भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 195
  • चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि तथा उनके पुत्रकी कथा * १९३

उनके समान दीन-दुःखियोंका दयामय बन्धु कौन होगा ! तुम्हारी पतिव्रता माता भी उन्हींके साथ दिव्यलोकमें चली गयीं। यहाँ उनकी समता करनेवाली कौन स्त्री है। क्या लोपामुद्रा और अरुन्धती भी उनकी बराबरी कर सकती हैं? जिनकी हड्डियोंसे सम्पूर्ण देवता सदा विजयी और सुखी बने रहते हैं, वे तुम्हारे पिता कितने शक्तिशाली थे ! उन्होंने जिस उज्ज्वल सुयश-राशिका उपार्जन किया है, उसे तुम्हारी माताने अपने दिव्य त्यागसे अक्षय बना दिया है। तुम उन्हींके पुत्र हो। उनसे बढ़कर तुमने अभीतक कुछ नहीं किया। तुम्हारे प्रताप और भयसे आज देवता स्वर्गसे भ्रष्ट हो चुके हैं। वे सोच नहीं पाते कि हम किस दिशाको भागकर जायँ। तुम उन्हें बचाओ। अमरोंकी रक्षा करो। आर्त्त प्राणियोंकी रक्षासे बढ़कर पुण्य कहीं भी नहीं है। मनुष्यलोकमें जबतक मनोहर यश फैला रहता है, तबतक एक-एक दिनके बदले एक-एक वर्षके क्रमसे दीर्घकालतक स्वर्गलोकमें मनुष्य निर्विकार चित्तसे निवास करते हैं। इस जगत्‌में वे ही मुर्देके समान हैं, जिन्होंने यशका उपार्जन नहीं किया; वे ही अंधे हैं, जिन्होंने शास्त्र नहीं पढ़े। वे ही नपुंसक हैं, जो सदा दान नहीं देते तथा वे ही शोकके योग्य हैं, जो सदा धर्मपालनमें संलग्न नहीं रहते।*

देवाधिदेव महादेवजीका यह वचन सुनकर पिप्पलाद मुनि शान्त हो गये। उन्होंने भगवान् शिवको नमस्कार किया और हाथ जोड़कर कहा—'जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा मेरे हितमें संलग्न रहकर मेरा उपकार करते रहते हैं, उनका तथा अन्य लोगोंका हित करनेके लिये मैं देवता आदिके पूजनीय उमासहित भगवान् शंकरको प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने मेरी रक्षा की, हमें पाल-पोसकर बड़ा किया, अपना सगोत्र और सहधर्मी बनाया, भगवान् शिव उनके मनोरथ पूर्ण करें। मैं बाल-चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले महादेवजीको नित्य प्रणाम करता हूँ। प्रभो! जिन्होंने माता-पिताकी भाँति मेरा भरण-पोषण किया है, उनके नामसे तीनों लोकोंके लिये यह तीर्थ हो। इससे उनका यश होगा और मैं उनके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। पृथ्वीपर देवताओंके जो-जो क्षेत्र और तीर्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा इस तीर्थका अधिक माहात्म्य हो। इस बातका यदि देवतालोग अनुमोदन करें तो मैं उनके अपराध क्षमा कर सकता हूँ।'

पिप्पलादने यह बात इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके सामने कही और सबने आदरपूर्वक इसका समर्थन किया। बालक पिप्पलादकी बुद्धि, विनय, विद्या, शौर्य, बल, साहस, सत्यभाषण, माता-पिताके प्रति भक्ति तथा भाव-शुद्धिको जानकर शंकरजीने उनसे कहा—'बेटा! जो तुम्हारा अभीष्ट हो, उसे बताओ। वह तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। तुम अपने मनमें अन्यथा विचार न करना।'

पिप्पलाद बोले—महेश्वर! जो धर्मनिष्ठ पुरुष गङ्गाजीमें स्नान करके आपके चरणकमलोंका दर्शन करते हैं, उन्हें समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त हों और शरीरका अन्त होनेपर वे शिवके धाममें जायँ। नाथ! मेरे पिता और माता आपके चरणोंमें पड़े थे। ये पीपल और देवता भी आपके स्थानमें आकर सुखी हुए हैं। ये सब लोग सदा आपका दर्शन करें और आपके ही धाम जायँ।

पिप्पलादकी यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उनके भयसे मुक्त हो इस


* मृतास्त एवात्र यशो न येषामन्धास्त एव श्रुतवर्जिता ये। ये दानशीला न नपुंसकास्ते ये धर्मशीला न त एव शोच्याः ॥
(११० । १५६)