भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ]भाषाटीकासहिता ।४१७

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धग, वङ्ग और शंखभस्म ये चारों समान भाग और हरडका चूर्ण चौगुना सबको एकत्र बारीक चूर्ण करके उसमें पटोलपातके स्वरसको डालकर अच्छे प्रकारसे खरल करे और बिनौलोंके बराबर गोलियाँ बनालेवे, फिर प्रतिदिन प्रातःकाल तीन तीन गोली खाकर ऊपरसे शीतल जल पान करे । इस रसको केवल पित्तजनित रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये और कभी वात-पित्तजनित रोगोंमें भी देवे । इस कृमिधूलिजलप्लवरसको श्रीमद्गहनानन्दनाथने कहा है ॥ २१-२३ ॥

कृमिकाष्ठानल रस ।

विशुद्धं पारदं गन्धं वङ्गं तालं वराटकम् ।
मनःशिला कृष्णकाचं सोमराजीविडङ्गकम् ॥ २४ ॥
दन्तीबीजं च जैपालं शिलाटङ्कणचित्रकम् ।
कर्षमात्रं तु प्रत्येकं वज्रीक्षीरेण मर्दयेत् ॥ २५ ॥
कलायसदृशीं कृत्वा वटिकां भक्षयेत्ततः ।
कृमिकाष्ठानलो नाम रसोऽयं परिनिर्मितः ॥
श्लैष्मिके श्लेष्मपित्ते च श्लेष्मवाते च शस्यते ॥ २६ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, वङ्गभस्म, हरतालभस्म, कौडीकी भस्म, शुद्ध मैनसिल, काला काँच, बावची, वायविडङ्ग, दन्तीके बीज, जमाल गोटा, शुद्ध मैनसिल, सुहागा और चीता इन सबको एक एक कर्ष लेकर थूहरके दूधमें अच्छे प्रकारसे खरल कर मटरकी बराबर गोलियाँ बनाकर नित्यप्रति प्रातःसमय एक एक गोली सेवन करे । इस कृमिकाष्ठानलनामक रस कफ और पित्त एवं कफ और वातके रोगोंमें विशेष हितकारी है ॥ २४-२६ ॥

लाक्षादिवर्ती ।

लाक्षाभल्लातश्रीवासश्वेतापराजिताशिफाः ।
अर्जुनस्य फलं पुष्पं विडङ्गमजगुग्गुलुः ॥ २७ ॥
एभिः कीटाश्च शाम्यन्ते तिष्ठन्तोऽपि गृहे सदा ।
भुजङ्गा मूषिका दंशाः सङ्घनामा मतङ्गजाः ॥
दूरादेव पलायन्ते किं न कीटाश्च ये पराः ॥ २८ ॥

लाख, भिलावे, सरलका गोंद, सफेद कोयलकी जड, अर्जुनके फल और फूल, वायविडंग और गूगल इन सब औषधियोंको समान भाग ले एकत्र खरल करके

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