भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४३९


शुद्ध पारा १ भाग, अभ्रकभस्म ६ भाग, लोहभस्म ८ भाग और शुद्ध गन्धक, त्रिफला, त्रिकुटा, मोचरस, मुसली और गिलोयका सत ये प्रत्येक पाँच पाँच भाग इन सब ओषधियोंका एकत्र चूर्ण करके त्रिफलेके काढ़ेमें दश दिनतक बीस बार भावना देवे । फिर सहिंजनेकी जड़ और चीतेकी जड़के क्वाथमें अलग २ आठ आठ बार भावना देवे तो यह त्रैलोक्यसुन्दरनामक रस सिद्ध होता है । इसको प्रतिदिन प्रातःकाल चार चार मासे प्रमाण मिश्री और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे शोथ, पाण्डु, क्षय, ज्वर और अतिसार आदि सम्पूर्ण उपद्रव नष्ट होते हैं ॥ ८८-९१ ॥

योगराज ।

त्रिफलायास्त्रयो भागास्त्रयस्त्रिकटुकस्य च ।
भागश्चित्रकमूलस्य विडङ्गानां तथैव च ॥ ९२ ॥
पञ्चाश्मजतुनो भागास्तथा रूप्यमलस्य च ।
माक्षिकस्य विशुद्धस्य लौहस्य रजसस्तथा ॥ ९३ ॥
अष्टौ भागाः सितायाश्च तत्सर्वं श्लक्ष्णचूर्णितम् ।
माक्षिकेणाप्लुतं स्थाप्यमायसे भाजने शुभे ॥ ९४ ॥
उदुम्बरसमां मात्रां ततः खादेद्यथाग्निना ।
दिनेदिने प्रयुञ्जीत जीर्णे भोज्यं यथेप्सितम् ॥
वर्जयित्वा कुलत्थांश्च काकमाचीं कपोतकाम् ॥ ९५ ॥

हरड, बहेडा, आमला ये तीनों १२ तोले, सोंठ, मिरच और पीपल तीनों १२ तोले, चीतेकी जड और वायविडंग दोनों चार चार तोले, एवं शिलाजीत, चाँदीका मैल, शुद्ध सोनामाखी और लोहभस्म ये प्रत्येक बीस बीस तोले और मिश्री ६४ तोले लेवे । सबका एकत्र बारीक चूर्ण करके शहदमें मिलाकर उत्तम लोहेके वर्त्तनमें भरकर रखदेवे । इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल गूलरके फलकी समान अथवा अपनी अग्निके बलानुसार उचित मात्रासे सेवन करे । औषधिके पच जानेपर यथेच्छ भोजन करे । इसपर कुलथी, मकोय और ब्राह्मीके पत्तोंका शाक आदि पदार्थ त्यागदेने चाहिये ॥ ९२-९५ ॥

योगराज इति ख्यातो योगोऽयममृतोपमः ॥ ९६ ॥
रसायनमिदं श्रेष्ठं सर्वरोगहरं परम् ।
पाण्डुरोगं विषं कासं यक्ष्माणं विषमज्वरम् ॥ ९७ ॥

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