बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ उपनयनकालः |
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उष्णीषमजिनमुत्तरीयमुपानहौ छत्रं चौपासनं दर्शपूर्णमासौ च ॥६॥
**अनु०—**उष्णीष (पगड़ी) अजिन का उत्तरीय, जूता और छत्र धारण करे अग्नि का आधान करे, दर्श और पूर्णमास का स्थालीपाक करे ॥ ६ ॥
एतेऽप्यस्य भवेयुरिति शेषः। उष्णीषं शिरोवेष्टनं, अजिनमुत्तराय उभयमपि भवेदित्यर्थः। औपासनं एकाग्निपरिचरणं, तदेवौपासनशब्देनाऽऽह—दर्शपूर्णमासौ च स्थालीपाकविधानेन कर्तव्यौ ॥ ६ ॥
पर्वसु च केशश्मश्रुलोमनखवापनम् ॥ ७ ॥
**अनु०—**पर्वों पर केश, दाढ़ी-मूँछ, लोम को बनवावे तथा नखोंको कटवाये॥७॥
कर्तव्यमिति शेषः। केशा मूर्धजाः। श्मश्रुमुखजम्। लोमगुह्यप्रदेशजम्। नखाः करजादयः ॥ ७ ॥
तस्य वृत्तिः ॥ ८ ॥
**अनु०--**अब उस स्नातक की जीवन-वृत्ति का विधान किया जाता है ॥ ८ ॥
**टि०—**गोविन्द के अनुसार 'तस्य' से गृहस्थ का भी अर्थ गृहीत होता है।
तस्य स्नातकस्य वृत्तिः यात्रा जीवनोपायो वक्ष्यते। प्रकृतेऽपि स्नातके तस्य ग्रहणं वृत्तिव्यतिरिक्तधर्माणां गृहस्थस्याऽपि प्रवेशार्थम् ॥ ८ ॥
ब्राह्मणराजन्यवैश्यरथकारेष्वामं लिप्सेत ॥ ९ ॥
**अनु०--**ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और रथकारसे बिना पका हुआ अन्न माँगे ॥९॥
आमग्रहणात् पक्वप्रतिषेधः। आमाभावे पक्वयाचनं चाऽनुज्ञायते। तथा च वसिष्ठः 'क्षुधा परीतस्तु किञ्चिदेव याचेत' इति प्रक्रम्य 'धान्यमन्नं वा न तु स्नातकः क्षुधाऽवसीदेदित्युपदेशः' इति। क्षुन्निवृत्तिसमर्थस्य द्रव्यस्यैव विधिः ॥ ९ ॥
तदभावे—
भैक्षं वा ॥ १० ॥
**अनु०--**अथवा अनेक व्यक्तियों से भिक्षा मांगकर जीवन-निर्वाह करे ॥ १० ॥
**टि०—**गोविन्दस्वामी के अनुसार इस सूत्र का यह भाव है कि विपत्ति में अनेक लोगों से भी भिक्षा माँग सकता है।
भिक्षाणां समूहो भैक्षं, आपदि बहुभ्यो याचेतेत्यर्थः ॥ १० ॥
याच्ञावस्थायाम्—
वाग्यतस्तिष्ठेत् ॥ ११ ॥