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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

Devanagarihipublished122 पृष्ठ

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32. साहिब जी को जिंदा जलाया जाना

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(32) साहिब जी को जिंदा जलाया जाना

साहिब की बार-बार कसनी लेता हुआ शेख तकी अपनी नाकामयाबी पर घबरा गया था। घबराहट से परेशान होकर वह नित्य नये-नये षड्यंत्र रच रहा था। उसने अपने सभी पाखण्डियों से मिलकर साहिब को जिंदा जलाने की योजना बनाई। किसी ने उसे बताया कि यदि अलसी के तेल में कपड़ा भिगोकर किसी के ऊपर डाल दो और फिर उसमें आग लगा दो तो वो व्यक्ति शीघ्र ही जलकर मर जाता है। तकी को योजना पसंद आई। उसने अलसी का तेल और कुछ कपड़े मँगवाए। फिर शेख तकी ने सिपाहियों से कहा कि इन कपड़ों को तेल में अच्छी तरह से भिगोकर साहिब के शरीर पर बाँध दो। सिपाहियों ने हुक्म का पालन किया। साहिब बड़े शांत भाव से उसकी हरकतें देख मुस्करा रहे थे, उसे कुछ कह नहीं रहे थे, क्योंकि साहिब तो अर्न्तयामी थे।

साहिब के शरीर पर तेल से भीगे कपड़ों को आग लगा दी गयी और सारे कपड़े जलकर राख हो गये। पर साहिब का तो कुछ बिगड़ा ही नहीं। उन्हें तो तनिक भी आँच नहीं आई। शेख तकी और उसके सब साथियों को फिर लज्जित होकर जाना पड़ा।

धर्म के ठेकेदारों मिलके, एक नयी तरकीब बनाई।
तेल से भीगा कपड़ा लिपटा, साहिब को आग लगाई॥
कपड़े जलकर राख हो गए, आग साहिब को छू न पाई।
जीव चेतावन आये साहिब, दुनिया उलटा मारन जाई॥

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33. साहिब जी को काठ की कोठरी में बिठाकर आग लगाई गयी

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(33) साहिब जी को काठ की कोठरी में बिठाकर आग लगाई गयी

साहिब की बढ़ती हुई रोज-रोज की ख्याति को देख सभी, शेख तकी और उनके साथी मुल्ला, मौलवियों और पंडितों का हृदय क्रोध की आग से जल रहा था। साहिब को रास्ते से हटाने अथवा मारने के लिए नए-नए षड्यंत्र रचे जा रहे थे। एक दिन शेख तकी के साथी पाखण्डियों द्वारा साहिब को काठ की कोठरी में डाल कर आग लगाने की युक्ति बताई गयी। तकी ने युक्ति को सराहते हुए मान लिया। कुशल मिस्त्रियों को बुलवाकर उसने कहा कि ऐसी लकड़ी की कोठरी तैयार करो, जो जल्दी आग पकड़ सके और अंत तक जले। मिस्त्रियों ने शीघ्र ही ऐसी कोठरी तैयार कर दी। फिर शेख तकी साहिब के पास गया और उन्हें उस कोठरी में बैठने को कहा। साहिब भी बिना किसे रुकावट के उसमें बैठ गये। शेख तकी का आदेश पाते ही सिपाहियों ने कोठरी पर तेल छिड़का और उसमें आग लगा दी। कोठरी तो जलकर राख हो गयी, पर साहिब का कुछ नहीं बिगड़ा। यह देख सब हैरान रह गये। साहिब का आग द्वारा कुछ न बिगाड़ पाने वाली बात जंगल की आग की तरह सारे राज्य में फैल गई और चारों ओर साहिब की जय-जयकार होने लगी।

सभी पाखंडियाँ मिलकर एक, काठ कोठरी तैयार कराई। कबीर गुसाईं बीच बिठाकर, तेल डालकर आग लगाई॥ काठ कोठरी राख बन गई, आग साहिब तक पहुँच न पाई। यह देख सब चकित रह गए, जयकारों की झड़ी लगाई॥

