बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८८ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ आशौचविधिः
अत्राऽप्यसपिण्डेषु यथाऽऽसन्नं त्रिरात्रमहोरात्रमेकाहमिति कुर्वीत ॥ २५ ॥
अनु०— इस स्थिति में जो सपिण्ड न हों उनमें भी संबन्ध की निकटता के अनुसार तीन दिन-रात्रि, एक दिन-रात्रि अथवा एक दिन का या उससे कम समय का आशौच होता है ॥ २५ ॥
टी०— इस विषय में गौतम धर्मसूत्र में भी असपिण्डों के लिये पक्षिणी आशौच (दो दिन और उनके मध्य की रात्रि, या दो रात्रियां और उनके मध्य के दिन) होता है । 'असपिण्डे योनिसंबन्धे सहाध्यायिनि च' इत्यादि २.५.१८ देखिये मेरे अनुवाद सहित संस्करण, चोखम्बा प्रकाशन, पृ० १४८
साम्प्रतं सपिण्डाशौचं कर्तव्यम् । तन्न तावत्समानोदकाशौचमुच्यते—इतिकरणात् सद्यशौचम् । अहोरात्रशब्देन पक्षिण्युपक्षिप्ता । वृत्तस्वाध्यायापेक्षश्चाऽयं विकल्पः । वृत्तनिमित्तानि चाऽध्ययनविज्ञानानि कर्माणीति द्वयेकगुणनिर्गुणानां व्युत्क्रमेणैते पक्षा भवन्ति ॥ २५ ॥
आचार्योपाध्यायतत्पुत्रेषु त्रिरात्रं^१ पक्षिण्येकाहम् ॥ २६ ॥
अनु०— आचार्य, उपाध्याय और उनके पुत्रों की मृत्यु पर क्रमशः तीन रात और दिन का पक्षिणी (दो रात्रि और मध्यवर्ती दिन, या दो दिन और मध्यवर्ती रात्रि), तथा एक दिन का आशौच होता है ॥ २६ ॥
टी०— मूल पुस्तकों में 'पक्षिण्येकाहम्' पाठ नहीं है । गोविन्द स्वामी की प्रति में यही पाठ है, जिसके अनुसार उन्होंने व्याख्या की है । गौतम धर्मसूत्र में आचार्य, आचार्यापत्नी, यजमान और शिष्य की मृत्यु पर तीन दिन का आशौच विहित है । २.५.२६, पृ० १५१ पर ।
आचार्ये प्रेते त्रिरात्रम् । उपाध्याये पक्षिणी । तयोः पुत्रेष्वेकाहम् ॥ २६ ॥
ऋत्विजां च ॥ २७ ॥
अनु०— ऋत्विज् की मृत्यु पर भी तीन दिन और रात्रि का आशौच होता है ॥ चशब्दाद्याज्यस्य च । त्रिरात्रमृत्विजां च ॥ २७ ॥
शिष्यसतीर्थसब्रह्मचारिषु त्रिरात्रमहोरात्रमेकाहमिति कुर्वीत ॥२८॥
अनु०— शिष्य, समान गुरुवाले, साथ ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करने वाले की
१. पक्षिण्येकाहमिति नाऽस्ति मूलपुस्तकेषु सर्वेष्वपि ।