भारतकोश
बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

Devanagarihipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 122 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 10

8 साहिब बन्दगी

अंदर धुनें हैं। कुछ इसे सुरति शब्द अभ्यास भी कह रहे हैं और उनमें खो जाते हैं। कुछ धुनों को ही परमात्मा कह रहे हैं। पर इससे तुरीयातीत की अवस्था से पार नहीं जा सकते हैं। सबका अपना वजूद है। धुनें ख़त्म हो जाती हैं। फिर यह कौन-सा शब्द हुआ! यानी धुनात्मक शब्द भी नहीं है, वर्णनात्मक शब्द भी नहीं है। साहिब कह रहे हैं- ‘सो तो शब्द विदेह ॥’ भाव शरीर से बाहर मूकात्मिक शब्द है अर्थात् बिना आवाज़ का शब्द, आवाज़ रहित धुन (Sound less sound) है वो, क्योंकि – ‘दो बिन होय न अधर अवाज़ा ॥’ आवाज़ दो तत्व के टकराने के बिना नहीं होती और जहाँ आवाज़ है, वहाँ माया है।

हद टप्पे सो औलिया, बे-हद टप्पे सो पीर। हद-बेहद दोनों टप्पे, तिसका नाम कबीर॥

कालान्तर में जितने भी रूहानियत की बात करने वाले सन्त महात्मा हुए सबने निर्विवाद रूप से उनकी बात एवं सिद्धान्त को स्वीकार किया। हर पहलू को अत्यन्त सावधानी के साथ छुआ। सहज साधन के सिद्धान्त को समाज तक पहुंचाया कि हम किस तरह गृहस्थ आश्रम में रहते हुए परमतत्व की साधना कर सकते हैं। सुषमना नाड़ी को किस तरह खोलकर ब्रह्माण्ड की यात्रा की जा सकती है। इन रहस्यों को आम आदमी की भाषा में बोला :

“खेल ब्रह्माण्ड का पिण्ड में देखिया, जगत की भर्मना दूर भागी। बाहरा भीतरा एक आकाशवत्, सुषमना डोर तह पलट लागी॥ पवन को पलट कर शुन्य में घर किया, घर औ अधर में भरपूर देखा। कह्रै कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्य दीदार देखा॥ देख दीदार मस्त होय रहूं, सकल भरपूर है नूर तेरा। सुभग दरियाव जहाँ हंस मोती चुगे, काल का जाल तहां नाहीं तेरा॥ ज्ञान का थाल औ सहज मति पथ है, धर अधर में अगम किया डेरा। कहै कबीर तहाँ भ्रम भासै नहीं, आवागमन का मिटा फेरा॥

यह शब्द शुद्ध अध्यात्म जगत् के अन्दर ले जाते हैं यदि आप देखें तो पाएंगे ग्रन्थ साहिब में कबीर साहिब की वाणी को बहुत ही ऊंचा स्थान दिया गया है। दादू दयाल जी ने कबीर साहिब के लिए लिखा है।

केते सन्ता कूप है, केते सरिता नीर। दादू अगम अथाह है, दरिया सत्य कबीर॥ कः कलौ केवलः सार्थो विद्वेषपरिकीर्तियतः। ऋद्धि शुभसमासेन यः कबीरः स योच्यते॥

अर्थात् (क) कलियुग में जीवों के साथ है। (ब) बोध रूप होकर पापों का नाश करता है (र) सबके हृदय में मिल रहा है, उसको कबीर कहते हैं।
बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई) · पृष्ठ 10, कुल 122 में से · BharatKosha