संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि तथा उनके पुत्रकी कथा * १९१
उत्सर्ग कर देते हैं।^१ इस परिवर्तनशील संसार-चक्रमें धर्मपरायण तथा शक्तिशाली शरीर पाकर जो प्राणी देवताओं तथा ब्राह्मणोंके लिये अपने प्यारे प्राणोंका त्याग करते हैं, वे ही धन्य हैं। जिसने देह धारण किया है, उसके प्राण एक-न-एक दिन अवश्य जायँगे—यह जानकर जो ब्राह्मण, गौ, देवता तथा दीन आदिके लिये इन प्राणोंका उत्सर्ग करते हैं, वे ईश्वर हैं।^२
यों कहकर उन्होंने अग्नियोंका यथावत् पूजन किया और अपना पेट चीरकर गर्भके बालकको हाथसे निकाल दिया; फिर गङ्गा, पृथ्वी, आश्रम तथा आश्रमके वनस्पतियों और अन्न आदि ओषधियोंको प्रणाम करके पतिकी त्वचा और लोम आदिके साथ चितामें प्रवेश करनेका विचार किया। उस समय वे बोलीं—'मेरे गर्भका यह बालक पिता-मातासे हीन है, इसके कोई सगोत्र बन्धु भी नहीं हैं; अतः सम्पूर्ण भूतगण, ओषधियाँ तथा लोकपाल इसकी रक्षा करें। जो लोग माता-पितासे हीन बालकको अपने औरस पुत्रोंके समान देखते और उसी भावसे रक्षा करते हैं, वे निश्चय ही ब्रह्मा आदि देवताओंके भी वन्दनीय हैं।'^३
यों कहकर दधीचिकी पत्नीने बालकको पीपलके समीप रख दिया और स्वामीमें चित्त लगाकर अग्निको प्रणाम किया; फिर अग्निकी परिक्रमा करके यज्ञपात्रोंके साथ ही चितामें प्रवेश किया और पतिसहित दिव्यलोकको चली गयीं।
उस समय आश्रमके वनवासी वृक्ष भी रोने लगे। प्रातिथेयी और दधीचिने उनका अपने पुत्रोंकी भाँति पालन किया था। मृग, पक्षी तथा वृक्ष सब रो-रोकर एक-दूसरेसे कहने लगे—'हम पिता दधीचि और माता प्रातिथेयीके बिना जीवित नहीं रह सकते। जो लोग स्वर्गवासी माता-पिताकी संतानोंपर निरन्तर स्वाभाविक स्नेह रखते हैं, वे ही पुण्यात्मा और कृतार्थ हैं।^४ दधीचि और प्रातिथेयी हमें जिस स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा करते थे, वैसे सगे माता-पिता भी नहीं देखते। हमें धिक्कार है। हम पापी हैं, जो उनके दर्शनसे वञ्चित हो गये। आजसे हम सब लोगोंका यही निश्चय होना चाहिये कि यह बालक ही हमलोगोंके लिये दधीचि और प्रातिथेयी है तथा यह बालक ही हमारा सनातन धर्म है।'
यों कहकर वनस्पतियों और ओषधियोंने अपने राजा सोमके पास जाकर उत्तम अमृतकी याचना की। सोमने उन्हें बहुत उत्तम अमृत दिया और वनस्पतियोंने वह लाकर बालकको दे दिया। अमृतसे तृप्त हुआ बालक शुक्लपक्षके चन्द्रमाके समान बढ़ने लगा। पीपलके वृक्षोंने उसका पालन किया था, इसलिये वह पिप्पलादके नामसे प्रसिद्ध हुआ। बड़ा होनेपर पिप्पलादने पीपलके वृक्षोंसे अत्यन्त विस्मित होकर कहा—'लोकमें यह देखा जाता है कि मनुष्योंसे मनुष्य, पक्षियोंसे पक्षी तथा वनस्पतियोंसे वनस्पति उत्पन्न होते हैं; इसमें
१. उत्पद्यते यत्तु विनाशि सर्वं न शोच्यमस्तीति मनुष्यलोके। गोविप्रदेवार्थमिह त्यजन्ति प्राणान् प्रियान् पुण्यभाजो मनुष्याः॥ (११०।६३)
२. प्राणाः सर्वेऽस्यापि देहान्वितस्य यातारो वै नात्र संदेहलेशः। एवं ज्ञात्वा विप्रगोदेवदीनार्थं चैनानुत्सृजन्तीश्वरास्ते॥ (११०।६५)
३. ये बालकं मातृपितृप्रहीणं सनिर्विशेषं स्वतनूत्प्ररूढैः। पश्यन्ति रक्षन्ति त एव नूनं ब्रह्मादिकानामपि वन्दनीयाः॥ (११०।७०)
४. स्वर्गमासेदुषोः पित्रोस्तदपत्येष्वकृत्रिमम्। ये कुर्वन्त्यनिशं स्नेहं त एव कृतिनो नराः॥ (११०।७५)