भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 18

२ | भक्तिरसामृतसिन्धु भेंट के बाद दोनों ने सरकारी सेवा को त्याग कर भगवान् चैतन्यदेव के शरणागत हो जाने का निश्चय किया। यही दबीरखास परवर्ती काल में रूपगोस्वामी कहलाये। उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और सेवाकाल में जितना धन संचित किया था उसे लेकर चल पड़े। चैतन्य- चरितामृत में वर्णन है कि स्वर्ण मुद्राओं के रूप में उनका संचित धन करोड़ों रुपयों तक का था और उससे एक बड़ी नाव भर गई। उन्होंने अपने इस धन का बड़े ही आदर्श रूप से विभाजन किया, जिसका भक्तों को विशेष रूप से और मानवता को सामान्य रूप से पालन करना चाहिये। संचित सम्पत्ति का आधा भाग कृष्णभावनाभावित पुरुषों अर्थात् ब्राह्मणों और वैष्णवों को दिया गया। पच्चीस प्रतिशत बन्धुबान्धवों में वितरित हुआ और शेष पच्चीस प्रतिशत आपत्काल और निजी कठिनाइयों के लिये रख छोड़ा। बाद में जब साकरमलिक ने भी त्यागपत्र देना चाहा तो नवाब बहुत उद्विग्न हुआ और उन्हें जेल में डाल दिया। साकरमलिक ने जो परवर्तीकाल में श्रील सनातन गोस्वामी नाम से ख्यात हुए अपने भाई के निजी धन का लाभ उठाया जो गाँव के एक धनी के यहाँ जमा था और उसके द्वारा वे शहनशाह के कारागार से भाग निकले। इस प्रकार वे दोनों भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु के साथ सम्मिलित हो गये। श्रील रूप गोस्वामी सर्वप्रथम भगवान् चैतन्य से प्रयागराज में मिले और उस पावन नगरी के दशाश्वमेध घाट पर भगवान् ने उन्हें निरन्तर दस दिन तक सदुपदेश दिया। भगवान् चैतन्यदेव ने उन्हें विशेष रूप से कृष्णभावना-विज्ञान की शिक्षा दी। भगवान् चैतन्यदेव द्वारा श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद को दी गई इस शिक्षा का वर्णन हमारे 'श्रीचैतन्यमहाप्रभु का शिक्षामृत' नामक ग्रन्थ में है। बाद में, श्रील रूपगोस्वामी ने भगवान् चैतन्यदेव की शिक्षा का विविध वैदिक शास्त्रों के ज्ञान और प्रमाण के आधार पर विस्तृत रूप से प्रतिपादन किया। छः स्वामियों के चरणों में श्रील श्रीनिवासाचार्य की प्रार्थना में उल्लेख है कि वे सब महापंडित थे। उन्हें केवल संस्कृत का ही ज्ञान नहीं था, वरन् वे फारसी और अरबी आदि विदेशी भाषाओं में भी पारंगत थे। श्रीचैतन्य महाप्रभु के मत को प्रामाणिक वैदिक ज्ञान के आधार पर स्थापित करने के लिये उन्होंने सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों का गम्भीर विचारपूर्वक अध्ययन किया था। वर्तमान कृष्णभावनामृत आन्दो- लन भी श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद की प्रामाणिकता पर आधारित है। अतएव हमें प्रायः रूपानुग अर्थात् श्रील रूपगोस्वामी प्रभुपाद के चरणचिह्नों