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34. साहिब जी को फाँसी पर लटकाया जाना

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(34) साहिब जी को फाँसी पर लटकाया जाना

पीरों के पीर कबीर साहिब का शेख तकी कसनियाँ ले लेकर परेशान हो गया था पर वो साहिब का कुछ भी बिगाड़ नहीं पा रहा था। एक दिन धर्म गुरु शेख तकी ने अपने साथी मुल्ला, मौलवियों और पंडितों से मिलकर सलाह बनाई कि क्यों न कबीर को फाँसी पर लटका दिया जाये। उसकी हर कोशिश बेकार हो रही थी। पर वो फिर भी साहिब को पहचान नहीं पा रहा था और साहिब को जादूगर समझ नयी-नयी युक्तियाँ सोच रहा था। पहली योजनाओं में शेख तकी ने कभी साहिब को जिंदा जलाया, कभी सात तालों के अलग-अलग हिस्से वाले मकान में बंद करवाया तथा दीवार में चिनवाया, पर बार-बार वह असफल रहता। क्रोध की आग से जलते हुए शेख तकी ने जल्लादों से फाँसी का तख्ता तैयार करवाया और साहिब को वहाँ ले गया। तकी का हुक्म पाकर जल्लादों ने साहिब को फाँसी पर लटका दिया। साहिब बहुत देर तक उसके साथ झूलते रहे, पर फाँसी का रस्सा साहिब का कुछ भी न बिगाड़ सका। यह देख शेख तकी और उनके पाखण्डी साथी बड़े लज्जित और दुःखी होकर वहाँ से मूँह नीचा करके चले गये।

साहिब को जादूगर समझ, कसनी के नये ढंग बनाये। हुआ फरमान धर्म गुरु का, फाँसी वाले हुक्म सुनाये॥ तुरंत हुक्म पर अमल हो गया, साहिब को दिया लटकाए। बड़ी देर तक लटके साहिब, पाखण्डी कुछ बिगाड़ न पाए॥

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35. साहिब जी को गाय के खून से नहलाया जाना

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(35) साहिब जी को गाय के खून से नहलाया जाना

धर्मगुरु होने के साथ-साथ शेख तकी राजा का वज़ीर भी था। वो साहिब को मारने के नये-नये षड्यंत्र रच रहा था जिस कारण हर कोई उसकी आज्ञा का पालन करता था। दूसरी ओर साहिब ने भी राजा से कहकर शेख तकी को अपनी मनमानी करने की छूट दे रखी थी। किसी भी तरह से साहिब का कुछ भी न बिगड़ते देख शेख तकी ने एक बार विचार किया कि क्यों न साहिब को सारे समाज के सामने नीचा दिखाया जाए। यह सोच उसने एक गाय मँगवाई और उसका गला कटवा कर खून एक बर्तन में इक्ट्ठा करवाया। उसने सिपाहियों को समझा दिया कि मेरा इशारा पाकर राजदरबार में यह खून से भरा बर्तन साहिब के सिर पर डाल दिया जाए। जब राजदरबार लगा था और साहिब सबके बीच विराजमान होकर सत्य भक्ति का उपदेश दे रहे थे तब तकी का आदेश पाकर उसके सिपाहियों ने खून से भरा बर्तन साहिब के सिर पर उड़ेलना शुरू कर दिया। पर यह क्या ! सब हैरान थे वो खून तो भाप बनकर ऊपर आकाश में उड़ता चला जा रहा था। जैसे-जैसे वो बर्तन उड़ेलते थे, वे सब हैरान थे खून उर्द्धमुख होकर आकाश में उड़ता जाता था। शेख तकी ने यह गंदी हरकत साहिब को नीचा दिखाने के लिए की, उन्हें मानसिक पीड़ा देने के लिए की, पर अंत में उसे ही पीड़ा हुई। साहिब की तो सब ओर जय-जयकार ही सुनाई दे रही थी पर शेख तकी लज्जित हो रहा था।

