संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* ज्येष्ठपूर्णिमाको श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राके दर्शनका माहात्म्य * १४३
विधि और मन्त्रयुक्त अभिषेकोपयोगी द्रव्य लेकर भगवान्का अभिषेक करते हैं। इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, धाता, विधाता, वायु, अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, त्वष्टा, दोनों पत्नियोंसहित विवस्वान्, मित्र, वरुण, रुद्र, वसु, आदित्य, अश्विनीकुमार, विश्वेदेव, मरुद्गण, साध्य, पितर, विद्याधर, पितामह,पुलस्त्य, पुलह, अङ्गिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, प्रचेता, मनु, दक्ष, धर्म, काल, यम, मृत्यु, यमदूत तथा अन्य अनेकों देवता भगवान्का अभिषेक करनेके लिये इधर-उधरसे आते हैं और सुवर्णमय कलशोंमें रखे हुए पुष्प-मिश्रित आकाशगङ्गाके जलसे श्रीकृष्ण, सुभद्रा तथा बलरामजीको स्नान कराते हैं तथा प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं—
सम्पूर्ण लोकोंका पालन करनेवाले जगन्नाथ! आपकी जय हो! जय हो!! आप भक्तोंके रक्षक तथा शरणागतवत्सल हैं। सम्पूर्ण भूतोंमें व्यापक आदिदेव! आपकी जय हो। नानात्वके कारणभूत वासुदेव! आप असुरोंके संहारक, दिव्य मत्स्यरूप धारण करनेवाले, समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ तथा समुद्रमें शयन करनेवाले हैं। योगिवर! आपकी जय हो, जय हो। सूर्य आपके नेत्र हैं तथा आप देवताओंके राजा हैं। वेदोंमें आप ही सर्वश्रेष्ठ बताये गये हैं। आपने कच्छप-अवतार धारण किया था। आप श्रेष्ठ यज्ञस्वरूप हैं। आपकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ था, इसलिये आप पद्मनाभ कहलाते हैं। आप पहाड़ोंपर विचरनेवाले तथा योगशायी हैं। आपकी जय हो, जय हो। महान् वेग धारण करनेवाले विश्वमूर्ते! चक्रधर! भूतनाथ! धरणीधर! शेषशायिन्! आपकी जय हो, जय हो। आप पीताम्बरधारी, चन्द्रमाके समान कान्तिमान्, योगमें वास करनेवाले, अग्निमुख, धर्मके आवासस्थान, गुणोंके भंडार, लक्ष्मीके निवासस्थान और गरुडवाहन हैं। आपकी जय हो, जय हो। आप आनन्दनिकेतन, धर्मध्वज, पृथ्वीके आश्रयस्थान और दुर्बोध चरित्रवाले हैं। योगी पुरुष ही आपको जान पाते हैं। आप यज्ञोंमें निवास करनेवाले तथा वेदोंके वेद्य हैं। शान्ति प्रदान करनेवाले और योगियोंके ध्येय हैं। आपकी जय हो, जय हो। आप ही सबका पालन-पोषण करते हैं। ज्ञान आपका स्वरूप है। आप लक्ष्मीनिधि हैं। भाव-भक्तिसे ही आपका ज्ञान होना सम्भव है। मुक्ति आपके हाथमें है। आपका शरीर निर्मल है। आप सत्त्वगुणके अधिष्ठान,समस्त गुणोंसे समृद्धिशाली, यज्ञकर्ता, निर्गुण तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। भूमण्डलको शरण देनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो, जय हो। आप दिव्य कान्तिसे सम्पन्न, समस्त लोकोंको शरण देनेवाले, भगवती लक्ष्मीसे संयुक्त,कमलके-से नेत्रोंवाले, सृष्टिकारक, योगयुक्त, अलसीके फूलकी भाँति श्याम अङ्गोंवाले, समुद्रके भीतर शयन करनेवाले, लक्ष्मीरूपी कमलके भ्रमर तथा भक्तोंके अधीन रहनेवाले हैं। लोककान्त! आपकी जय हो, जय हो। आप परम शान्त, परम सारभूत, चक्र धारण करनेवाले, सर्पोंके साथ रहनेवाले, नीलवस्त्रधारी, शान्तिकारक, मोक्षदायक तथा समस्त पापोंको दूर करनेवाले हैं। आपकी जय हो, जय हो। बलरामजीके छोटे भाई जगदीश्वर श्रीकृष्ण! आपकी जय हो; पद्मपत्रके समान नेत्रोंवाले तथा इच्छानुसार फल देनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। चक्र और गदा धारण करनेवाले नारायण! आपका वक्षःस्थल वनमालासे आच्छादित है। आपकी जय हो। लक्ष्मीकान्त विष्णो! आपको नमस्कार है। आपकी जय हो।
इस प्रकार श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राका स्तवन, दर्शन और वन्दन करके देवतालोग अपने-अपने स्थानको चले जाते हैं। उस समय जो