भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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४३६भैषज्यरत्नावली ।[ पाण्डु-आदि-

भगन्दरोपदंशौ च दद्रुकण्डूव्रणानि च ।
दाहं तृष्णामुरुस्तम्भमामवातं कटिग्रहम् ॥ ७१ ॥
गहनानन्दनाथोक्तश्चन्द्रसूर्यात्मको रसः ॥ ७२ ॥

यह चन्द्रसूर्यात्मक रस—हलीमक, पाण्डु, कामला, जीर्णज्वर, विषमज्वर, रक्तपित्त, अरुचि, शूल, तिल्ली, उदररोग, आनाह, अष्ठीला, गुल्म, विद्रधि, सूजन, मन्दाग्नि, खाँसी, श्वास, हिचकी, वमन, भ्रम, भगन्दर, उपदंश, दाद, खुजली, व्रण, जलन, तृषा, ऊरुस्तम्भ, आमवात और कमरको पीडा इन समस्त रोगोंको तत्काल नष्ट करता है । इस रसको श्रीगहनानन्दनाथजीने वर्णन किया है ॥ ६९–७२ ॥

प्राणवल्लभ रस ।

हिङ्गुलसम्भवं सूतं गन्धं काश्मीरसम्भवम् ।
लौहं ताम्रं वराटं च तुत्थं हिङ्गु फलत्रयम् ॥ ७३ ॥
स्नुहीमूलं यवक्षारं जैपालं टङ्कणं त्रिवृत् ।
प्रत्येकं तु समं भागं छागीदुग्धेन भावयेत् ॥ ७४ ॥
चतुर्गुञ्जां वटीं खादेद्वारिणा मधुना सह ।
श्लेष्मदोषं च संवीक्ष्य युक्त्या वा त्रुटिवर्द्धनम् ॥ ७५ ॥

सिंगरफसे निकालाहुआ शुद्ध पारा, शुद्ध आमलासार, गन्धक, लोहभस्म, ताम्रभस्म, कौडीकी भस्म, तूतिया, हींग, त्रिफला, थूहरकी जड, जवाखार, जमाल गोटा, सुहागा और निसोत प्रत्येक समान भाग लेकर बकरीके दूधमें उत्तम प्रकारसे खरल करके चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । फिर नित्य प्रातःकाल एक एक गोली शहद अथवा जलके साथ भक्षण करे और कफदोषको विचारकर मात्राको युक्तिपूर्वक घटाता बढाता रहे ॥ ७३–७५ ॥

निहन्ति कामलां पाण्डुमानाहं श्लीपदं तथा ।
गलगण्डं गण्डमालां कृच्छ्राणि च हलीमकम् ॥ ७६ ॥
शोथं शूलमुरुस्तम्भं संग्रहग्रहणीं तथा ।
हन्ति मूर्च्छां वमिं हिक्कां कास-श्वास गलग्रहम् ॥ ७७ ॥
असाध्यं सन्निपातं च जीर्णज्वरमरोचकम् ।
जलदोषभवं शोथं महोग्रं च जलोदरम् ॥ ७८ ॥