देखो धर्म गुरु का कारा, गाय मार कर खून ले आया। नीचा दिखावन हेतु साहिब को, शीश पै खून गिराया॥ सत्संग करते साहिब ऊपर, डाला खून कटोरा। खून भाप बन उड़ गया, अहंकार तकी का तोड़ा॥

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36. साहिब जी को तेज़ धार वाले हथियारों से गड़े हुए कुँए में डाला जाना

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(36) साहिब जी को तेज़ धार वाले हथियारों से गड़े हुए कुँए में डाला जाना

क्रोध और ईर्ष्या की आग में जलते हुए एक बार शेख तकी ने अपने सहयोगियों, मुल्लाओं, पंडितों आदि से गंभीर परामर्श करके एक और षड्यंत्र रचा। उन्होंने योजना बनाई कि एक गहरा कुँआ खुदवाकर उसमें नोकीले हथियार लगा कर कबीर को कुँए में डाल दिया जाए। शेख तकी ने योजना स्वीकार कर अमल शुरु कर दिया। शेख तकी ने एक गहरा कुँआ खुदवाकर उसमें तेज़ धार वाले हथियारों को इस तरह गड़वा दिया कि उनकी नोक ऊपर की ओर रहे। फिर एक दिन उसने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि कबीर को जंज़ीरों से बाँधकर कुँए के पास ले आओ। वहाँ लाकर धर्म गुरु शेख तकी ने उन्हें आदेश दिया कि कबीर को कुँए में धकेल दो। उन्होंने ऐसा ही किया। शेख तकी को विश्वास था कि उसकी यह युक्ति फेल नहीं होगी और उसे पूर्ण सफलता मिलेगी। जैसे ही जज़ीरों से बाँधे हुए साहिब को उस कुँए में धकेला गया, तकी की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। उसने सोचा कि अब हमेशा के लिए साहिब से छुटकारा मिल ही गया। उसके साथी आपस में साहिब के अंत की बातें कर रहे थे कि साहिब कुँए के बाहर हँसते हुए दिखाई पड़े। सबकी आँखें झुक गईं और सिर नीचा कर सब वहाँ से लज्जित होकर चले गए।

पंडित मुल्ला रचे षडयंत्र, कैसे कबीर को मार मुकाएँ।
तेज नोकीले हथियार कुँए के, बीचो बीच गड़वाए॥
हाथ-पाव बाँध साहिब के कुँए में डलवाया।
खुश हुए सब पाखण्डी, अब छुटकारा पाया॥

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37. साहिब जी को पानी में पारा मिलाकर पिलाना

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(37) साहिब जी को पानी में पारा मिलाकर पिलाना

हर पासे साहिब की जय-जयकार हो रही थी। साथ ही शेख तकी और पंडित, मौलवियों आदि की ईर्ष्या भी बढ़ती जा रही थी। उन्होंने साहिब को मारने के लिए फिर एक नयी योजना बनाई। उन्होंने शेख तकी को सलाह दी कि कबीर का अंत करने के लिए क्यों न उसे पानी में पारा डालकर पिला दिया जाए। पारा तो शरीर से फूट-फूटकर निकलता है और प्राण लेकर ही जाता है। शेख तकी को यह तरकीब बहुत पसंद आई। उसने किसी को भेजकर बाज़ार से पारा मँगवा लिया। फिर शेख तकी ने उसे पानी में इस तरह मिलाया कि पारे के होने का पता नहीं चलता था। पारा मिला पानी का गिलास लेकर शेख तकी साहिब के पास आया और वो पानी साहिब को पीने के लिए दिया। हाथ में गिलास पकड़ते ही वो जल भाप बनकर आकाश में उड़ गया। साहिब ने कहा कि यह गिलास तो खाली है। यह देख शेख तकी बड़ा लज्जित हुआ। साहिब तो अन्तर्यामी थे पर शेख तकी नहीं जानता था कि साहिब क्या चीज़ हैं। शेख तकी तो साहिब को साधारण मनुष्य समझने की भूल कर रहा था।

