संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- चक्रतीर्थ और पिप्पलतीर्थकी महिमा, महर्षि दधीचि तथा उनके पुत्रकी कथा * १९३
उनके समान दीन-दुःखियोंका दयामय बन्धु कौन होगा ! तुम्हारी पतिव्रता माता भी उन्हींके साथ दिव्यलोकमें चली गयीं। यहाँ उनकी समता करनेवाली कौन स्त्री है। क्या लोपामुद्रा और अरुन्धती भी उनकी बराबरी कर सकती हैं? जिनकी हड्डियोंसे सम्पूर्ण देवता सदा विजयी और सुखी बने रहते हैं, वे तुम्हारे पिता कितने शक्तिशाली थे ! उन्होंने जिस उज्ज्वल सुयश-राशिका उपार्जन किया है, उसे तुम्हारी माताने अपने दिव्य त्यागसे अक्षय बना दिया है। तुम उन्हींके पुत्र हो। उनसे बढ़कर तुमने अभीतक कुछ नहीं किया। तुम्हारे प्रताप और भयसे आज देवता स्वर्गसे भ्रष्ट हो चुके हैं। वे सोच नहीं पाते कि हम किस दिशाको भागकर जायँ। तुम उन्हें बचाओ। अमरोंकी रक्षा करो। आर्त्त प्राणियोंकी रक्षासे बढ़कर पुण्य कहीं भी नहीं है। मनुष्यलोकमें जबतक मनोहर यश फैला रहता है, तबतक एक-एक दिनके बदले एक-एक वर्षके क्रमसे दीर्घकालतक स्वर्गलोकमें मनुष्य निर्विकार चित्तसे निवास करते हैं। इस जगत्में वे ही मुर्देके समान हैं, जिन्होंने यशका उपार्जन नहीं किया; वे ही अंधे हैं, जिन्होंने शास्त्र नहीं पढ़े। वे ही नपुंसक हैं, जो सदा दान नहीं देते तथा वे ही शोकके योग्य हैं, जो सदा धर्मपालनमें संलग्न नहीं रहते।*
देवाधिदेव महादेवजीका यह वचन सुनकर पिप्पलाद मुनि शान्त हो गये। उन्होंने भगवान् शिवको नमस्कार किया और हाथ जोड़कर कहा—'जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा मेरे हितमें संलग्न रहकर मेरा उपकार करते रहते हैं, उनका तथा अन्य लोगोंका हित करनेके लिये मैं देवता आदिके पूजनीय उमासहित भगवान् शंकरको प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने मेरी रक्षा की, हमें पाल-पोसकर बड़ा किया, अपना सगोत्र और सहधर्मी बनाया, भगवान् शिव उनके मनोरथ पूर्ण करें। मैं बाल-चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले महादेवजीको नित्य प्रणाम करता हूँ। प्रभो! जिन्होंने माता-पिताकी भाँति मेरा भरण-पोषण किया है, उनके नामसे तीनों लोकोंके लिये यह तीर्थ हो। इससे उनका यश होगा और मैं उनके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। पृथ्वीपर देवताओंके जो-जो क्षेत्र और तीर्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा इस तीर्थका अधिक माहात्म्य हो। इस बातका यदि देवतालोग अनुमोदन करें तो मैं उनके अपराध क्षमा कर सकता हूँ।'
पिप्पलादने यह बात इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके सामने कही और सबने आदरपूर्वक इसका समर्थन किया। बालक पिप्पलादकी बुद्धि, विनय, विद्या, शौर्य, बल, साहस, सत्यभाषण, माता-पिताके प्रति भक्ति तथा भाव-शुद्धिको जानकर शंकरजीने उनसे कहा—'बेटा! जो तुम्हारा अभीष्ट हो, उसे बताओ। वह तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। तुम अपने मनमें अन्यथा विचार न करना।'
पिप्पलाद बोले—महेश्वर! जो धर्मनिष्ठ पुरुष गङ्गाजीमें स्नान करके आपके चरणकमलोंका दर्शन करते हैं, उन्हें समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त हों और शरीरका अन्त होनेपर वे शिवके धाममें जायँ। नाथ! मेरे पिता और माता आपके चरणोंमें पड़े थे। ये पीपल और देवता भी आपके स्थानमें आकर सुखी हुए हैं। ये सब लोग सदा आपका दर्शन करें और आपके ही धाम जायँ।
पिप्पलादकी यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उनके भयसे मुक्त हो इस
* मृतास्त एवात्र यशो न येषामन्धास्त एव श्रुतवर्जिता ये। ये दानशीला न नपुंसकास्ते ये धर्मशीला न त एव शोच्याः ॥
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प्रकार बोले—'ब्रह्मन्! तुमने वही किया है, जो देवताओंको अभीष्ट था। देवाधिदेव भगवान् शिवकी आज्ञाका भी पालन किया और पहले वरदान भी दूसरोंके ही लिये माँगा, अपने लिये नहीं; इसलिये हम भी संतुष्ट होकर तुम्हें कुछ देना चाहते हैं। तुम हमसे कोई वर माँगो।'
पिप्पलादने कहा—देवताओ ! मैं अपने माता-पिताको देखना चाहता हूँ। मैंने केवल उनका नाम सुना है। संसारमें वे ही प्राणी धन्य हैं, जो माता-पिताके अधीन रहकर उनकी सेवा-शुश्रूषा करते हैं। अपनी इन्द्रियोंको, शरीरको, कुल, शक्ति और बुद्धिको माता-पिताके कार्यमें लगाकर पुत्र कृतकृत्य हो जाता है। यदि मैं उनका दर्शन भी पा जाऊँ तो मेरे मन, वचन, शरीर और क्रियाओंका फल प्राप्त हो जायगा।
पिप्पलाद मुनिका यह कथन सुनकर देवताओंने परस्पर सलाह करके कहा—'ब्रह्मन् ! तुम्हारे माता-पिता दिव्य विमानपर आरूढ़ हो तुम्हें देखनेके लिये आते हैं। तुम भी निश्चय ही उन्हें देखोगे। विषाद छोड़कर अपने मनको शान्त करो। देखो, देखो, वे श्रेष्ठ विमानपर बैठे आ रहे हैं। उनके दिव्य शरीरपर स्वर्गीय आभूषण शोभा पाते हैं।' पिप्पलादने भगवान् शिवके समीप अपने माता-पिताको देखकर प्रणाम किया। उस समय उनके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भर आये थे। वे किसी तरह गद्गद कण्ठसे बोले—'अन्य कुलीन पुत्र अपने माता-पिताको तारते हैं; किंतु मैं ऐसा भाग्यहीन हूँ, जो अपनी माताके उदरको विदीर्ण करनेमें कारण बना।'
उस समय उसके माता-पिताने कहा—'पुत्र ! तुम धन्य हो, जिसकी कीर्ति स्वर्गलोकतक फैली है। तुमने भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन किया और देवताओंको सान्त्वना दी। तुम-जैसे पुत्रसे पितरोंके उत्तम लोक कभी क्षीण नहीं होते।' इसी समय पिप्पलादके मस्तकपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। देवताओंने जय-जयकार किया। पत्नीसहित दधीचिने भी पुत्रको आशीर्वाद दिया और शंकर, गङ्गा तथा देवताओंको नमस्कार करके पिप्पलादसे कहा—'बेटा ! विवाह करके भगवान् शिवकी भक्ति और गङ्गाजीका सेवन करो। पुत्रोंकी उत्पत्ति करके विधिपूर्वक दक्षिणासहित यज्ञोंका अनुष्ठान करो और सब प्रकारसे कृतार्थ हो दीर्घकालके लिये दिव्यलोकमें स्थान प्राप्त करो।'
पिप्पलादने कहा—पिताजी ! मैं ऐसा ही करूँगा।
तदनन्तर पत्नीसहित दधीचि पुत्रको बारंबार सान्त्वना दे देवताओंकी आज्ञा ले पुनः दिव्यलोकमें चले गये। इसके बाद देवताओंने भगवान् शिवसे कहा—'जगदीश्वर ! अब दधीचिकी हड्डियोंकी, हमारी तथा इन गौओंकी पवित्रताके लिये कोई उपाय बताइये।' शिवने कहा—'गङ्गाजीमें स्नान करके सम्पूर्ण देवता और गौएँ पापमुक्त हो सकती हैं। इसी प्रकार दधीचिके शरीरकी हड्डियाँ भी गङ्गाजीके जलमें धोनेसे पवित्र हो जायँगी।' शिवजीकी आज्ञाके अनुसार देवता स्नान करके शुद्ध हो गये और हड्डियाँ धोनेमात्रसे पवित्र हो गयीं। जहाँ देवता पापमुक्त हुए, वह 'पापनाशन' तीर्थ कहलाता है। वहाँका स्नान और दान ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला है। जहाँ गौएँ पवित्र हुईं, उस स्थानका नाम 'गोतीर्थ' हुआ। जहाँ दधीचिकी हड्डियाँ पवित्र की गयीं, उसे 'पितृतीर्थ' जानना चाहिये। वह पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। जिस किसी प्राणीके, वह कितना ही पापी क्यों न हो, शरीरकी राख, हड्डी, नख और रोएँ उस तीर्थमें पड़ जाते हैं, वह तबतक स्वर्गलोकमें निवास करता है जबतक कि चन्द्रमा, सूर्य और
