भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 434 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 147

* गुण्डिचा-यात्राका माहात्म्य तथा द्वादश यात्राकी प्रतिष्ठा-विधि * १४५

यों कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये और वे महाराज इन्द्रद्युम्न कृतकृत्य हो गये। अतः सब प्रकारसे प्रयत्न करके गुण्डिचा-मण्डपमें समस्त अभिलषित वस्तुओंको देनेवाले भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करना चाहिये। वहाँ पुरुषोत्तमका दर्शन करके स्त्री या पुरुष जिन-जिन भोगोंको चाहें, उन्हें प्राप्त कर सकते हैं।

मुनियोंने पूछा— भगवन्! गुण्डिचाकी एक-एक यात्राका पृथक्-पृथक् क्या फल है? उसे करनेसे नर या नारीको कौन-सा फल मिलता है?

ब्रह्माजी बोले— ब्राह्मणो! सुनो। मैं प्रत्येक यात्राका फल बताता हूँ। गुण्डिचामें प्रबोधिनी एकादशीके दिन, फाल्गुनकी पूर्णिमाको तथा विषुवयोगमें विधिपूर्वक यात्रा करके श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राका दर्शन करनेसे मनुष्य वैकुण्ठ-धाममें जाता है। क्षेत्रोंमें श्रेष्ठ पुरुषोत्तमतीर्थ बड़ा ही पवित्र, रमणीय, मनुष्योंको भोग और मोक्षका दाता तथा सब जीवोंको सुख पहुँचानेवाला है। जो जितेन्द्रिय स्त्री या पुरुष ज्येष्ठमासमें वहाँ शास्त्रोक्त विधिके अनुसार बारह यात्राएँ करके एकाग्रचित्तसे उनकी प्रतिष्ठा करता है और उस समय धन खर्च करनेमें कृपणता नहीं करता, वह भाँति-भाँतिके भोगोंका उपभोग करके अन्तमें मोक्ष-पदको प्राप्त होता है।

मुनियोंने कहा— देव! जगत्पते! हम आपके मुँहसे द्वादश यात्राकी प्रतिष्ठाकी विधि, पूजन, दान और फल सुनना चाहते हैं।

ब्रह्माजी बोले— ब्राह्मणो! जब बारह यात्राएँ पूरी हो जायँ, तब विधिपूर्वक उनकी प्रतिष्ठा करे। वह सब पापोंका नाश करनेवाली है। ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षमें एकादशी तिथिको एकाग्रचित्तसे किसी पवित्र जलाशयपर जाकर आचमन करे और इन्द्रियसंयमपूर्वक पवित्र भावसे सब तीर्थोंका आवाहन करके भगवान् नारायणका ध्यान करते हुए विधिवत् स्नान करे। ऋषियोंने स्नान-कर्ममें जिसके लिये जैसी विधि बतलायी है, उसको उसी विधिसे स्नान करना चाहिये। स्नानके पश्चात् नाम, गोत्र और विधिको ज्ञाता पुरुष शास्त्रोक्त विधिसे देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अन्य जीवोंका तर्पण करे। फिर जलसे निकलकर दो स्वच्छ वस्त्र पहने और विधिपूर्वक आचमन करके एक सौ आठ बार गायत्रीका मानसिक जप करे। गायत्री सब वेदोंकी माता, सम्पूर्ण पापोंको दूर करनेवाली तथा परम पवित्र है। इसके सिवा अन्यान्य सूर्यसम्बन्धी मन्त्रोंका भी श्रद्धापूर्वक जप करना चाहिये। तत्पश्चात् तीन बार परिक्रमा करके सूर्यदेवको प्रणाम करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीन वर्णोंका स्नान और जप वैदिक विधिके अनुसार बताया गया है; किंतु स्त्री और शूद्रोंके स्नान और जपमें वैदिक विधिका निषेध है।

इसके बाद मौन होकर घरमें जाय और हाथ-पैर धोकर विधिवत् आचमन करके श्रीपुरुषोत्तमकी पूजा करे। पहले भगवान्‌को घीसे स्नान कराये। फिर दूधसे; उसके बाद मधु, गन्ध और जलसे; फिर तीर्थके चन्दन और जलसे स्नान कराये। तदनन्तर भक्तिपूर्वक दो उत्तम वस्त्र पहनाये; फिर चन्दन, अगर, कपूर और केसर भगवान्‌के अङ्गोंमें लगाये। पुनः पराभक्तिके साथ कमलसे तथा विष्णुदेवतासम्बन्धी मल्लिका आदि अन्य पुष्पोंसे श्रीपुरुषोत्तमकी पूजा करे। भोग और मोक्षके दाता जगदीश्वर श्रीहरिकी इस प्रकार पूजा करके उनके समक्ष अगर, गूगल तथा अन्य सुगन्धित पदार्थोंके साथ धूप जलाये। अपनी शक्तिके अनुसार घीसे दीपक जलाकर रखे, घी अथवा तिलके तेलसे अन्य बारह दीपक जलाकर रखे। नैवेद्यके रूपमें