बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [वेदपारायणविधिः
अनु०—शुद्ध वस्त्र पहने अथवा वृक्ष की छाल के वस्त्र के रूप में धारण करे॥२॥ चीरं चिरकालिकं जीर्णमित्यर्थः । न चैतावतोपभुक्तं वासोऽभ्यनुज्ञातं भवति । 'अहतं वाससां शुचिः' इति नियमात् । समुच्चयार्थो वाशब्दः पूर्वे- स्मिन् । उत्तरत्र तु विकल्पार्थः ॥ २ ॥
हविष्यमन्नमिच्छेद्पः फलानि वा ॥ ३ ॥
अनु०—यज्ञ के लिए योग्य ( क्षारलवणवर्जित ) अन्न अथवा जल या फलों के आहार की ही इच्छा करे ॥ ३ ॥ हविष्यमक्षारलवणम् । यदि मन्येतोपवत्स्यामीति तदेतद्वेदितव्यम् । इतर- थाऽनशनत्वविरोधात् ॥ ३ ॥
ग्रामात्प्राचीं वोदीचीं वा दिशमुपनिष्क्रम्य गोमयेन गोचर्ममात्रं चतुरश्रं स्थण्डिलमुपलिप्य प्रोक्ष्य लक्षणमुल्लिख्याऽद्भिरभ्युक्ष्याऽग्नि- मुपसमाधाय सम्परिस्तीर्यैताभ्यो देवताभ्यो जुहुयात् ॥ ४ ॥
अनु०—गांव से निकलकर पूर्व या उत्तर दिशा को जाय, गोबर से गोचर्म के बराबर चौकोर भूमि को लीपकर उस पर जल छिड़के, उस पर चिह्न अंकित करे और जल छिड़ककर अग्नि का उपसमाधान करे अग्नि के चारो ओर कुश फैलाए और इन देवों के लिए हवन करे—॥ ४ ॥
उपनिष्क्रम्य शुचौ देशे गोमयेनोपलिप्ते प्रोक्ष्य लक्षणमुल्लिख्य स्थण्डिलं कृत्वेत्यर्थः । सम्परिस्तीर्याऽऽज्यं विलाप्योत्पूय । नाऽत्र दार्श्विहोमिकं तन्त्रं विद्यते ॥ ४ ॥
अग्नये स्वाहा सोमाय स्वाहा प्रजापतये स्वाहा विश्वेभ्यो देवे- भ्यः स्वयम्भुव ऋग्भ्यो यजुर्भ्यो सामभ्यो ऽथर्वभ्यश्श्रद्धायै प्रज्ञायै मेधायै श्रियै ह्रियै सवित्रे सावित्र्यै सदसस्पतयेऽनुमतये च व्याहरेन्न चान्तरा विरमेत् ॥ ५ ॥
अनु०—अग्नि को स्वाहा, सोम को स्वाहा, प्रजापति को स्वाहा, सभी देवों के, स्वयम्भू, ऋक्, यजुस्, साम, अथर्वन्, श्रद्धा प्रज्ञा, मेधा, श्री, ह्री, सवितृ, सावित्री, सदसस्पति, अनुमति के लिए हवन कर वेद के आरम्भ से निरन्तर पारायण करे । बीच में कोई और बात न करे और न बीच में रुके ॥ ५ ॥
व्याहरणमवैदिकशब्दोच्चारणम् । विरामोऽवसानम् । अन्तरा स्वाध्याय- मध्ये । सन्ततविधानादेव सिद्धे अन्तरा विरमणनिषेधात् नैमित्तिकेऽनध्याये-