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तारोंका अस्तित्व बना रहता है। इस प्रकार उस तीर्थसे तीन तीर्थ प्रकट हुए। उस समय देवताओं और गौओंने पवित्र होकर भगवान् शंकरसे कहा—'हमलोग अपने-अपने स्थानको जायेंगे। यहाँ सूर्यदेवकी प्रतिष्ठा की गयी है। इनके प्रतिष्ठित होनेसे सब देवता प्रतिष्ठित हो जायेंगे। इसलिये आप हमें आज्ञा दें। सनातन सूर्यदेव स्थावर-जङ्गमरूप जगत्के आत्मा हैं। जहाँ जगज्जननी गङ्गा और साक्षात् भगवान् त्र्यम्बक विराज रहे हैं, वहाँ प्रतिष्ठान नामक तीर्थ भी हो।'
यों कहकर देवताओंने पिप्पलादसे भी अनुमति ली और अपने-अपने निवासस्थानको चले गये। वहाँ जितने पीपल थे, कालान्तरमें अक्षय स्वर्गको प्राप्त हुए। प्रतापी पिप्पलादने उस क्षेत्रके अधिष्ठाता देवताके रूपमें भगवान् शंकरकी स्थापना करके उनका पूजन किया। फिर गौतमकी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके कई पुत्र उत्पन्न किये, लक्ष्मी और यज्ञका उपार्जन किया तथा अन्तमें वे सुहृज्जनोंके साथ स्वर्गलोकको चले गये। तबसे वह क्षेत्र पिप्पलेश्वरतीर्थ कहलाने लगा। वह सब यज्ञोंका फल देनेवाला पवित्र तीर्थ है। उसके स्मरणमात्रसे पापोंका नाश हो जाता है। फिर स्नान, दान और सूर्यके दर्शनसे जो लाभ होता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। वहाँ देवाधिदेव महादेवजीके दो नाम हैं—चक्रेश्वर और पिप्पलेश्वर। इस रहस्यको जानकर मनुष्य सब अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। देवमन्दिरमें सूर्यकी प्रतिष्ठा होनेसे वह क्षेत्र प्रतिष्ठान कहलाया, जो देवताओंको भी बहुत प्रिय है। यह उपाख्यान अत्यन्त पवित्र है। जो मनुष्य इसका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह दीर्घजीवी, धनवान् और धर्मात्मा होता है तथा अन्तमें भगवान् शंकरका स्मरण करके उन्हींको प्राप्त कर लेता है।
नागतीर्थकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं— नागतीर्थके नामसे जो प्रसिद्ध क्षेत्र है, वह सब अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला तथा मङ्गलमय है। वहाँ भगवान् नागेश्वर निवास करते हैं। उनके माहात्म्यकी विस्तृत कथा भी सुनो। प्रतिष्ठानपुरमें चन्द्रवंशी राजा शूरसेन राज्य करते थे। वे समस्त गुणोंके सागर और बुद्धिमान् थे। उन्होंने अपनी पत्नीके साथ पुत्र उत्पन्न होनेके लिये बड़े-बड़े यत्न किये। दीर्घकालके पश्चात् उन्हें एक पुत्र हुआ, किन्तु वह भयानक आकारवाला सर्प था। राजाने उस पुत्रको बहुत छिपाकर रखा। किसीको इस बातका पता न लगा कि राजाका पुत्र सर्प है। अन्तःपुर अथवा बाहरका मनुष्य भी इस भेदसे परिचित न हो सका। माता-पिताके सिवा धाय, अमात्य और पुरोहित भी यह बात नहीं जानते थे। उस भयंकर सर्पको देखकर पत्नीसहित राजाको प्रतिदिन बड़ा संताप होता था। वे सोचते, सर्परूप पुत्रकी अपेक्षा तो पुत्रहीन रहना ही अच्छा है। वह था तो बहुत बड़ा सर्प, किंतु बातें मनुष्योंकी-सी करता था। उसने पितासे कहा—'मेरे चूड़ाकरण, उपनयन तथा वेदाध्ययन-संस्कार कराइये। द्विज जबतक वेदका अध्ययन नहीं करता, तबतक शूद्रके समान रहता है।'
पुत्रकी यह बात सुनकर शूरसेन बहुत दुःखी हुए। उन्होंने किसी ब्राह्मणको बुलाकर उसके संस्कार आदि कराये। वेदाध्ययन समाप्त करके सर्पने अपने पितासे कहा—'नृपश्रेष्ठ! मेरा विवाह कर दीजिये। मुझे स्त्री प्राप्त करनेकी इच्छा हो रही है। मेरा विश्वास है, ऐसा किये बिना आपका
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कोई भी कार्य सिद्ध न हो सकेगा। पुत्रका यह निश्चय जानकर राजाने अमात्योंको बुलाया और उसके विवाहके लिये इस प्रकार कहा—'मेरा पुत्र युवराज नागेश्वर सब गुणोंकी खान है। वह बुद्धिमान, शूर, दुर्जय तथा शत्रुओंको संताप देनेवाला है। उसका विवाह करना है। मैं बूढ़ा हुआ। अब पुत्रको राज्यका भार सौंपकर निश्चिन्त होना चाहता हूँ। आपलोग मेरे हित-साधनमें तत्पर हो उसके विवाहके लिय प्रयत्न करें।'
राजाकी बात सुनकर अमात्यगण हाथ जोड़कर बोले—'महाराज ! आपके पुत्र सब गुणोंमें श्रेष्ठ हैं और आप भी सर्वत्र विख्यात हैं। फिर आपके पुत्रका विवाह करनेके लिये क्या मन्त्रणा करनी है और किस बातकी चिन्ता।' अमात्योंके यों कहनेपर नृपश्रेष्ठ शूरसेन कुछ गम्भीर हो गये। वे उन अमात्योंको यह बताना नहीं चाहते थे कि मेरा बेटा सर्प है; तथा वे भी इस बातसे अपरिचित ही रहे। राजाने फिर कहा—'कौन कन्या गुणोंमें सबसे अधिक है तथा कौन राजा ऊँचे कुलमें उत्पन्न, श्रीमान् और उत्तम गुणोंके आश्रय हैं?' राजाका यह कथन सुनकर अमात्योंमेंसे एक परम बुद्धिमान् पुरुष, जो महाराजके संकेतको समझनेवाले थे, उनका विचार जानकर बोले—'महाराज! पूर्वदेशमें विजय नामके एक राजा हैं। उनके पास घोड़े, हाथी और रत्नोंकी गिनती नहीं है। महाराज विजयके आठ पुत्र हैं, जो बड़े धनुर्धर हैं। उनकी बहिन भोगवती साक्षात् लक्ष्मीके समान है। राजन्! वह आपके पुत्रके लिये सुयोग्य पत्नी होगी।'
बूढ़े अमात्यकी बात सुनकर राजाने उत्तर दिया—'राजा विजयकी वह कन्या मेरे पुत्रके लिये कैसे प्राप्त हो सकती है, बताओ।'
बूढ़े अमात्यने कहा—'महाराज! आपके मनमें जो बात है, मैं उसे समझ गया। अब आप मुझे कार्य-सिद्धिके लिये जानेकी आज्ञा दें।' महाराज शूरसेनने भूषण, वस्त्र तथा मधुर वाणीसे बूढ़े मन्त्रीका सत्कार करके उन्हें बहुत बड़ी सेनाके साथ भेजा। वे पूर्वदेशमें जाकर महाराज विजयसे मिले और नाना प्रकारके वचनों तथा नीतिजनित उपायोंसे राजाको संतुष्ट किया। मन्त्रीने राजकुमारी भोगवती और युवराज नागका विवाह तय करा दिया। राजा विजयने कन्या देना स्वीकार कर लिया। बूढ़े मन्त्री लौट आये और शूरसेनसे उन्होंने विवाह निश्चित होनेका सब वृत्तान्त सुना दिया। तदनन्तर बहुत समय व्यतीत हो जानेपर वृद्ध मन्त्री अन्य सब सचिवोंको साथ लेकर सहसा राजा विजयके वहाँ पहुँचे और इस प्रकार बोले—'राजन्! महाराज शूरसेनके राजकुमार नाग बड़े ही बुद्धिमान् और गुणोंके समुद्र हैं। वे स्वयं यहाँ आना नहीं चाहते। क्षत्रियोंके विवाह अनेक प्रकारसे होते हैं। अतः यह विवाह शस्त्रों द्वारा हो जाय तो अच्छा है।'
