भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१९२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


कहीं विषमता नहीं दिखायी देती। परंतु मैं वृक्षका पुत्र होकर हाथ-पैर आदिसे विशिष्ट जीव कैसे हो गया!' उनकी बात सुनकर वृक्षोंने क्रमशः उनके पिता दधीचिकी मृत्यु और पतिव्रता माताके अग्निप्रवेशका सब समाचार कह सुनाया। सुनते ही वे दुःखसे व्याप्त होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। उस समय वृक्षोंने धर्म और अर्थयुक्त वचन कहकर उन्हें सान्त्वना दी। आश्वस्त होनेपर उन्होंने ओषधियों और वनस्पतियोंसे कहा— 'जिन्होंने मेरे पिताकी हत्या की है, उनका मैं भी वध करूँगा, अन्यथा जीवित नहीं रह सकता। जो पिताके मित्र और शत्रु होते हैं, उनके साथ पुत्र भी वैसा ही बर्ताव करता है। जो ऐसा करता है, वही पुत्र है। जो इसके विपरीत आचरण करता है, वह पुत्रके रूपमें शत्रु माना गया है।'

वृक्षोंने कहा—महाद्युते! तुम्हारी माताने परलोकमें जाते समय यह उद्गार प्रकट किया था—'जो दूसरोंके द्रोहमें लगे रहते हैं, जो अपने कल्याणकी बातें भूल जाते हैं तथा जो भ्रान्तचित्त होकर इधर-उधर भटकते हैं, वे नरकके गड्ढेमें गिरते हैं।' माताकी कही हुई वह बात सुनकर पिप्पलाद कुपित होकर बोले—'जिसके अन्तःकरणमें अपमानकी आग प्रज्वलित हो रही हो, उसके सामने साधुताकी बातें व्यर्थ हैं।' फिर उन्होंने भगवान् चक्रेश्वर महादेवके स्थानपर जाकर उनसे कहा—'मुझे तो शत्रुओंका नाश करनेके लिये कोई शक्ति दीजिये।' पिप्पलादके इतना कहते ही भगवान् शंकरके नेत्रोंसे भयंकर कृत्या प्रकट हुई। उसकी आकृति बड़वा (घोड़ी)-के समान थी। सम्पूर्ण जीवोंका विनाश करनेके लिये उसने अपने गर्भमें भयंकर अग्नि छिपा रखी थी। मृत्युकी लपलपाती हुई जीभके समान वह महारौद्ररूपा भीषण कृत्या पिप्पलादसे बोली— 'बताओ, मुझे क्या करना है?' पिप्पलादने कहा—'देवता मेरे शत्रु हैं। उन्हें खा जा।' फिर तो उस बड़वाके गर्भसे महाभयंकर अग्नि प्रकट हुई, जो समस्त लोकोंका प्रलय करनेमें समर्थ थी। देवता उसे देखते ही थर्रा उठे और पिप्पलादद्वारा आराधित पिप्पलेश नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिवकी शरणमें आये। उन्होंने भयभीत होकर शिवजीकी स्तुति करते हुए कहा—'शम्भो! आप हमारी रक्षा करें। कृत्या और उससे प्रकट हुई आग हमें बड़ा कष्ट दे रही है। सर्वेश्वर! आप भयभीत मनुष्योंको अभय देनेवाले हैं। शिव! जो सब ओरसे सताये हुए, पीड़ित तथा श्रान्तचित्त प्राणी हैं, उन सबकी आप ही शरण हैं। जगन्मय! आप पिप्पलादको शान्त कीजिये।'

'बहुत अच्छा' कहकर जगदीश्वर शिवने पिप्पलादके पास आकर उससे कहा—'बेटा! देवताओंका नाश कर दिया जाय तो भी तुम्हारे पिता लौटकर नहीं आयेंगे। उन्होंने देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये अपने प्राण दिये हैं। संसारमें