पंडित मुल्ला सब ने मिलके, नया प्रपंच रचाया। खुश हुये सब पाखण्डी, पारे से कोई बच न पाया।। पानी पारे से भरा गिलास, साहिब हाथ थमाया। पारा पानी उड़ा भाप बन, जब साहिब को पकड़ाया।।

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38. बराह के खून को साहिब जी पर डालना

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(38) बराह के खून को साहिब जी पर डालना

आम समाज को अपने ईशारों पर चलाने वाले मौलवियों, मुल्लाओं, पंडितों आदि की नींद हराम हो गयी थी। उनकी आमदनी बहुत कम हो गयी थी। वो साहिब की बढ़ती शान न सहते हुए साहिब का अंत करना चाहते थे। अंत नहीं कर पाते तो अपमानित करके नीचा दिखाने की सोचते ताकि लोग साहिब के पास न जाएँ और उनकी आमदनी फिर बढ़ने लगे। उन्होंने षड्यंत्र रचा कि भरी सभा में साहिब के सिर पर बराह का खून डाल कर अपमानित किया जाए।

योजना अनुसार शेख तकी ने अपने सैनिकों को एक बराह लाने को कहा। शेख तकी के आदेश का पालन हो गया, बराह लाया गया। शेख तकी ने आज्ञा दी कि इसे मारकर इसका खून एक बर्तन में भर लो। सैनिकों ने आज्ञा का पालन किया। अब तकी ने अपने एक भरोसे वाले साथी को बुलाकर अपनी इस योजना पर आदेशानुसार कार्य करने की बात समझा दी। साहिब तो सब जानते थे। राजदरबार लगा था, ऐसे समय में तकी की आज्ञा पाकर उसके साथी ने खून से भरे हुए उस बर्तन को साहिब पर उडेलना शुरू किया। पर पहले की तरह ही वो खून हवा में उड़ गया और साहिब पर कोई प्रभाव न पड़ा देख कर शेख तकी को फिर से लज्जित होना पड़ा।

नीचा दिखावन हेतु साहिब को, खून बराह का लाए। भरा बर्तन सिर पै डालें, खून ऊपर उड़ जाए॥

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39. साहिब जी पर खूंखार चीतों से वार करवाना

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(39) साहिब जी पर खूंखार चीतों से वार करवाना

क्रोध और ईर्ष्या से भरे हुए शेख तकी ने एक बार पाखण्डियों के साथ मिलकर विचार किया कि जंगल से खूंखार चीते पकड़ कर मंगवाते हैं और उन्हें कुछ दिन भूखा रखकर कबीर पर छोड़ते हैं। सबने इस योजना को मानते हुए अत्यंत सराहा। योजना के अनुसार कुशल शिकारियों को बुलवाकर तकी ने आदेश दे दिया कि जंगल से सात-आठ जीवित चीते पकड़ कर लाए जाएँ। आदेश पाते ही शिकारी जंगल से सात-आठ चीते पकड़कर ले आए। शेख तकी ने कुछ दिन चीतों को भूखा रखा। साहिब को एक किले में ले जाकर रुकने को कहा। किले की दीवारों के ऊपर देखने वालों की भीड़ लगी हुई थी। किले में पिंजरा ले जाकर पिंजरे का मुख साहिब की ओर खोलने का आदेश दिया। जब चीते छोड़े गये तो उन्होंने साहिब पर वार करने का प्रयास किया पर चीते साहिब तक पहुँच नहीं पा रहे थे। फिर सब चीतों ने साहिब के चरणों को चाटा और वापिस चले गये। यह देख तकी के दुख का कोई पार न रहा और बेइज्जत होकर वहाँ से चला गया।

जंगल में जा व्याघ्र चीते, फड़ पिंजरे में होड़े।
कुछ दिनों तक भूखे रखकर, साहिब ऊपर छोड़े॥
पिजरे का मूँह खुलते ही, साहिब ऊपर झपटे।
जब साहिब तक पहुँच न पाए, सब चरणों में लिपटे॥
चरण चाटकर चले गए, पल भर पास न अटके॥

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40. काठ के कठखोले में साहिब जी को खड़ा कर पैरों पर कीलें ठुकवाना