वृद्ध मन्त्रीकी बात सुनकर राजा विजयने उसे सत्य ही माना और भोगवतीका विवाह शस्त्रके साथ ही शास्त्र-विधिके अनुसार सम्पन्न हुआ। विवाहके पश्चात् महाराजने बड़े हर्षके साथ बहुत-सी गौएँ, सुवर्ण और अश्व आदि सामग्री दहेजमें देकर कन्याको विदा किया। साथ ही अपने अमात्योंको भी भेजा। बूढ़े मन्त्री आदि सचिवोंने प्रतिष्ठानमें आकर महाराज शूरसेनको उनकी पुत्रवधू समर्पित कर दी। राजा विजयने जो विनयपूर्ण वचन कहे थे, उनको भी सुनाया और उनकी दी हुई दहेजकी सामग्री—विचित्र आभूषण, दासियाँ तथा वस्त्र आदि निवेदन किये। इन सब कार्योंका सम्पादन करके वे लोग कृतकृत्य हो गये। राजकुमारी भोगवतीके साथ
- नागतीर्थकी महिमा * १९७
जो विजयके अमात्य पधारे थे, उनका महाराज शूरसेनने बड़े सम्मानके साथ स्वागत-सत्कार किया। जिसे सुनकर राजा विजयको प्रसन्नता हो, ऐसा बर्ताव करके सबको विदा किया। राजा विजयकी कन्या रूपवती थी। वह सुन्दरी सदा अपने सास-ससुरकी सेवामें संलग्न रहती थी। भोगवतीका पति अत्यन्त भीषण महानाग रत्नोंसे सुशोभित एकान्त गृहमें सुगन्धित पुष्पोंसे बिछी हुई सुखद शय्यापर आराम करता था। उसने अपने माता-पितासे बार-बार कहा—‘मेरी पत्नी राजकुमारी मेरे समीप क्यों नहीं आती?’ पुत्रकी यह बात सुनकर उसकी माताने धायसे कहा—‘तुम भोगवतीसे जाकर कहो, ‘तुम्हारा पति एक सर्प है। देखो, इसपर क्या कहती है।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर धाय भोगवतीके पास गयी और एकान्तमें विनीत भावसे बोली—‘कल्याणी! मैं तुम्हारे पतिको जानती हूँ। वे देवता हैं। किंतु यह बात किसीपर प्रकट न करना—वे मनुष्य नहीं, सर्पके रूपमें हैं।’ धायकी बात सुनकर भोगवतीने कहा—‘मनुष्य-कन्याको सामान्यतः मनुष्य ही पति मिला करता है; यदि देवजातिका पुरुष पतिरूपमें प्राप्त हो, तब तो क्या कहना। वह तो बड़े पुण्यसे मिलता है।’ धायने भोगवतीकी बात सर्पसे, उसकी मातासे और महाराज शूरसेनसे भी कही। भोगवतीने भी धायको बुलाकर कहा—‘तुम्हारा कल्याण हो, मुझे मेरे स्वामीका दर्शन तो कराओ।’
तब धायने उसे ले जाकर अत्यन्त भयानक सर्पका दर्शन कराया। वह सुगन्धित फूलोंसे आच्छादित पलंगपर विराजमान था। एकान्त गृहमें रत्नोंसे विभूषित भयानक सर्पके आकारमें बैठे हुए अपने स्वामीको देखकर भोगवतीने हाथ जोड़कर कहा—‘मैं धन्य और अनुगृहीत हूँ, जिसके पति देवता हैं। पति ही स्त्रीकी गति है।’ यह सुनकर नागको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने हँसकर कहा—‘सुन्दरी! मैं तुम्हारी भक्तिसे संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हें क्या अभीष्ट वरदान दूँ ? तुम्हारे अनुग्रहसे मेरी सम्पूर्ण स्मरणशक्ति जाग उठी है। मुझे पिनाकधारी देवाधिदेव भगवान् शंकरने शाप दिया है। शेषनागका पुत्र महाबलवान् नाग जो भगवान् शंकरके हाथका कङ्कण बना रहता है, वही मैं तुम्हारा पति हूँ और तुम भी वही पूर्वजन्मकी मेरी पत्नी भोगवती हो। एक दिन भगवान् शंकर एकान्तमें पार्वतीजीके साथ बैठे थे। वहाँ पार्वतीजीने एक बात कही, जिसे सुनकर भगवान् शिव ठठाकर हँस पड़े। उस समय मुझे भी हँसी आ गयी। इससे कुपित होकर भगवान्ने मुझे यह शाप दिया—‘तू मनुष्य-योनिमें सर्परूपसे जन्म लेकर ज्ञानी होगा।’ कल्याणी! यह शाप सुनकर तुमने और मैंने भी भगवान्को प्रसन्न करनेकी चेष्टा की। तब उन्होंने कहा—‘जब तुम गौतमीके तटपर मेरा पूजन करोगे और मैं तुम्हारे अन्तःकरणमें ज्ञानका आधान करूँगा, उस समय तुम भोगवतीके प्रसादसे शापमुक्त हो जाओगे’ इसीलिये मुझपर यह संकट आया है। तुम मुझे गौतमीके तटपर ले चलो और मेरे साथ ही भगवान्की पूजा करो। इससे मेरा शाप छूट जायगा और हम दोनों पुनः भगवान् शिवका सांनिध्य प्राप्त करेंगे। कष्टमें पड़े हुए समस्त प्राणियोंके लिये सदा भगवान् शिव ही परम गति हैं।’ पति की यह बात सुनकर भोगवती उन्हें साथ ले गौतमी-तटपर गयी और वहाँ गौतमीमें स्नान करके उसने शिवका पूजन किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान्ने उस सर्पको दिव्य रूप प्रदान किया। तब वह अपने माता-पितासे पूछकर
५१- मातृतीर्थ, अविघ्नतीर्थ और शेषतीर्थकी महिमा
१९८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
शिवलोकमें जानेको उद्यत हुआ। यह जानकर पिताने कहा—'बेटा ! तुम एक ही मेरे पुत्र और युवराज हो; इसलिये इस समस्त राज्यका पालन करो और बहुत-से पुत्र उत्पन्न करके मेरे स्वर्गगमनके पश्चात् शिवलोकमें जाओ।' पिताका यह कथन सुनकर नागराजने कहा—'अच्छा, ऐसा ही करूँगा।' फिर वे इच्छानुसार रूप धारण करके अपनी पत्नीके साथ रहने लगे। पिता, माता और पुत्रोंके साथ उन्होंने उस विशाल राज्यका उपभोग किया और जब पिता स्वर्गलोकमें चले गये, तब अपने पुत्रोंको राज्यपर बिठाकर वे पत्नी और अमात्य आदिके साथ शिवपुरमें गये। तबसे वह तीर्थ नागतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वहाँ भोगवतीके द्वारा स्थापित भगवान् नागेश्वर निवास करते हैं। उस तीर्थमें किया हुआ स्नान और दान सब तीर्थोंका फल देनेवाला है।
मातृतीर्थ, अविघ्नतीर्थ और शेषतीर्थकी महिमा
**ब्रह्माजी कहते हैं—**गौतमीके तटपर मातृतीर्थके नामसे विख्यात जो उत्तम तीर्थ है, वह मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। जीव उसके स्मरण करनेमात्रसे समस्त मानसिक चिन्ताओंसे मुक्त हो जाता है। पूर्वकालमें देवताओं और असुरोंके बीच बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ा था। उस समय देवतालोग दानवोंको परास्त न कर सके। तब मैं सब देवताओंके साथ शूलपाणि भगवान् शंकरके पास गया और हाथ जोड़कर नाना प्रकारके वाक्योंद्वारा उनका स्तवन करने लगा—'महेश ! जिस समय सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंने एक-दूसरेसे सलाह करके समुद्रका मन्थन किया और उसमेंसे एक कालकूट विष निकला, उसे खा लेनेमें आपके सिवा दूसरा कौन समर्थ हो सकता था। जिसके सामने दूसरे देवता मस्तक झुकाते हैं तथा जो केवल फूलोंकी मारसे तीनों लोकोंको अपने अधीन करनेमें समर्थ है, वही कामदेव जब आपपर आक्रमण करने चला, तब स्वयं ही नष्ट हो गया। अतः आपसे बढ़कर शक्तिशाली दूसरा कौन है।'
यह स्तुति सुनकर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये और बोले—'देवताओ ! बतलाओ, क्या चाहते हो ? मैं तुम्हें अभीष्ट वरदान दूँगा।' देवता बोले—'वृषभध्वज ! हमपर दानवोंकी ओरसे बड़ा भारी भय उपस्थित हुआ है। आप वहाँ चलकर शत्रुओंका संहार और देवताओंकी रक्षा करें। प्रभो ! हम आपसे सनाथ हैं।' देवताओंके इतना कहते ही भगवान् शंकर उस स्थानपर आये, जहाँ दैत्य युद्धके लिये खड़े थे। वहाँ दैत्योंका शंकरजीके साथ घमासान युद्ध छिड़ गया। दैत्य इधर-उधर
- मातृतीर्थ, अविघ्नतीर्थ और शेषतीर्थकी महिमा * १९९
