भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 448
४१६भैषज्यरत्नावली ।[ कृमिरोग-

खुरासानी अजवायन, नागरमोथा, पीपल, काकडासिंगी, वायविडङ्ग और अतीस इन औषधियोंका बारीक चूर्ण समान भाग लेकर शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे खाँसी, ज्वर, पुराना अतिसार, वमनका होना और कोष्ठगत कृमि आदि रोग नष्ट होते हैं ॥ १६ ॥

कृमिकालानल रस ।

विडङ्गं द्विपलं चैव विषचूर्णं तदर्द्धकम् ।
लौहचूर्णं तदर्द्धं च तदर्द्धं शुद्धपारदम् ॥ १७ ॥
रसतुल्यं शुद्धगन्धं छागीदुग्धेन पेषयेत् ।
छायाशुष्कां वटीं कृत्वा खादेत्षोडशरक्तिकाम् ॥ १८ ॥
धान्यजीराऽनुपानेन नाम्ना कालानलो रसः ।
उदरस्थं कृमिं हन्याद् ग्रहण्यार्शःसमन्वितम् ॥ १९ ॥
अग्निदः शोथशमनो गुल्मप्लीहोदरान् जयेत् ।
गहनानन्दनाथेन भाषितो विश्वसम्पदे ॥ २० ॥

वायविडङ्ग ८ तोले, शुद्ध मीठा तेलिया ४ तोले, लोहभस्म २ तोले, शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध आमलासार गन्धक १ तोला; इन सब औषधियोंको एकत्र मिलाकर बकरीके दूधमें खरल करे । फिर छायामें सुखाकर सोलह सोलह रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे, इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली खाकर ऊपरसे धनिये और जीरेके क्वाथको पीवे तो यह कृमिकालानलनामक रस उदरस्थ कृमि, संग्रहणी, बवासीर, सूजन, वायगोला, तिल्ली और उदररोग इन सबको नष्ट करता है और पाचकाग्निको बढाता है । इस प्रयोगको महाराज गहनानन्दनाथने सांसारिक मनुष्योंके हितके लिये कहा है ॥ १७–२० ॥

कृमिधूलिजलप्लव रस ।

पारदं गन्धकं शुद्धं वङ्गं शङ्खं समं समम् ।
चतुर्णां योजयेत्तुल्यं पथ्याचूर्णं भिषग्वरः ॥ २१ ॥
दण्डयन्त्रेण निर्मथ्य पटोलस्वरसं क्षिपेत् ।
कार्पासबीजसदृशीं वटिकां कुरु यत्नतः ॥ २२ ॥
त्रिवटीं भक्षयेत्प्रातः शीततोयं पिबेदनु ।
केवलं पैत्तिके योज्यः कदाचिद्वातपैत्तिके ॥
श्रीमद्गहननाथोक्तः कृमिधूलिजलप्लवः ॥ २३ ॥