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(40) काठ के कठखोले में साहिब जी को खड़ा कर पैरों पर कीलें ठुकवाना

धर्म गुरु शेख तकी की सभी योजनाएँ फेल हो रही थीं। हर बार जब-जब उसे हार का सामना करना पड़ता, तब उसकी ईर्ष्या और बढ़ती जाती थी। लोग मुल्ला, मौलवियों, पंडितों के चंगुल से बचकर साहिब की सत्य भक्ति में बड़ी तेजी से आने लगे जिस कारण सब साहिब के खिलाफ हो गये थे। पर कुछ धर्मों के अगुवा साहिब को समझकर उनकी शरण में भी आने लग गये थे। दूसरी ओर धर्म गुरु शेख तकी की ईर्ष्या तो और बढ़ती जाती थी। वो आसानी से हार नहीं मानने वाला था। उसने नयी योजना के अनुसार एक काठ का कठखोला बनवाया।

पंडित मुल्ला और मौलवी, मिल शेख को समझाएँ।
कठखोले में साहिब खड़े कर, पाँव में कील ठुकवाए॥

इस योजना के अनुसार कबीर साहिब को काठ के कठखोले में खड़ा करके उनके पैरों पर कीलें ठोंकनी थीं। वज़ीर शेख तकी साहिब के पास गया और उन्हें साथ लेकर वहाँ आया, जहाँ काठ का कठखोला बनाया गया था। शेख तकी ने साहिब को काठ के कठखोले में खड़ा होने का आदेश दिया। शेख तकी के कहने की देरी थी कि साहिब उस कठखोले में खड़े हो गये। तब शेख तकी ने सिपाहियों को आदेश दिया कि साहिब के पैरों पर कीलें ठोंकी जाएँ। सिपाही हाथों में हथोड़े पकड़ कर कीलें ठोंकने लगे। सिपाहियों ने बड़ा प्रयास किया, पर एक भी कील साहिब के पैरों पर नहीं ठोंक सके। अंत में शेख तकी और पंडित, मौलवी लज्जित होकर वहाँ से चले गए।

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41. लोहे को गलाकर साहिब जी के ऊपर डलवाना

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(41) लोहे को गलाकर साहिब जी के ऊपर डलवाना

पाखण्डियों के पाखण्ड से लोगों को सावधान करते हुए साहिब ने कुरीतियों पर प्रहार किया। धार्मिक पाखण्डी साहिब से बहुत परेशान थे। वे सब शेख तकी को साहिब का अंत करने के लिए तरह-तरह के सुझाव देते रहते थे। सब मिलकर साहिब को अपने रास्ते से हटाने की सोच रहे थे। सबने तकी को सुझाव दिया कि क्यों न कबीर के ऊपर गर्म लोहा पिघलाकर डाला जाए। ऐसे में कबीर का जिंदा रहना संभव नहीं होगा। वे पक्का ही मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। इस तरह की हरकतें वह पहले भी कर चुके थे। वो साहिब को जादूगर समझकर विचार करते थे कि हो सकता है कि अब की बार कबीर का जादू न चले और हम साहिब को मारने में सफल हो जाएँ। अब योजना अनुसार लोहे को पिघलाकर पानी की तरह कर दिया गया।

जब राजदरबार में साहिब प्रवचन दे रहे थे, ऐसे में तकी ने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि यह पिघला हुआ लोहा कबीर के ऊपर डाल दो। तकी के हुक्म से पिघले लोहे को सैनिकों ने भरे राजदरबार में साहिब के ऊपर डालना शुरू किया। यह क्या, लोहे का अग्नि तत्व ही समास हो गया और पिघले लोहे की साहिब पर फूलों की तरह वर्षा होने लगी। सब साहिब की जय-जयकार करने लगे। उन्होंने अपनी हरकतों से साहिब के प्रति लोगों की श्रद्धा और बढ़ा दी।

पिघले लोहे का भरा कटोरा, साहिब ऊपर डाला।
पानी की तरह गिरता लोहा, बनी फूलों की माला॥