भागने लगे। युद्ध करते समय शंकरजीके ललाटसे पसीनेकी बूँदें गिरने लगीं। वे बूँदें जहाँ-जहाँ गिरीं, वहाँ-वहाँ शिवके आकारकी ही माताएँ प्रकट हो गयीं। वे भगवान् महेश्वरसे बोलीं— 'आप आज्ञा दें तो हम सब असुरोंको खा जायँ।' तब देवताओंसे घिरे हुए भगवान्ने कहा—'शत्रु जहाँ-जहाँ जायँ, सर्वत्र उनका पीछा करो। इस समय वे मेरे डरसे रसातलमें जा पहुँचे हैं। तुम भी रसातलतक उनके पीछे-पीछे जाओ।' यह आज्ञा पाकर सब माताएँ पृथ्वी छेदकर रसातलमें गयीं और अत्यन्त भयंकर दैत्यों तथा दानवोंका संहार करके फिर उसी मार्गसे देवताओंके पास लौट आयीं। माताओंके जानेसे लौटनेतक देवता गौतमीके तटपर खड़े रहे। लौटनेपर देवताओंने माताओंको वर दिया—'संसारमें जिस प्रकार शिवकी पूजा होती है, उसी प्रकार माताओंकी भी हो।' यों कहकर देवता अन्तर्धान हो गये और माताएँ वहीं रह गयीं। जहाँ-जहाँ वे देवियाँ स्थित हुईं, वह सब स्थान मातृतीर्थ माना जाता है। वे सभी तीर्थ देवताओंके लिये भी सेव्य हैं, फिर मनुष्य आदिके लिये तो बात ही क्या है। शिवजीके कथनानुसार उन तीर्थोंमें किया हुआ स्नान, दान और तर्पण—सब अक्षय होता है। जो मनुष्य मातृतीर्थोंके इस उपाख्यानको प्रतिदिन सुनता, स्मरण रखता और पढ़ता है, वह दीर्घायु और सुखी होता है।
मातृतीर्थके अनन्तर अविघ्नतीर्थ है, जो सब विघ्नोंका नाश करनेवाला है। नारद! वहाँका वृत्तान्त भी बतलाता हूँ, भक्तिपूर्वक सुनो। "एक बार गौतमीके उत्तर-तटपर देवताओंका यज्ञ आरम्भ हुआ, किन्तु विघ्न-दोषके कारण उसकी समाप्ति नहीं हुई। तब सब देवताओंने मुझसे और भगवान् विष्णुसे इसका कारण पूछा। उस समय मैंने ध्यानस्थ होकर कारणका पता लगाया और कहा—'इसमें गणेशजी विघ्न डाल रहे हैं। इसीलिये इस यज्ञकी समाप्ति नहीं हो पाती। अतः सब लोग आदिदेव विनायककी स्तुति करें।' मेरा आदेश पाकर सब देवता गौतमीमें स्नान करके आदिदेव गणेशकी भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे।
देवता बोले—सदा सब कार्योंमें सम्पूर्ण देवता तथा शिव, विष्णु और ब्रह्माजी भी जिनका पूजन, नमस्कार और चिन्तन करते हैं, उन विघ्नराज गणेशकी हम शरण लेते हैं। विघ्नराज गणेशके समान मनोवाञ्छित फल देनेवाला कोई देवता नहीं है, ऐसा निश्चय करके त्रिपुरारि महादेवजीने भी त्रिपुरवधके समय पहले उनका पूजन किया था। जिनका ध्यान करनेसे सम्पूर्ण देहधारियोंके मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, वे अम्बिकानन्दन गणेश इस महायज्ञमें शीघ्र ही हमारे विघ्नोंका निवारण करें। 'देवी पार्वतीके चिन्तनमात्रसे ही गणेशजी-जैसा पुत्र उत्पन्न हो गया। इससे सम्पूर्ण जगत्में महान् उत्सव छा गया है।' यह बात उन देवताओंने अपने मुखसे कही थी, जो नवजात शिशुके रूपमें गणेशजीको नमस्कार करके कृतार्थ हुए थे। माताकी गोदमें बैठे हुए और माताके मना करनेपर भी उन्होंने पिताके ललाटमें स्थित चन्द्रमाको बलपूर्वक पकड़कर उनकी जटाओंमें छिपा दिया, यह गणेशजीका बालविनोद था। यद्यपि वे पूर्ण तृप्त थे तो भी अधिक देरतक माताके स्तनोंका दूध इसलिये पीते रहे कि कहीं बड़े भैया कार्तिकेय भी आकर न पीने लगें। उनकी बुद्धिमें बालस्वभाववश भाईके प्रति ईर्ष्या भर गयी थी। यह देखकर भगवान् शंकरने विनोदवश कहा—'विघ्नराज! तुम बहुत दूध पीते हो, इसलिये लम्बोदर हो जाओ।' यों
७३- गणेशजीका देवताओंको आश्वासन
२०० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
कहकर उन्होंने उनका नाम 'लम्बोदर' रख दिया। देवसमुदायसे घिरे हुए महेश्वरने कहा—'बेटा! तुम्हारा नृत्य होना चाहिये।' यह सुनकर उन्होंने अपने घूँघुरकी आवाजसे ही शंकरजीको संतुष्ट कर दिया। इससे प्रसन्न होकर शिवने अपने पुत्रको गणेशके पदपर अभिषिक्त कर दिया। जो एक हाथमें विघ्नपाश और दूसरे हाथसे कंधेपर कुठार लिये रहते हैं तथा पूजा न पानेपर अपनी माताके कार्यमें भी विघ्न डाल देते हैं, उन विघ्नराजके समान दूसरा कौन है। जो धर्म, अर्थ और काम आदिमें सबसे पहले पूजनीय हैं तथा देवता और असुर भी प्रतिदिन जिनकी पूजा करते हैं, जिनके पूजनका फल कभी नष्ट नहीं होता, उन प्रथम-पूजनीय गणेशको हम पहले मस्तक नवाते हैं। जिनकी पूजासे सबको प्रार्थनाके अनुरूप सब प्रकारके फलकी सिद्धि दृष्टिगोचर होती है, जिन्हें अपने स्वतन्त्र सामर्थ्यपर अत्यन्त गर्व है, उन बन्धुप्रिय मूषकवाहन गणेशजीकी हम स्तुति करते हैं। जिन्होंने अपने सरस संगीत, नृत्य, समस्त मनोरथोंकी सिद्धि तथा विनोदके द्वारा माता पार्वतीको पूर्ण संतुष्ट किया है, उन अत्यन्त संतुष्ट हृदयवाले श्रीगणेशकी हम शरण लेते हैं।
इस प्रकार देवताओंके स्तवन करनेपर गणेशजीने उनसे कहा—'देवताओ! अब तुम्हारे यज्ञमें विघ्न नहीं पड़ेगा।' जब देवयज्ञ निर्विघ्न पूरा हो गया तब गणेशजीने उन देवताओंसे कहा—'जो लोग इस स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करेंगे, उन्हें कभी दरिद्रता और दुःखका सामना नहीं करना पड़ेगा। जो इस तीर्थमें आलस्य छोड़कर भक्तिपूर्वक स्नान और दान करेंगे, उनके शुभ कार्य निर्विघ्न सिद्ध होंगे। इस बातका आपलोग भी अनुमोदन करें।' उनके इतना कहनेके साथ ही देवताओंने एक स्वरसे कहा—'ऐसा ही होगा।' यज्ञ समाप्त होनेपर देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। तबसे वह तीर्थ 'अविघ्न तीर्थ' कहलाने लगा। वह मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा सम्पूर्ण विघ्नोंको मिटानेवाला है।
अविघ्नतीर्थके बाद शेषतीर्थ है, वह भी समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। मैं उसके स्वरूपका वर्णन करता हूँ। रसातलके स्वामी महानाग शेष सम्पूर्ण नागोंके साथ रसातलमें रहनेके लिये गये। परंतु राक्षसों, दैत्यों और दानवोंने, जिनका रसातलमें पहलेसे ही प्रवेश हो चुका था, नागराजको वहाँसे निकाल दिया। तब वे मेरे पास आकर बोले—'भगवन्! आपने राक्षसोंको तथा हमलोगोंको भी रसातल दे रखा है, किंतु दैत्य और राक्षस हमें वहाँ स्थान नहीं देना चाहते; इसलिये आपकी शरणमें आया हूँ।' तब मैंने नागसे कहा—'तुम गौतमीके तटपर जाओ, वहाँ महादेवजीकी स्तुति करनेसे तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। उनके सिवा दूसरा कोई तीनों
५२- अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ, धान्यतीर्थ और विदर्भा-संगम तथा रेवती-संगम-तीर्थकी महिमा
- अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ और धान्यतीर्थकी महिमा * २०१
