भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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एकादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ८९

मृत्यु पर तीन दिन-रात्रि का, एक दिन-रात्रि का या एक दिन का या उससे भी कम का आशौच होता है ॥ २८ ॥

टि०—तीर्थ का अर्थ है गुरु, सतीर्थ से एक ही गुरु वाले अर्थ लिया गया है 'समानो गुरुः यस्य इति' । ब्यूह्लर ने इसके दूसरे प्रकार के अर्थ एक ही उपाध्याय से विद्या ग्रहण करने वाले, का निर्देश कर, पाणिनि ४.४.१०७ की काशिका वृत्ति का सन्दर्भ दिया है ।

अत्राऽपि त्रिरात्रमहोरात्रं पक्षिणीति । तीर्थशब्देन गुरुरुच्यते समानो गुरुर्यस्येति विग्रहः । सब्रह्मचारी सहाध्यायी । एषु मृतेषु यथोक्तं त्रिरात्रादिर्भवति ॥ २८ ॥

गर्भस्रावे गर्भमाससम्मता रात्रयः स्त्रीणाम् ॥२९ ॥

अनु०—गर्भस्राव होने पर जितने मास का होकर गर्भ स्रुत हुआ हो उतने दिन और रात्रियों का आशौच स्त्रियों ( उस स्त्री ) के लिए होता है ॥ २९ ॥

त्रिमासे गर्भस्स्रुतो भवति यदि तावन्त्यहोरात्राणि । एवं चतुर्थादिष्वपि । स्त्रीग्रहणात् जननादर्वाक् वृत्ते न पुरुषस्याऽऽशौचम् ॥ २९ ॥

परशवोपस्पर्शनेऽनभिसन्धिपूर्वं सचेलोऽपः स्पृष्ट्वा सद्यश्शुद्धो भवति ॥ ३० ॥

अनु०—विना जाने-बूझे दूसरे के शव को छू देने पर पहनें हुए वस्त्रों के साथ स्नान करने पर तत्काल शुद्ध हो जाता है ॥ ३० ॥

टि०—'परशव' से असपिण्ड के शव से तात्पर्य है । अभिसन्धि का अर्थ है 'जान-बूझ कर, इच्छापूर्वक अनभिसन्धि'—विना ज्ञान के । यहाँ जल के स्पर्श से जल में स्नान का अर्थ लिया जायगा । गौतम ने भी वस्त्रों सहित स्नान का नियम बताया है 'पतितचण्डालसूतिकोदक्याशवस्पृष्टितत्स्पृष्ट्युपस्पर्शने सचैलोदकोपस्पर्शनाच्छुद्ध्येत् । २.३.२८. पृ० १५१ पर ।

परशवः असपिण्डशवः । कथम् ? असवर्णशवस्पर्शने वहने चोभयत्राऽऽशौचान्तरविधानात् । अभिसन्धिः कामः, तदभावोऽनभिसन्धिः । अपां स्पर्शनमवगाहनम् । तत्सद्य एव कुर्वीत, न विलम्बयेत् ॥ ३० ॥

अभिसन्धिपूर्वं त्रिरात्रम् ॥ ३१ ॥

अनु०—जान बूझ कर शव का स्पर्श करने पर तीन दिन तथा रात्रि का आशौच होता है ॥ ३१ ॥

अनन्तरोक्तविषय एव ॥ ३१ ॥