भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१४६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

खीर, पूआ, पूड़ी, बड़ा, लड्डू, खाँड और फल निवेदन करे। इस प्रकार पञ्चोपचारसे श्रीपुरुषोत्तमका पूजन करके ‘ॐ नमः पुरुषोत्तमाय’ इस मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। इसके बाद भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमसे इस प्रकार प्रार्थना करे—

नमस्ते सर्वलोकेश भक्तानामभयप्रद।
संसारसागरे मग्नं त्राहि मां पुरुषोत्तम॥
यास्ते मया कृता यात्रा द्वादशैव जगत्पते।
प्रसादात्तव गोविन्द सम्पूर्णास्ता भवन्तु मे॥

‘भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले सर्वलोकेश्वर पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। मैं इस संसार-सागरमें डूबा हुआ हूँ। मेरा उद्धार कीजिये। जगत्पते! गोविन्द! आपके दर्शनके लिये मैंने जो बारहों यात्राएँ की हैं, वे सब आपके प्रसादसे मेरे लिये परिपूर्ण हों।’

इस प्रकार भगवान्‌को प्रसन्न करके साष्टाङ्ग दण्डवत् करे। तत्पश्चात् पुष्प, वस्त्र और चन्दन आदिसे भक्तिपूर्वक गुरुकी पूजा करे। क्योंकि गुरु और भगवान्‌में कोई अन्तर नहीं है। तदनन्तर भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे भगवान्‌के ऊपर एक सुन्दर पुष्प-मण्डप बनाये, फिर श्रद्धा और एकाग्रतापूर्वक रात्रिमें जागरण करे। भगवान् वासुदेवकी कथा और गीतकी व्यवस्था रखे। इस प्रकार विद्वान् पुरुष ध्यान, पाठ और स्तुति करते हुए रात्रि व्यतीत करे। तत्पश्चात् निर्मल प्रभात होनेपर द्वादशीको बारह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। वे ब्राह्मण स्नातक, वेदोंमें पारंगत, इतिहास-पुराणके ज्ञाता, श्रोत्रिय और जितेन्द्रिय होने चाहिये। इसके बाद स्वयं भी विधिपूर्वक स्नान करके धुला हुआ वस्त्र पहने और इन्द्रियसंयमपूर्वक पहले भगवान्‌को स्नान कराकर उनकी पूजा करे। भगवान्‌की पूजाके बाद ब्राह्मणोंकी भी पूजा करे। उनके लिये बारह गौएँ दान करके श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सुवर्ण, छतरी और जूते, धन तथा वस्त्र आदि समर्पित करे। सद्भावसे पूजित होनेपर भगवान् गोविन्द संतुष्ट होते हैं। आचार्यको भी भक्तिपूर्वक गौ, वस्त्र, सुवर्ण, छतरी, जूते तथा काँसेका पात्र अर्पित करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको खीर, पकवान, गुड़ और घीमें बने हुए पदार्थ भोजन कराये। जब वे भोजन करके तृप्त हो जायँ, तब उनके लिये बारह जलसे भरे हुए घट दान करे। उन घड़ोंके साथ लड्डू और यथाशक्ति दक्षिणा भी होनी चाहिये। आचार्यको भी कलश और दक्षिणा निवेदन करे। इस तरह ब्राह्मणोंकी पूजा करके विष्णुतुल्य ज्ञानदाता गुरुकी भी पूर्ण भक्तिके साथ पूजा करे। पूजनके पश्चात् नमस्कार करके यह मन्त्र पढ़े—

सर्वव्यापी जगन्नाथः शङ्खचक्रगदाधरः।
अनादिनिधनो देवः प्रीयतां पुरुषोत्तमः॥

‘शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले, सर्वव्यापी, जगन्नाथ एवं आदि-अन्तसे रहित भगवान् पुरुषोत्तम मुझपर प्रसन्न हों।’

यों कहकर ब्राह्मणोंकी तीन बार प्रदक्षिणा करे। इसके बाद मस्तक झुकाकर आचार्यको भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। प्रणामके पश्चात् उन्हें विदा करे। फिर अन्य ब्राह्मणोंको भी गाँवकी सीमातक पहुँचा दे। अन्तमें सबको नमस्कार करके लौट आये। फिर स्वजनों, बान्धवों, अन्य उपासकों, दीनों, भिखमंगों और अन्न चाहनेवाले अन्य लोगोंको भोजन कराकर फिर मौन होकर भोजन करे। ऐसा करके समस्त नर-नारी एक हजार अश्वमेध तथा सौ राजसूय-यज्ञोंका फल पाते हैं और ऐसा करनेवाला बुद्धिमान् पुरुष सूर्यके समान तेजस्वी और इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।