लोकोंमें ऐसा नहीं है, जो सबके मनोरथ सिद्ध कर सके। मेरे कहनेसे शेषनाग वहाँ गये और गङ्गामें स्नान करके हाथ जोड़कर देवेश्वर महादेवकी स्तुति करने लगे—‘तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शंकरको नमस्कार है। जो दक्षयज्ञके विध्वंसक, जगत्के आदि विधाता तथा त्रिभुवनरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके सहस्रों मस्तक हैं, उन भगवान् सदाशिवको नमस्कार है। सबका संहार करनेवाले रुद्रदेवको नमस्कार है। भगवन्! आप सोम, सूर्य, अग्नि और जलरूप हैं; आपको नमस्कार है। जो सर्वदा सर्वस्वरूप और कालरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। सर्वेश्वर शंकर! मेरी रक्षा कीजिये। सर्वव्यापी सोमेश्वर ! मेरी रक्षा कीजिये। जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है। मेरा मनोरथ पूर्ण कीजिये।'
इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर महेश्वरने नागराजको मनोवाञ्छित वर दिया, जो देवताओंसे शत्रुता रखनेवाले दैत्य, दानव तथा राक्षसोंके विनाशमें सहायक था। भगवान्ने शेषनागको शूल देकर कहा—'इससे अपने शत्रुओंका संहार करो।' भगवान् शिवकी यह आज्ञा पाकर शेषनाग सर्पोंके साथ रसातलमें गये। वहाँ उन्होंने शूलसे अपने शत्रु दैत्य, दानव तथा राक्षसोंका वध किया और फिर भगवान् शेषेश्वरका दर्शन करनेके लिये वे गौतमी-तटपर लौट आये। नागराज जिस मार्गसे आये थे, उसमें रसातलसे वहाँतक छेद हो गया था। उस बिलसे गौतमी गङ्गाका अत्यन्त पुण्यदायक जल पातालगङ्गामें जा मिला। इस प्रकार उन दोनोंका संगम हुआ। भगवान् शेषेश्वरके सामने एक विशाल कुण्ड बनाकर शेषनागने उसमें हवन किया। उस कुण्डमें सदा अग्निदेव स्थित रहते हैं। उसमें गङ्गाके जलका संगम होनेसे वह जल गरम हो गया। महायशस्वी शेषनाग महादेवजीकी आराधना करके पुनः अपने अभीष्ट स्थान रसातलमें चले गये। तबसे वह तीर्थ नागतीर्थ एवं शेषतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला, पवित्र तथा रोग और दरिद्रताका नाशक है। उससे आयु एवं लक्ष्मीकी भी प्राप्ति होती है। वह पवित्र तीर्थ स्नान और दानसे मोक्ष देनेवाला है। जो मनुष्य इस प्रसङ्गका भक्तिपूर्वक श्रवण, पाठ अथवा मनन करता है, उसकी सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं। जहाँ शेषेश्वरतीर्थ है और जहाँ शक्ति प्रदान करनेवाले भगवान् शिव हैं, वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर इक्कीस सौ तीर्थ हैं, जो सब प्रकारकी सम्पत्ति देनेवाले हैं।
अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ, धान्यतीर्थ और विदर्भा-संगम तथा रेवती-संगम-तीर्थकी महिमा
**ब्रह्माजी कहते हैं—**गोदावरीके उत्तर-तटपर अश्वत्थतीर्थ, पिप्पलतीर्थ और शनैश्चरतीर्थ हैं। उनका फल सुनो। पूर्वकालकी बात है—देवताओंने महर्षि अगस्त्यसे अनुरोध किया था कि आप विन्ध्यपर्वतको आदेश देकर ऊपर उठनेसे रोकें। महर्षि अगस्त्य धीरे-धीरे सहस्रों मुनियोंके साथ विन्ध्यपर्वतके समीप गये। उन्होंने देखा नगश्रेष्ठ विन्ध्य असंख्य वृक्षोंसे व्यास, सैकड़ों शिखरोंसे घिरा हुआ और बहुत ही ऊँचा है। ऊँचाईमें वह मेरुगिरि और सूर्यसे टक्कर ले रहा है। मुनिके आनेपर विन्ध्यपर्वतने उनका आतिथ्य-सत्कार किया। मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने सब ब्राह्मणोंके साथ
२०२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
विन्ध्यगिरिकी प्रशंसा की और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये इस प्रकार कहा—'पर्वतश्रेष्ठ! मैं तत्त्वदर्शी मुनियोंके साथ तीर्थयात्राके उद्देश्यसे दक्षिण दिशाकी यात्रा करना चाहता हूँ, तुम मुझे जानेका मार्ग दो। मैं तुमसे आतिथ्यमें यही माँगता हूँ—जबतक लौट न आऊँ, तबतक तुम नीचे होकर ही रहना। इसके विपरीत न करना।' विन्ध्यपर्वतने कहा—'बहुत अच्छा। ऐसा ही करूँगा।' महर्षि अगस्त्य उन मुनियोंके साथ दक्षिण दिशामें चले गये। वे धीरे-धीरे गौतमीके तटपर पहुँचकर सांवत्सरिक यज्ञमें दीक्षित हो गये। उन्होंने ऋषियोंके साथ एक वर्षतकके लिये यज्ञ आरम्भ कर दिया।
उन दिनों कैटभके दो पापी पुत्र राक्षस धर्मके कण्टक हो रहे थे। उनका नाम था—अश्वत्थ और पिप्पल। वे देवलोकमें भी प्रसिद्ध थे। ब्राह्मणोंको पीड़ा देना उनका नित्यका काम था। ब्राह्मणोंका कष्ट देख महर्षिगण गोदावरीके दक्षिणतटपर नियमपूर्वक तपस्या करनेवाले सूर्यपुत्र शनैश्चरके पास गये और उनसे उन राक्षसोंके सब अत्याचार कह सुनाये। यह सुनकर शनैश्चर ब्राह्मणके वेशमें रहनेवाले अश्वत्थ नामक राक्षसके पास गये और स्वयं भी ब्राह्मण बनकर उन्होंने उसकी परिक्रमा की। उन्हें परिक्रमा करते देख राक्षसने ब्राह्मण ही समझा और प्रतिदिनकी भाँति माया करके उस पापी राक्षसने उनको भी अपना ग्रास बना लिया। उसके शरीरमें प्रवेश करके शनिने उसकी आँतोंको देखा। शनिकी दृष्टि पड़ते ही वह पापात्मा राक्षस वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति क्षणभरमें जलकर भस्म हो गया। अश्वत्थको भस्म करके वे ब्राह्मणरूपधारी शनि दूसरे राक्षसके पास गये। वहाँ उन्होंने अपनेको वेदाध्ययन करनेवाले ब्राह्मणके रूपमें उपस्थित किया, मानो वे विनीत शिष्य थे और पिप्पल गुरु। पिप्पलने पहलेकी ही भाँति अन्य शिष्योंके समान शनैश्चरको भी अपना आहार बनाया, किंतु उदरमें प्रवेश करनेपर शनिने उसकी आँतोंपर दृष्टि डाली। उनके देखते ही वह भी जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार उन दोनोंको मारकर सूर्यपुत्र शनैश्चरने मुनियोंसे पूछा— 'अब मेरे लिये कौन-सा कार्य है? आपलोग बतायें।' मुनियोंको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने शनिको इच्छानुसार वर देना चाहा। शनैश्चर बोले—'जो मेरे दिनको नियमसे रहकर अश्वत्थका स्पर्श करें, उनके सब कार्य सिद्ध हो जायें और मेरे द्वारा होनेवाली पीड़ा भी उन्हें न हो। जो मनुष्य अश्वत्थतीर्थमें स्नान करें, उनके भी सब कार्य सिद्ध हो जायें। जो मानव शनिवारको प्रातःकाल उठकर अश्वत्थका स्पर्श करते हैं, उनकी समस्त ग्रहपीड़ा दूर हो जाय।' तबसे उस तीर्थको अश्वत्थतीर्थ, पिप्पलतीर्थ और शनैश्चरतीर्थ भी कहते हैं। अगस्त्य, सात्रिक, याज्ञिक और सामग आदि सोलह हजार एक सौ आठ तीर्थ वहाँ वास करते हैं। उन तीर्थोंमें किया हुआ स्नान और दान सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाला है।
इसके आगे विख्यात सोमतीर्थ है। उसमें स्नान और दान करनेसे सोमपानका फल मिलता है। ओषधियाँ पूर्वकालसे ही सम्पूर्ण जगत्की माताएँ हैं। उन्हींमें यज्ञ, स्वाध्याय और धर्मकार्य प्रतिष्ठित है। ओषधियोंसे ही समस्त रोगोंका निवारण होता है। उन्हींसे अन्नकी उत्पत्ति और सबके प्राणोंकी रक्षा होती है। एक दिन ओषधियोंने मुझसे कहा—'सुरश्रेष्ठ ! हमलोगोंको एक ऐसा पति दीजिये, जो राजा हो।' उनकी बात सुनकर मैंने कहा—'तुम सबको राजा पतिरूपमें प्राप्त होगा।' तब उन्होंने पुनः प्रश्न किया— 'इसके लिये हमें कहाँ जाना होगा?' मैंने कहा—
- अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ और धान्यतीर्थकी महिमा * २०३
