भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१८ ] [ कृमिरोग- भैषज्यरत्नावली ।
गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको प्रतिदिन प्रातःकाल एकएक करके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके कृमि नष्ट होते हैं और ये गोलियाँ जिस घरमें सदैव रहती हैं वहाँ सर्प, चूहे, डाँस संघनामवाले कृमि, मतङ्गज आदि अनेक प्रकारके कृमि दूरसे ही भाग जाते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥
कृमिमुद्गर रस । क्रमेण वृद्धं रसगन्धकाजमोदा विडङ्गं विषमुष्टिका च । पलाशबीजं च विचूर्णमस्य निष्कप्रमाणं मधुनाऽवलीढम् २९॥ पिबेत्कषायं घनजं तदूर्ध्वं रसोऽयमुक्तः कृमिमुद्गराख्यः । कृमीन्निहन्ति क्रिमिजांश्च रोगान्सन्दी॒पयत्यग्निमयं त्रिरात्रात् ॥
शुद्ध पारा १ तोला, शुद्ध गन्धक २ तोले, अजमोद ३ तोले, वायविडंग ४ तोले; शुद्ध कुचला ५ तोले और ढाकके बीज ६ तोले इन सब औषधियोंका एकत्र चूर्ण करके जलके साथ खरलकर चार चार मासेकी मात्रा प्रतिदिन प्रातःकाल शहदके साथ खाय और ऊपरसे नागरमोथेका क्वाथ पान करे तो यह कृमिमुद्गरनामक रस तीन दिनमें ही सर्व प्रकारके कृमिरोग एवं कृमियोंसे उत्पन्नहुए अनेक विकारोंको दूर करता है और पाचकाग्निको दीपन करता है ॥ २९ ॥ ३० ॥
कीटारिरस । शुद्धसूतं चेन्द्रयवं चाजमोदा मनःशिला । पलाशबीजं गन्धं च देवदाल्या द्रवैर्दिनम् ॥ ३१ ॥ संमर्द्य भक्षयेन्नित्यं मुद्गपर्णीरसैः सह । सितायुक्तं पिबेच्चानु कृमिपातो भवत्यलम् ॥ ३२ ॥
शुद्ध पारा, इन्द्रजौ, अजमोद, शुद्ध मैनसिल, ढाकके बीज और शुद्ध गन्धक इन सबको बराबर २ भाग लेकर बंदालके रसमें एकदिनतक खरल करे । फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे नित्यप्रति प्रातःकाल एक गोली खाकर ऊपरसे मुद्गपर्णी वनमूँगका क्वाथ मिश्री डालकर पान करनेसे सब प्रकारके कृमि नष्ट होते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥
कीटमर्दरस । शुद्धसूतं शुद्धगन्धमजमोदा विडङ्ककम् । विषमुष्टिर्ब्रह्मबीजं यथाक्रमगुणोत्तरम् ॥ ३३ ॥ चूर्णयेन्मधुना मिश्रं निष्कैकं कृमिजिद्भवेत् । कीटमर्दो रसो नाम मुस्ताक्वाथं पिबेदनु ॥ ३४ ॥