओं आदि को स्थापित करो. (१४) कण्वः कक्षीवान् पुरुमीढो अगस्त्यः श्यावाश्वः सोभर्यर्चननाः. विश्वामित्रो ऽ यं जमदग्निरत्रिरवन्तु नः कश्यपो वामदेवः.. (१५) पूजा के योग्य कण्व, कक्षीवान, पुरुमीढ, अगस्त्य, श्यावाश्व, सौभरि, विश्वामित्र, जमदग्नि, अग्नि, कश्यप तथा वामदेव नाम वाले अनेक ऋषि हमारे रक्षक हैं. (१५) विश्वामित्र जमदग्ने वसिष्ठ भरद्वाज गोतम वामदेव. शर्द्दिनों अत्रिरग्रभीन्नमोभिः सुसंशासः पितरो मृडता नः.. (१६) हे विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ, भारद्वाज, गौतम, वामदेव नामक महर्षियो! तुम हमें सुख प्रदान करो. महर्षि अत्रि ने हमारे घर रक्षा करना स्वीकार कर लिया है. हे पितरो! तुम हमारे नमस्कार आदि के द्वारा पूजने के योग्य हो. तुम भी हमें सुख प्रदान करो. (१६) कस्ये मृजाना अति यन्ति रिप्रमायुर्दधानाः प्रतरं नवीयः. आप्यायमानाः प्रजया धनेनाध स्याम सुरभयो गृहेषु.. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*