'माताओ! तुम गौतमीके तटपर जाओ। गौतमीके प्रसन्न होनेपर तुम्हें लोकपूजित राजाकी प्राप्ति होगी।' यह सुनकर वे वहाँ गयीं और गौतमीकी स्तुति करने लगीं।
ओषधियाँ बोलीं—भगवान् शंकरकी प्रियतमा पुण्यसलिला गौतमी! यदि आप इस भूतलपर न आतीं तो संसारके प्राणी, जो नाना प्रकारकी पापराशियोंसे तिरस्कृत एवं दुःखी हो रहे हैं, क्या करते। नदीश्वरि! भूमण्डलके मनुष्योंके सौभाग्यका अनुमान कौन कर सकता है, जिनके महापातकोंका नाश करनेवाली आप जगन्माता गङ्गा उनके लिये सदा ही सुलभ हैं। तीनों लोकोंकी वन्दनीया जगज्जननी गङ्गा! आपके वैभवको कोई नहीं जानता; क्योंकि कामदेवके शत्रु भगवान् शंकर भी आपको सदा मस्तकपर लिये रहते हैं। मनोवाञ्छित फल देनेवाली माता! तुम्हें नमस्कार है। पापोंका विनाश करनेवाली ब्रह्ममयी देवी! तुम्हें नमस्कार है। भगवान् विष्णुके चरणकमलोंसे निकली हुई गङ्गा! तुम्हें नमस्कार है। भगवान् शंकरकी जटासे प्रकट हुई गौतमी देवी! तुम्हें नमस्कार है।
इस प्रकार स्तुति करनेवाली ओषधियोंसे गङ्गाजीने कहा—'देवियो! बताओ, तुम्हें क्या दूँ?' ओषधियाँ बोलीं—'जगन्माता ! हमें अत्यन्त तेजस्वी राजाको पतिरूपमें दीजिये।' गङ्गाजीने कहा—'माता ओषधियो ! मैं अमृतरूप हूँ। तुम भी अमृतस्वरूपा हो। अतः तुम्हें तुम्हारे योग्य ही अमृतात्मा सोमको पतिरूपमें देती हूँ।' गौतमीके इस वरदानका देवताओं, ऋषियों, चन्द्रमा तथा ओषधियोंने भी अनुमोदन किया। इसके बाद वे सब अपने-अपने स्थानको चली गयीं। जिस स्थानपर ओषधियोंने समस्त पाप-संतापका निवारण करनेवाले अमृतस्वरूप राजा सोमको पतिरूपमें प्राप्त किया, वह सोमतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँ स्नान और दान करनेसे पितर स्वर्गमें जाते हैं। जो प्रतिदिन इस प्रसङ्गको पढ़ता, सुनता अथवा भक्तिपूर्वक स्मरण करता है, वह दीर्घायु, पुत्रवान् और धनवान् होता है।
तदनन्तर धान्यतीर्थ है, जो मनुष्योंकी सब अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। वह सुकाल उपस्थित करनेवाला, कल्याणप्रद तथा मनुष्योंको सब प्रकारकी आपत्तिसे मुक्त करनेवाला है। राजा सोमको पतिरूपमें पाकर ओषधियाँ बहुत प्रसन्न हुई थीं। उन्होंने सब लोगों तथा गङ्गाजीके सामने यह अभीष्ट वचन कहा—'वेदमें एक पवित्र गाथा है, जिसे वेदोंके विद्वान् जानते हैं। जिस भूमिमें फसल उगी हुई है, वह माताके समान किंवा साक्षात् माता ही है। जो गङ्गाजीके समीप उसका दान करता है, वह समस्त अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। जो मानव खेती लगी हुई भूमि, गौ तथा ओषधियोंको ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवरूप ब्राह्मणके लिये भक्तिपूर्वक दान देता है, उसका किया हुआ सब दान अक्षय होता है तथा वह अपने सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्राप्त कर लेता है। ओषधियाँ सोम राजाकी प्रिया हैं और सोम भी ओषधियोंके पति हैं—यह जानकर जो ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको ओषधि (अन्न) दान करता है, वह सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको पाता और ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। ओषधियाँ राजा सोमसे बातचीत करती हुई कहती हैं—'राजन् ! हम ब्रह्मरूपिणी और प्राणरूपिणी हैं। जो हमें ब्राह्मणोंको दान करे, उसे तुम पार लगाओ। स्थावर-जङ्गमस्वरूप जितना भी जगत् है, वह सब हमलोगोंसे व्याप्त है। हव्य, कव्य, अमृत तथा जो कुछ भी भोजनके काम आता है, वह हमारा ही श्रेष्ठ अंश है—यह जानकर जो अन्नका दान करता है, राजन्! उसे पार लगाओ। राजा सोम!
७४- कठका भरद्वाजके पास विद्याध्ययनके लिये आगमन
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जो भक्तिपूर्वक इस वैदिकी गाथाका श्रवण, स्मरण अथवा पाठ करे, उसे तुम पार लगाओ।'
गङ्गाके किनारे जिस स्थानपर राजा सोमके साथ ओषधियोंने इस वैदिकी गाथाका पाठ किया था, वह धान्यतीर्थ कहलाता है। उस दिनसे उसके कई नाम हो गये—औषध्यतीर्थ, सौम्यतीर्थ, अमृततीर्थ, वेदगाथातीर्थ और मातृतीर्थ। जो मनुष्य इन तीर्थोंमें स्नान, जप, होम, दान, पितृ-तर्पण और अन्न-दान करता है, उसका वह सब कर्म अक्षय फल देनेवाला होता है। वहाँ दोनों तटोंपर एक हजार छः सौ तीर्थ हैं, जो सब पापोंका नाश करनेवाले और सब प्रकारकी सम्पत्ति बढ़ानेवाले हैं।
वहाँ विदर्भा-संगम और रेवती-संगमतीर्थ भी हैं। अब उनका वृत्तान्त बतलाऊँगा। पुराणवेत्ता पुरुष उसे जानते हैं। महर्षि भरद्वाज एक बड़े तपस्वी महात्मा थे। उनकी बहिनका नाम रेवती था। वह कुरूपा थी। उसका स्वर बड़ा विकृत था। प्रतापी भरद्वाज गङ्गाजीके दक्षिण-तटपर बैठकर बड़ी चिन्ता करने लगे कि 'इस भयंकर आकारवाली अपनी बहिनका विवाह किसके साथ करूँ ? कोई भी तो इसे ग्रहण नहीं करता। अहो, किसीके कन्या न हो। कन्या केवल दुःख देनेवाली होती है। जिसके कन्या हो, उस प्राणीकी जीते-जी पग-पगपर मृत्यु होती रहती है।' इस प्रकार वे अपने सुन्दर आश्रमपर तरह-तरहके विचार कर रहे थे। इतनेमें ही कठनामके एक मुनि वहाँ भरद्वाज मुनिका दर्शन करनेके लिये आये। उनकी अवस्था सोलह वर्षकी थी। शरीर सुन्दर था। वे शान्त, जितेन्द्रिय और सद्गुणोंकी खान थे। कठने आते ही भरद्वाजको प्रणाम किया। भरद्वाजने उनका विधिपूर्वक पूजन किया और आश्रमपर पधारनेका कारण पूछा।
कठने कहा—'मैं विद्यार्थी हूँ और इसी उद्देश्यसे आपका दर्शन करने आया हूँ। जो उचित हो, वह कीजिये।' भरद्वाजने कठसे कहा—'महामते ! तुम्हारी जो इच्छा हो, पढ़ो। मैं पुराण, स्मृति, वेद तथा अनेक प्रकारके धर्मशास्त्र—सब जानता हूँ। तुम शीघ्र अपनी रुचि बतलाओ। कुलीन, धर्मपरायण, गुरु-सेवक तथा सुनी हुई विद्याको तत्काल धारण करनेवाला शिष्य बड़े पुण्यसे प्राप्त होता है।'
कठने कहा—ब्रह्मन् ! मैं निष्पाप, सेवापरायण, भक्त, कुलीन और सत्यवादी शिष्य हूँ। मुझे अध्ययन कराइये।
'एवमस्तु' कहकर भरद्वाजने कठको सम्पूर्ण विद्या पढ़ायी। विद्या पाकर कठ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने भरद्वाजसे कहा—'गुरुदेव ! आपको नमस्कार है। मैं आपके मनके अनुकूल दक्षिणा देना चाहता हूँ। आप कोई दुर्लभ वस्तु भी माँग सकते हैं। बताइये, क्या दूँ? जो शिष्य अपने गुरुसे विद्या प्राप्त करके भी उन्हें मोहवश दक्षिणा नहीं देते,
५३- पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा, धन्वन्तरि और इन्द्रपर भगवान्की कृपा
- पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा *
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वे जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता रहती है तबतक नरकमें पड़े रहते हैं।'
