भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 451

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४१९


शुद्ध पारा १ तोला, शुद्ध गन्धक दो तोले, अजमोद ३ तोले, वायविडङ्ग ४ तोले शुद्ध कुचला ५ तोले और ढाकके बीज ६ तोले इन सबका एकत्र बारीक चूर्ण करके इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल चार चार मासेकी मात्रासे शहदमें मिलाकर खाय और ऊपरसे नागरमोथेका क्वाथ पीवे तो यह कीटमर्द्दनामक रस कृमिरोगको दूर करता है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥

कृमिघातिनी गुटिका।

रसगन्धाजमोदानां कृमिघ्नब्रह्मबीजयोः ।
एकद्वित्रिचतुःपंच तिन्दोर्बीजस्य षट् क्रमात् ॥ ३५ ॥
सञ्चूर्ण्य मधुना सर्वं गुटिकां कृमिघातिनीम् ।
खादन् पिपासुस्तोयं च मुस्तानां कृमिशान्तये ॥
आखुकर्णीकषायं वा प्रपिबेच्छर्करान्वितम् ॥ ३६ ॥

शुद्ध पारा १ तोला, शुद्ध गन्धक २ तोले, अजमोद ३ तोले, वायविडङ्ग ४ तोले ढाकके बीज ५ तोले और तेंदूके बीज ६ तोले लेवे। सबको एकत्र चूर्ण करके शहदके साथ खरलकर डेढ डेढ मासेकी मात्रासे कृमिरोगको नष्ट करनेके लिये प्रतिदिन प्रातःकाल शहदके साथ सेवन करे अथवा इसकी गोली बनाकर शहदमें मिलाकर और प्यास लगनेपर नागरमोथेके क्वाथ अथवा मूसाकनीका क्वाथ मिश्री मिलाकर पीवे ॥ ३५ ॥ ३६ ॥

कृमिविनांशरस ।

शुद्धसूतं समं गन्धमभ्रं लौहं मनःशिला ।
धातकी त्रिफला लोध्रं विडङ्गं रजनीद्वयम् ॥ ३७ ॥
भावयेत्सप्तधा सर्वं शृङ्गवेरभवै रसैः ।
चणमात्रां वटीं कृत्वा त्रिफलारससंयुताम् ॥ ३८ ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय कृमिरोगोपशान्तये ।
वातिकं पैत्तिकं हन्ति श्लैष्मिकं च त्रिदोषजम् ॥
कृमिविनांशनामाऽयं कृमिरोगकुलान्तकः ॥ ३९ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रकभस्म, लोहभस्म, शुद्ध मैनसिल, धायके फूल, त्रिफला, लोध, वायविडङ्ग, हल्दी और दारुहल्दी इन सब औषधियोंको बराबर १ भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके अदरखके रसमें सातवार भावना देकर चनेकी