भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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४१४ | भैषज्यरत्नावली । | [ कृमिरोग-

पलाशबीजस्वरसं पिबेद्वा क्षौद्रसयुतम् ।
पिबेत्तद्बीजकल्कं वा तक्रेण कृमिनाशनम् ॥ ४ ॥
ढाकके बीजोंके स्वरसको शहदके साथ मिलाकर पीनेसे अथवा ढाकके बीजोंके चूर्णको मट्ठेके साथ सेवन करनेसे कृमि नष्ट होते हैं ॥ ४ ॥

क्वाथं खर्जूरपत्राणां सक्षौद्रमुषितं निशि ।
पीत्वा निवारयत्याशु कृमिसङ्घमशेषतः ॥ ५ ॥
खजूरके पत्तोंके वासी क्वाथको शहद मिलाकर पान करनेसे सर्व प्रकारके कृमि तत्काल नष्ट होते हैं ॥ ५ ॥

अपक्वं क्रमुकं पिष्टं पीतं जम्बीरजै रसैः ।
निहन्ति विड्भवं कीटं रसः खर्जूरजम्ब्वयोः ॥ ६ ॥
कच्ची सुपारीको जलमें पीसकर जम्भीरी नींबूके रसके साथ अथवा खजूरके पत्तोंका रस और जामुनके पत्तोंका रस मिलाकर पान करनेसे मलमें उत्पन्न हुए कृमि निश्चय नष्ट होते हैं ॥ ६ ॥

पिबेत्तुम्बीबीजचूर्णं तक्रेण कृमिनाशनम् ॥ ७ ॥
कडुवीतोंबीके बीजोंके चूर्णको मट्ठेके साथ सेवन करनेसे कृमि दूर होते हैं ॥ ७ ॥

नारिकेलजलं पीतं सक्षौद्रं कृमिनाशनम् ॥ ८ ॥
नारियलके जलमें शहद डालकर पान करनेसे कृमि नष्ट होते हैं ॥ ८ ॥

विडङ्गपिप्पलीमूलशिग्रुभिर्मरिचेन च ।
तक्रसिद्धा यवागूः स्यात् कृमिघ्नी ससुवर्चिका ॥
पीतं बिम्बीघृतं हन्ति पक्वामाशयगान्कृमीन् ॥ ९ ॥
वायविडङ्ग, पीपलामूल, सहिजनके बीज और कालीमिरच इन सबके चूर्णके साथ मट्ठेमें यवागू सिद्ध करके उसमें सज्जीका चूर्ण डालकर पान करनेसे अथवा बिम्बी (कंदूरी) के द्वारा सिद्ध किये हुए घीको सेवन करनेसे आमाशय और पक्वाशयगत कृमि नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥

यमानीं लवणोपेतां भक्षयेत कल्य उत्थितः ।
अजीर्णमामवातं च कृमिजांश्च जयेद्गदान् ॥ १० ॥
प्रातःकालमें अजवायन, सेंधानमक दोनोंको एकत्र पीसकर भक्षण करनेसें अजीर्ण आमवात और कृमि तथा कृमिजन्य अन्यान्य सर्व प्रकारके रोग दूर होते हैं ॥१०॥