भरद्वाजने कहा—यह मेरी बहिन अभी कुमारी है; इसको विधिपूर्वक ग्रहण करो और पत्नी बनाओ। इसके प्रति प्रेमपूर्ण बर्ताव करना, यही मैं दक्षिणा माँगता हूँ।
कठने 'बहुत अच्छा' कहकर गुरुके आदेशसे विधिपूर्वक दी हुई रेवतीका पाणिग्रहण किया और उसके सुन्दर रूपकी प्राप्तिके लिये वहीं रहकर देवेश्वर शङ्करकी आराधना की। रेवतीने भी शिवकी प्रसन्नताके लिये उनका पूजन किया। इससे वह सुन्दर रूपवती हो गयी। उसका प्रत्येक अङ्ग मनोहर दिखायी देने लगा। अब उसके रूपकी कहीं समता नहीं थी। वहाँ रेवतीके स्नान करनेसे जो जलकी धारा प्रकट हुई, वह 'रेवती' नामकी नदी हुई, जो रूप और सौभाग्य प्रदान करनेवाली है। फिर कठने उसकी पुण्यरूपताकी सिद्धिके लिये नाना प्रकारके दर्भो (कुशों)-से अभिषेक किया। इससे 'विदर्भा' नामकी नदी प्रकट हुई। जो मनुष्य रेवती और गङ्गामें श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसी प्रकार जो विदर्भा और गौतमीके संगममें स्नान करता है, उसे तत्काल भोग और मोक्षकी प्राप्ति होती है। वहाँ दोनों तटोंपर सौ उत्तम तीर्थ हैं, जो सब पापोंके नाशक तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंके दाता हैं।
पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा, धन्वन्तरि और इन्द्रपर भगवान्की कृपा
**ब्रह्माजी कहते हैं—**गौतमी गङ्गाके उत्तर-तटपर पूर्णतीर्थ है। वहाँ यदि मनुष्य अनजानमें नहा ले तो भी कल्याणका भागी होता है। पूर्णतीर्थके माहात्म्यका वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ स्वयं चक्रधारी भगवान् विष्णु और पिनाकधारी भगवान् शंकर निवास करते हैं। पूर्वकालमें आयुके पुत्र धन्वन्तरि राजा थे। उन्होंने अश्वमेध आदि अनेक प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया, भाँति-भाँतिके दान दिये तथा प्रचुर भोग भोगे। फिर भोगोंकी विषमताका अनुभव करके उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ। धन्वन्तरि यह जानते थे कि पर्वतके शिखरपर, गङ्गा नदीके किनारे, समुद्रके तटपर, शिव और विष्णुके मन्दिरमें अथवा विशेषतः किसी पवित्र संगमपर किया हुआ जप, तप, होम—सब अक्षय होता है; इसलिये उन्होंने गङ्गा-सागर-संगमपर भारी तपस्या आरम्भ की।
एक बार राजा धन्वन्तरिने राज्य करते समय एक महान् असुरको रणभूमिसे मार भगाया था। उसका नाम था तम। वह एक हजार वर्षोंतक राजाके भयसे समुद्रमें छिपा रहा। जब उसे मालूम हुआ कि राजा धन्वन्तरि विरक्त होकर वनमें चले आये हैं और उनका पुत्र राज्यसिंहासनपर आसीन हुआ है, तब वह समुद्रसे निकला और उस स्थानपर आया, जहाँ महाराज धन्वन्तरि गङ्गातटका आश्रय ले जप और होममें संलग्न तथा ब्रह्मचिन्तनमें तत्पर थे। उसने सोचा—'इस बलवान् राजाने मुझे अनेक बार नष्ट करनेका प्रयत्न किया है, अतः मैं भी क्यों न अपने इस शत्रुको नष्ट कर डालूँ।' ऐसा निश्चय करके उसने मायासे एक स्त्रीका रूप बनाया और राजाके पास आया। वह मायामयी सुन्दरी तरुणी देखनेमें बड़ी मनोहर थी। उसने हँसते हुए नाचना और गाना आरम्भ किया। उस
७५- धन्वन्तरिके द्वारा भगवान् विष्णुका स्तवन
२०६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
सुन्दरीको बहुत समयतक इस अवस्थामें देख राजाने कृपापूर्वक पूछा—'कल्याणी! तुम कौन हो? किसके लिये इस गहन वनमें निवास करती हो और किसे देखकर तुम्हें इतना उल्लास-सा हो रहा है?'
**तरुणी बोली—**राजन्! आपके रहते संसारमें दूसरा कौन है, जो मेरे उल्लासका कारण हो सके। मैं इन्द्रकी लक्ष्मी हूँ। आपको सब भोगोंसे सम्पन्न देख बारंबार आपके सामने विचरती हूँ। असंख्य पुण्यके बिना मैं सभीके लिये अत्यन्त दुर्लभ हूँ।
उसकी यह बात सुनकर राजाने वह अत्यन्त कठोर तपस्या त्याग दी और मन-ही-मन उसीका चिन्तन करने लगे। उसीके आश्रय तथा उसीके आज्ञा-पालनमें रहने लगे। जब सब तरहसे वे एकमात्र उसीकी शरणमें चले गये तब उनकी भारी तपस्याका नाश करके तम अन्तर्धान हो गया। इसी बीचमें मैं राजाको वर देनेके लिये गया। वे तपोभ्रष्ट एवं विह्वल होकर मृतकके समान रो रहे थे। मैंने अनेक प्रकारकी युक्तियोंसे महाराज धन्वन्तरिको सान्त्वना दी और कहा—राजन्! तुम्हारा शत्रु तम तुम्हें तपस्यासे भ्रष्ट करके कृतकार्य होकर चला गया। तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। प्रायः सभी तरुणी स्त्रियाँ पुरुषको पहले कुछ आनन्द और पीछे भारी संताप देती हैं, फिर वह तो मायामयी थी; अतः उसका संतापप्रद होना क्या आश्चर्यकी बात है।*
तब राजा धन्वन्तरिका भ्रम दूर हुआ। वे हाथ जोड़कर बोले—'ब्रह्मन्! क्या करूँ? तपस्याके पार कैसे जाऊँ?' मैंने उत्तर दिया—'देवाधिदेव जनार्दनकी यत्नपूर्वक स्तुति करो। उससे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। भगवान् विष्णु वेदवेद्य पुरातन परमात्मा हैं। उन्होंने ही सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है। तीनों लोकोंमें उनके सिवा दूसरा कोई पुरुष ऐसा नहीं है, जो प्राणियोंके समस्त मनोरथोंकी सिद्धि कर सके।' मेरी आज्ञा मानकर राजा धन्वन्तरि गिरिराज हिमालयपर चले गये और वहाँ दोनों हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुकी स्तुति करने लगे।
**धन्वन्तरि बोले—**सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले विष्णो! आपकी जय हो। अचिन्त्य परमेश्वर! आपकी जय हो। विजयशील अच्युत! आपकी जय हो। गोपाल! आपकी जय हो। लक्ष्मीके स्वामी, जगन्मय श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। भूतपते! आपकी जय हो। नाथ! आपकी जय हो। आप शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सर्वव्यापी गोविन्द! आपकी जय हो, जय हो। आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। देव! आपकी जय हो, जय हो। आप विश्वका पालन और धारण करनेवाले
* आनन्दयन्ति प्रमदास्तापयन्ति च मानवम् ॥ सर्वा एव विशेषेण किमु मायामयी तु सा। (१२२। २३-२४)
- पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा * २०७
