भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४३७


नातः परतरं श्रेष्ठं कामलार्त्तिरुजापहम् ।
प्राणवल्लभनामाऽयं गहनानन्दभाषितः ॥ ७९ ॥

यह रस कामला, पाण्डु, अफारा, श्लीपद ( फीलपाँव ), गलगण्ड, गण्डमाला, हलीमक, सूजन, अरुस्तम्भ, संग्रहणी, मूर्च्छा, वमन, हिचकी, खाँसी, श्वास, गलेकी पीडा और असाध्य सन्निपातज्वर तथा जीर्णज्वर, अरुचि, जलदोषसे उत्पन्नहुआ शोथ और अतिदारुण जलोदर इन सब रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है । कामला, पाण्डु आदि रोगोंको दूर करनेके लिये इस रससे बढकर अन्य औषधि नहीं है । इस प्राणवल्लभ नामक रसको श्रीगहनानन्दनाथने निर्माण किया है ॥ ७६-७९ ॥

पञ्चाननवटी ।

शुद्धसूतं समं गन्धं मृतताम्राभ्रगुग्गुलुः ।
जैपालबीजं तुल्यांशं घृतेन गुडकीकृतम् ॥ ८० ॥
भक्षयेद्बादरास्थ्याभं शोथपाण्डुप्रशान्तये ।
पञ्चाननवटी ख्याता पाण्डुरोगकुलान्तिका ॥ ८१ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, ताम्रभस्म, अभ्रकभस्म, गूगल इन सबका चूर्ण समान भाग और सब चूर्णकी बराबर शुद्ध जमालगोटेके बीजोंका चूर्ण लेवे । फिर सबको एकत्र घृतके साथ एक प्रहरतक खरल करके बेरकी गुठलीकी बराबर गोलियाँ बनाकर चिकने बर्त्तनमें भरकर रखदेवे । इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली गूमाके क्वाथके साथ सेवन करे । यह पञ्चाननवटी शोथ और पाण्डुरोगका मूल नष्ट करता है ॥ ८० ॥ ८१ ॥

पाण्डुसूदनरस ।

रसं गन्धं मृतं ताम्रं जयपालं च गुग्गुलुम् ।
समांशमाज्यसंयुक्तं गुटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ८२ ॥
एकैकां खादयेन्नित्यं पाण्डुशोथोपशान्तये ।
शीतलं च जलं चाम्लं वर्जयेत्पांडुसूदने ॥ ८३ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, ताम्रभस्म, जमालगोटा और गूगल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके घृतके साथ खरल कर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । नित्यप्रति प्रातःकाल एक एक गोली सेवन करे । इसपर शीतल जल और अम्ल पदार्थोंको त्यागदेवे । इससे पाण्डु और शोथ रोगकी शान्ति होती है ॥ ८२ ॥ ८३ ॥