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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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का अनुगामी कहा जाता है। हमारे मार्गदर्शन के लिये ही श्रील रूप- गोस्वामी ने इस 'भक्तिरसामृतसिन्धु' नामक ग्रन्थ की रचना की। जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत आन्दोलन में संलग्न हैं वे इस महान् ग्रन्थ का लाभ उठायें और बड़ी दृढ़ता के साथ कृष्णभावना में स्थिर हो जायें। भक्ति का अर्थ है सेवा करना। किसी भी सेवा में कुछ न कुछ आकर्षण रहता है, जिससे सेवक उसमें निरन्तर लगा रहता है। इस जगत् में हम निरन्तर किसी न किसी प्रकार की सेवा में लगे रहते हैं और इस सेवा का उद्दीपन है वह आनन्द, जो हमें उससे मिलता है। पत्नी और सन्तान के स्नेहवश गृहस्थ दिन-रात अथक परिश्रम करता है। परो- पकारी भी इसी प्रकार प्रेमवश बृहद परिवार के लिये कार्य करता है और जो राष्ट्रवादी है वह अपने देश और देशवासियों के लिये प्राणप्रण से प्रयास करता है। वह शक्ति जो परोपकारी, गृहस्थ और राष्ट्रवादी को अपने-अपने कार्य में लगाये रखती है, उसका नाम रस है जो अति मधुर है। भक्तिरस लौकिक कर्मियों के साधारण रस से भिन्न है। लौकिक कर्मी दिन-रात एक ऐसे रस को भोगने के लिये परिश्रम करते हैं जो वास्तव में इन्द्रियतृप्ति है। ऐसे रस का स्वाद अधिक देर नहीं रहता और इसीलिये लौकिक कर्मियों में अपने भोगने की अवस्था को निरन्तर बदलते रहने की प्रवृत्ति रहती है। व्यापारी पूरे सप्ताह कार्य करने में सन्तुष्ट नहीं होता। अतएव सप्ताहांत होने पर वह कुछ परिवर्तन चाहता है और इसलिये ऐसे स्थान पर चला जाता है जहाँ कम से कम एक दिन के लिये तो वह अपनी सारी व्यापार-क्रियाओं को भूल सके। सप्ताह का अन्त विस्मृति में खोकर वह फिर अपनी स्थिति को बदलकर व्यापार-क्रिया में संलग्न हो जाता है। किसी परिस्थिति अथवा स्थिति-विशेष को स्वीकार कर लेना और फिर कुछ समय बाद त्याग देना—लौकिक कार्यकलाप का यही स्वरूप है। इसी को भोग-त्याग कहते हैं। जीवात्मा निरन्तर न तो इन्द्रियतृप्ति में रह सकता है और न त्याग में । निरन्तर परिवर्तन चलता रहता है; हमें इनमें से किसी भी अवस्था में सुख नहीं मिलता क्योंकि हमारा शाश्वत् स्वरूप इन दोनों से भिन्न है। इन्द्रियतृप्ति अधिक समय तक नहीं रहती; अतएव उसे चपल सुख कहते हैं। उदाहरण के लिये—एक साधारण मनुष्य दिन-रात अथक परिश्रम करके अपने परिवार वालों को सुख देने में सफल होता है और इससे उसे एक प्रकार के रस की अनुभूति है। परन्तु जैसे ही उसका जीवन समाप्त हो जाता है, शरीर के साथ ही प्राकृत सुख में की हुई सब उन्नति भी समाप्त हो