भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२० भैषज्यरत्नावली । [कृमिरोग-
बराबर गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे नित्यप्रति प्रातःकाल एक एक गोली त्रिफलेके क्वाथके साथ सेवन करे तो यह कृमिविनाश नामक रस वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषसे उत्पन्नहुए सब प्रकारके कृमिरोगको समूल नष्ट करता है ॥ ३७-३९ ॥
कृमिहररस ।
शुद्धसूतमिन्द्रयवमजमोदा मनःशिला ।
पलाशबीजं गन्धं च देवदाल्याद्रवैर्दिनम् ॥ ४० ॥
संमर्द्य भक्षयेन्नित्यं शालपर्णीरसैः सह ।
सितायुक्तं पिबेच्चानु कृमिपातो भवत्यलम् ॥ ४१ ॥
शुद्ध पारा, इन्द्रजौ, अजमोद, शुद्ध मैनसिल, ढाकके बीज और शुद्ध गन्धक इन सब औषधियोंको बराबर भाग लेकर बंदालके रसमें एक दिनतक अच्छेप्रकारसे खरल करके १-१ रत्तीकी गोलियाँ बनाकर नित्यप्रति एक एक गोली खाय और ऊपरसे शालपर्णीके क्वाथमें मिश्री मिलाकर पान करे, तो सब प्रकारके कृमि गिरजाते हैं ॥ ४० ॥ ४१ ॥
कृमिरोगारिरस ।
सूतं गन्धं मृतं लौहं मरिचं विषमेव च ।
धातकी त्रिफला शुण्ठी विडङ्गं सरसाञ्जनम् ॥ ४२ ॥
त्रिकटुमुस्तकं पाठा बालकं बिल्वमेव च ।
भावयेत्सर्वमेकत्र स्वरसैर्भृङ्गजैस्ततः ॥ ४३ ॥
वराटिकाप्रमाणेन भक्षणीयो विशेषतः ।
कृमिरोगारिनामाऽयं रसो वै कृमिनाशनः ॥ ४४ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, कालीमिरच, शुद्ध मीठा तेलिया, धायके फूल, त्रिफला सोंठ, वायविडङ्ग, रसौंत, त्रिकुटा, नागरमोथा, पाठ, सुगन्धवाला और बेलगिरी इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके भाँगरेके स्वरसमें खरल करे । फिर कौडीकी बराबर गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करे । यह कृमिरोगारि नामक रस विशेषकर कृमिरोग नाशक है ॥ ४२-४४ ॥
कृमिघ्नरस ।
कृमिघ्नं किंशुकारिष्टबीजं सुरसभस्मकम् ।
वल्लद्वयं चाखुकर्णीरसैः कृमिविनाशनम् ॥ ४५ ॥