भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१४४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

मनुष्य मञ्चपर विराजमान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राका दर्शन करते हैं, वे अविनाशी पदको प्राप्त होते हैं। सहस्त्र गो-दान, विधिवत् भूमि-दान, अर्घ्य और आतिथ्यपूर्वक अन्न-दान, विधिवत् वृषोत्सर्ग, ग्रीष्मकालमें जल-दान, चान्द्रायण-व्रतके अनुष्ठान तथा शास्त्रोक्त विधिसे एक मासतक उपवास करनेसे जो फल होता है, वही मञ्चपर विराजमान श्रीकृष्णका दर्शन करनेसे मिल जाता है अथवा अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, सम्पूर्ण तीर्थोंमें व्रत और दानका जो फल बतलाया गया है, वह मञ्चस्थ श्रीकृष्ण, सुभद्रा और बलरामका दर्शन करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है। अतः स्त्री हो या पुरुष, सबको उस समय पुरुषोत्तमका दर्शन करना चाहिये। इससे सब तीर्थोंमें स्नान आदि करनेका फल मिलता है। भगवान्‌के स्नान किये हुए शेष जलको अपने शरीरपर छिड़कना चाहिये। इससे पुत्रकी इच्छा करनेवाली स्त्रीको पुत्रकी प्राप्ति होती है। सुख चाहनेवालीको सौभाग्य मिलता है। रोगार्त्त नारी रोगसे मुक्त हो जाती है और धनकी अभिलाषा रखनेवाली स्त्रीको धन मिलता है। अतः भगवान् श्रीकृष्णके स्नानावशेष जलको अपने अङ्गोंपर छिड़कना चाहिये। वह सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको देनेवाला है। जो स्नानके पश्चात् दक्षिणाभिमुख जाते हुए भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं, वे निश्चय ही ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। शास्त्रोंमें पृथ्वीकी तीन परिक्रमा करनेका जो फल बताया गया है, वही दक्षिणाभिमुख यात्रा करते हुए श्रीकृष्णका दर्शन करनेसे प्राप्त होता है। अधिक क्या कहा जाय—वेद, शास्त्र, पुराण, महाभारत तथा समस्त धर्मशास्त्रोंमें पुण्यकर्मका जो कुछ भी फल बताया गया है, वह सब सुभद्राके साथ दक्षिणाभिमुख यात्रा करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामका दर्शन करनेमात्रसे मिल जाता है।

गुण्डिचा-यात्राका माहात्म्य तथा द्वादश यात्राकी प्रतिष्ठा-विधि

**ब्रह्माजी कहते हैं—**मुनियो! भगवान् श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा—ये रथपर विराजमान होकर जब गुण्डिचा*-मण्डपकी यात्रा करते हैं, उस समय जिन्हें उनका दर्शन प्राप्त होता है तथा जो लोग एक सप्ताहतक उक्त मण्डपमें विराजमान श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राकी झाँकी करते हैं, वे विष्णुलोकमें जाते हैं।

**मुनियोंने पूछा—**जगत्पते! इस यात्राका आरम्भ किसने किया? तथा उसमें सम्मिलित होनेवाले मनुष्योंको क्या फल मिलता है?

**ब्रह्माजी बोले—**ब्राह्मणो! पूर्वकालमें राजा इन्द्रद्युम्नने भगवान्‌से प्रार्थना की कि 'मेरे सरोवरके तटपर एक सप्ताहके लिये आपकी यात्रा हो।'

**श्रीभगवान् बोले—**राजन्! तुम्हारे सरोवरके तटपर सात दिनोंके लिये मेरी यात्रा होगी, वह यात्रा गुण्डिचा नामसे विख्यात और समस्त अभिलषित फलोंको देनेवाली होगी। जो लोग वहाँ मण्डपमें स्थित होनेपर मेरी, बलरामजीकी और सुभद्राकी एकाग्रचित्तसे श्रद्धापूर्वक पूजा करेंगे तथा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री और शूद्र पुष्प, गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य, भाँति-भाँतिके उपहार, नमस्कार, परिक्रमा, जय-जयकार, स्तोत्र-गीत तथा मनोहर वाद्योंके द्वारा आराधना करेंगे, उन्हें मेरी कृपासे कोई भी मनोरथ दुर्लभ नहीं रहेगा।


* गुण्डिचा नामक उद्यान-मन्दिर, जो पुरीमें इन्द्रद्युम्नसरोवरके तटपर स्थित है। इसके गुण्डिजा, गुडिवा आदि नाम भी मिलते हैं।