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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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भूमिका प्रस्तुत ग्रन्थ में श्रील रूपगोस्वामी प्रभुपाद की संस्कृत रचना 'भक्तिरसामृतसिन्धु' का सार संकलन है। श्रील रूप गोस्वामी उन छः गोस्वामियों में प्रधान हैं, जो भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के सीधे शिष्य हैं। जब वे श्रीचैतन्यदेव से पहली बार मिले, उस समय श्रील रूप गोस्वामी प्रभु- पाद बंगाल की मुस्लिम सरकार में मंत्री थे। वे और उनके भाई सनातन नवाब हुसैन शाह के साकरमलिक और दबीरखास नाम से प्रसिद्ध वरिष्ठ मंत्री थे। उस समय, आज से पाँच सौ वर्ष पहले, हिन्दू समाज बड़ा रूढ़ि- वादी था। यदि कोई ब्राह्मण जाति का व्यक्ति मुस्लिम शासक में सेवा कार्य स्वीकार कर लेता तो उसे ब्राह्मण समाज से निष्कासित कर दिया जाता। दबीरखास और साकरमलिक की ऐसी ही स्थिति थी। यद्यपि उनका जन्म उच्च सारस्वत ब्राह्मण जाति में हुआ था; पर वहाँ की सरकार में मंत्रीपद ग्रहण कर लेने से उन्हें समाज ने निष्कासित कर दिया था। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कृपा करके दोनों महापुरुषों को अपना शिष्य बना लिया और उस गोस्वामी पद पर आरूढ़ कर दिया जो ब्राह्मण संस्कृति की सर्वोच्च अवस्था है। इसी प्रकार भगवान् चैतन्य ने जन्म से मुस्लिम होने पर भी हरिदास ठाकुर को अपना शिष्य स्वीकार किया और बाद में हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे महामन्त्र के कीर्तन का आचार्यपद प्रदान किया। भगवान् चैतन्य देव का सिद्धान्त सार्वभौम है। जो कोई श्रीकृष्ण के तत्त्व को जानता हो और उनकी सेवा के परायण हो, उसे ब्राह्मण वंश में जन्मे व्यक्ति से श्रेष्ठ समझा जाता है। सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों, विशेषतः भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत का मूल सिद्धान्त यही है। भगवान् चैतन्य- महाप्रभु के आन्दोलन के इसी सिद्धान्त को 'भक्तिरसामृतसिन्धु' में दिखाया गया है। इसके द्वारा कोई भी व्यक्ति गोस्वामी पद पर आरूढ़ हो सकता है। भगवान् चैतन्य महाप्रभु की दबीरखास और साकरमलिक नामक इन दोनों भाइयों से भेंट मालदा जिले के रामकेलि ग्राम में हुई थी। उस