संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- तीर्थोंके भेद, वामनका बलिसे भूमिदान-ग्रहण * १४७
तीर्थोंके भेद, वामनका बलिसे भूमिदान-ग्रहण तथा गङ्गाजीका महेश्वरकी जटामें गमन
**ब्रह्माजी कहते हैं—**द्विजवरो! सब तीर्थों और क्षेत्रोंमें जो जप, होम, व्रत और तपस्या तथा दानके फल प्राप्त होते हैं, उनमेंसे कोई ऐसा नहीं दिखायी देता, जो पुरुषोत्तमक्षेत्रमें रहनेके फलकी समानता कर सके। अब बारंबार अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, वह पुरुषोत्तमक्षेत्र सबसे महान् है—यह बात सत्य है, सत्य है, सत्य है। समुद्रके जलसे घिरे हुए पुरुषोत्तमतीर्थका एक बार भी दर्शन कर लेनेपर तथा ब्रह्मविद्याका एक बार बोध हो जानेपर मनुष्य फिर गर्भमें नहीं आता। जहाँ भगवान् विष्णुका संनिधान है, उस उत्तम पुरुषोत्तमक्षेत्रमें एक वर्ष अथवा एक मासतक भगवान्की उपासना करे। ऐसा करनेवाले पुरुषने जप, होम तथा भारी तपस्या की है। वह उस परम धाममें जाता है, जहाँ साक्षात् योगेश्वर श्रीहरि विराजमान रहते हैं।
**मुनियोंने कहा—**भगवन्! हमें तीर्थकी महिमाका विस्तारपूर्वक श्रवण करनेपर भी तृप्ति नहीं होती। आप पुनः किसी गोपनीय तीर्थका वर्णन करें।
**ब्रह्माजी बोले—**श्रेष्ठ ब्राह्मणो! पूर्वकालमें देवर्षि नारदने मुझसे यही प्रश्न पूछा था। उस समय मैंने प्रयत्नपूर्वक जो कुछ उनसे कहा था, वही तुम्हें भी बतलाता हूँ।
**नारदजीने पूछा—**जगतपते! स्वर्गलोक, मर्त्यलोक और रसातलमें कुल कितने तीर्थ हैं तथा सब तीर्थोंमें सदा कौन सबसे बढ़कर है?
**ब्रह्माजी बोले—**देवर्षे! स्वर्गलोक, मर्त्यलोक और रसातलमें चार प्रकारके तीर्थ हैं—दैव, आसुर, आर्ष और मानुष। ये तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। जम्बूद्वीपमें भारतवर्ष तीर्थभूमि है। वह तीनों लोकोंमें विख्यात है। बेटा! वह कर्मभूमि है, इसलिये उसे तीर्थ कहते हैं। पहले मैंने तुम्हें जो बताये हैं, वे सब तीर्थ भारतवर्षमें ही हैं। हिमालय और विन्ध्यपर्वतके बीचमें छः ऐसी नदियाँ हैं, जिनका प्राकट्य ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव—इन देवताओंसे हुआ है। इसी प्रकार दक्षिणसमुद्र तथा विन्ध्यपर्वतके बीचमें भी छः देवसम्भव नदियाँ हैं। ये बारह नदियाँ प्रधानरूपसे बतलायी गयी हैं। गोदावरी, भीमरथी, तुङ्गभद्रा, कृष्णवेणी, तापी और पयोष्णी—ये विन्ध्यपर्वतके दक्षिणकी नदियाँ हैं। भागीरथी, नर्मदा, यमुना, सरस्वती, विशोका और वितस्ता—ये विन्ध्याचल और हिमालय पर्वतसे सम्बन्ध रखनेवाली नदियाँ हैं। इन पुण्यमयी नदियोंको देवतीर्थ बताया गया है। गय, कोल्हासुर, वृत्त, त्रिपुर, अन्धक, हयमूर्धा, लवण, नमुचि, शृङ्गक, यम, पातालकेतु, मय तथा पुष्कर—इनके द्वारा आवृत तीर्थ आसुर कहलाते हैं। प्रभास, भार्गव, अगस्ति, नर-नारायण, वसिष्ठ, भरद्वाज, गौतम और कश्यप—इन ऋषि-मुनियोंद्वारा सेवित तीर्थ ऋषितीर्थ हैं। अम्बरीष, हरिश्चन्द्र, मान्धाता, मनु, कुरु, कनखल, भद्राश्व, सगर, अश्वयूप, नचिकेता, वृषाकपि तथा अरिन्दम आदि मानवोंद्वारा निर्मित तीर्थ मानुष कहलाते हैं। ये सब यश तथा उत्तम फलकी सिद्धिके लिये निर्मित हुए हैं। तीनों लोकोंमें कहीं भी जो स्वतः प्रकट हुए दैव तीर्थ हैं, उन्हें पुण्यतीर्थ कहा गया है। इस प्रकार मैंने तीर्थ-भेद बतलाये हैं।
महादैत्य राजा बलि देवताओंके अजेय शत्रु हुए; उन्होंने धर्म, यश, प्रजापालन, गुरुभक्ति, सत्यभाषण, बल, पराक्रम, त्याग और क्षमाके