हैं। ईश! आपकी जय हो। आप सदसत्स्वरूप हैं। माधव! आपकी जय हो। आप धर्मनिष्ठ परमात्माको नमस्कार है। कामनाओंको पूर्ण करनेवाले और कामस्वरूप केशव! आपकी जय हो। गुणोंके सागर श्रीराम! आपकी जय हो। आप पुष्टि देनेवाले और पुष्टिके स्वामी हैं। आपकी जय हो, जय हो। कल्याणदाता! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण भूतोंके पालक! आपकी जय हो। भूतेश्वर ! आपकी जय हो। आप मौन धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। कर्मफलोंके दाता! आपकी जय हो। आप ही कर्मस्वरूप हैं। पीताम्बरधारी प्रभो! आपकी जय हो। सर्वेश्वर! आपकी जय हो। आप सर्वस्वरूप हैं। आप मङ्गलस्वरूप प्रभुको नमस्कार है। नाथ! आप सत्त्वगुणके अधिनायक हैं। आपकी जय हो, जय हो। आप सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता हैं। आपको मेरा नमस्कार है। आप ही जन्मदाता हैं और आप ही जन्म लेनेवाले प्राणियोंके भीतर निवास करते हैं। आपकी जय हो। परमात्मन्! आपको नमस्कार है। मुक्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही मुक्ति हैं। भोग प्रदान करनेवाले केशव! आपकी जय हो। लोकप्रद परमेश्वर! आपकी जय हो। पापोंका नाश करनेवाले लोकेश्वर! आपकी जय हो। भक्तवत्सल! आपकी जय हो, जय हो। चक्र धारण करनेवाले आप परमेश्वरको प्रणाम है। मानदाता! आपकी जय हो। आप ही मान हैं। विश्ववन्दित देव! आपकी जय हो। धर्मदाता! आपकी जय हो। आप धर्मस्वरूप हैं। संसारसे पार लगानेवाले परमात्मन्! आपकी जय हो। अन्नदाता! आपकी जय हो, जय हो। आप ही अन्न हैं। वाचस्पते! आपको नमस्कार है। शक्तिदाता! आपकी जय हो, आप ही शक्ति हैं। विजयका वरदान देनेवाले ईश्वर! आपकी जय
हो। यज्ञदाता! आपकी जय हो। आप ही यज्ञ हैं। आपके नेत्र पद्मपत्रकी तरह विशाल हैं। आपकी जय हो। दान देनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। आप ही दान हैं। कैटभका नाश करनेवाले नारायण! आपकी जय हो। कीर्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही कीर्ति हैं। मूर्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही मूर्ति धारण करनेवाले हैं। सौख्यदाता! आपकी जय हो। आप ही सौख्यस्वरूप हैं। पावनको भी पावन बनानेवाले परमात्मन् ! आपकी जय हो। शान्तिदाता! आपकी जय हो! आप ही शान्ति हैं। भगवान् शंकरकी भी उत्पत्तिके कारण! आपकी जय हो। ज्योतिःस्वरूप! आपकी जय हो। वामन! आपकी जय हो। वित्तेश! आपकी जय हो। धूममयी पताकावाले! आपकी जय हो। सम्पूर्ण जगत्के लिये दातारूप परमेश्वर! आपको नमस्कार है। पुण्डरीकाक्ष! आप ही त्रिलोकीमें रहनेवाले जीवसमुदायका क्लेश निवारण करनेमें दक्ष हैं। कृपानिधे! विष्णो! आप मेरे मस्तकपर अपना वरद हाथ रखिये।
समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले शङ्ख-चक्र-गदाधर भगवान् विष्णुने इस प्रकार स्तुति करनेवाले धन्वन्तरिसे वर माँगनेको कहा। तब राजाने विनीत होकर कहा—'मैं देवताओंका राजा होना चाहता हूँ।' 'तथास्तु' कहकर भगवान् वहाँसे अन्तर्धान हो गये और राजा धन्वन्तरिने क्रमशः उन्नति करते हुए देवेन्द्रपद प्राप्त किया। पूर्वजन्ममें किये हुए अनेक कर्मोंके परिणामस्वरूप इन्द्रको तीन बार अपने पदसे भ्रष्ट होना पड़ा। वृत्रासुरका वध होनेपर नहुषके द्वारा इन्द्रका पद छीना गया। इसके बाद इन्द्रने सिन्धुसेनकी हत्या कर डाली। अतः उस पापसे भी उनके पदकी हानि हुई। तीसरी बार अहल्याके साथ समागम करनेके कारण तथा अन्य कारणोंसे भी उन्हें
२०८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
पदभ्रष्ट होना पड़ा। इन्द्र उन बातोंको याद करके चिन्ताजनित संतापसे उदास रहा करते थे। तदनन्तर एक दिन उन्होंने बृहस्पतिजीसे पूछा—'वागीश्वर! क्या कारण है कि बीच-बीचमें मुझे अपने राज्यसे भ्रष्ट होना पड़ता है? इस प्रकार पदभ्रष्ट होनेकी अपेक्षा तो निर्धन हो जाना ही अच्छा है। कर्मोंकी गहन गतिको कौन ठीक-ठीक जानता है। सब पदार्थोंके रहस्यको जाननेमें आपके सिवा और कोई समर्थ नहीं है।'
तब बृहस्पतिजीने इन्द्रसे कहा—'चलकर ब्रह्माजीसे पूछो। वे ही भूत, भविष्य और वर्तमानकी बातें जानते हैं। महामते! जिस कारणसे ऐसा होता है, वह सब वे बता देंगे।' ऐसा निश्चय करके वे दोनों मेरे पास आये और मुझे नमस्कार करके हाथ जोड़कर बोले—'भगवन्! किस दोषसे शचीपति इन्द्र अपने राज्यसे भ्रष्ट होते हैं? नाथ! इस संदेहका निवारण कीजिये।'
उनका यह प्रश्न सुनकर मैंने बहुत देरतक विचार किया। तत्पश्चात् बृहस्पतिसे कहा—'ब्रह्मन्! खण्डधर्म नामक दोषके कारण इन्द्रको राज्यपदसे च्युत होना पड़ता है। देश-काल आदिके दोषसे, श्रद्धा और मन्त्रका अभाव होनेसे, यथावत् दक्षिणा न देनेसे, असत् वस्तुका दान करनेसे और विशेषतः देवता तथा ब्राह्मणोंकी अवहेलनाके पातकसे जो देहधारियोंका अपना धर्म खण्डित हो जाता है, उससे अत्यधिक मानसिक संतापका सामना करना पड़ता है तथा पदकी हानि भी अनिवार्य हो जाती है। क्षोभपूर्ण चित्तसे किया हुआ धर्म भी अनिष्टका ही कारण होता है। उससे कार्यकी सिद्धि नहीं होती। अपना धर्म पूर्ण न होनेपर कौन-सा अनिष्ट नहीं होता।' यों कहकर मैंने उनके पूर्वजन्मका वृत्तान्त भी बतलाया। 'पूर्वजन्ममें इन्द्र राजा आयुके पुत्र धन्वन्तरि थे। उनकी तपस्यामें तम नामक राक्षसने विघ्न डाल दिया, फिर भगवान् विष्णुने उस विघ्नका निवारण किया। इस तरह इनके पूर्वजन्मोंमें ऐसे वृत्तान्त अनेक हो सकते हैं। उन्हींके फलसे इन्हें कभी-कभी अपने राज्यसे वञ्चित रहना पड़ता है।'
मेरी बात सुनकर इन्द्र और बृहस्पति दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने फिर मुझसे ही पूछा—'सुरश्रेष्ठ! खण्डधर्मत्व दोषका निवारण कैसे होगा?' तब मैंने पुनः सोचकर कहा—'सुनो; एक उपाय बताता हूँ, जो समस्त दोषोंका हारक, समस्त सिद्धियोंका कारक और दुःखमय संसार-सागरसे समस्त प्राणियोंका तारक है। जिनके चित्तमें संताप रहता है, उनको इसी उपायकी शरण लेनी चाहिये। यह समस्त जीवोंको शान्ति प्रदान करनेवाला है। वह उपाय है—गौतमी देवीके तटपर जाकर भगवान् विष्णु और शिवकी स्तुति करना।' यह सुनकर वे उसी समय गौतमीके तटपर गये और स्नान करके बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान् विष्णु और शिवकी स्तुति करने लगे। इन्द्रने श्रीविष्णुकी स्तुति की और बृहस्पतीने श्रीशिवकी।
इन्द्र बोले—मत्स्य, कूर्म और वाराहरूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको बारंबार नमस्कार है। नरसिंहदेव तथा वामनको भी नमस्कार है। हयग्रीवरूपधारी भगवान्को नमस्कार है। त्रिविक्रम! आपको नमस्कार है। श्रीराम, बुद्ध और कल्किरूप भगवान्को नमस्कार है। परमेश्वर! आप अनन्त एवं अच्युत हैं। आपको नमस्कार है। परशुरामरूपधारी! आपको नमस्कार है। मैं इन्द्र, वरुण और यम आपके ही स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। त्रिलोकीरूपधारी देवता परमेश्वरको नमस्कार है। भगवन्! आप अपने मुखमें सरस्वतीको धारण करते हैं और सर्वज्ञ हैं। आप लक्ष्मीवान्
७६- इन्द्रको शिव और विष्णुका वरदान
- पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा * २०९
हैं। अतएव लक्ष्मीको वक्षःस्थलपर धारण करते हैं। पाप-ताप आपको छू भी नहीं सकते। आपकी बाँहें, जङ्घा तथा चरण अनेक हैं। कान, नेत्र तथा मस्तक भी बहुत हैं। आप ही वास्तवमें सुखी हैं। आपको पाकर बहुत-से जीव सुखी हो गये। हरे! आप करुणाके सागर हैं। मनुष्योंको तभीतक निर्धनता, मलिनता और दीनताका सामना करना पड़ता है, जबतक वे आपकी शरणमें नहीं जाते।
बृहस्पति बोले— ईश! आप परम सूक्ष्म, ज्योतिर्मय, अनन्त, ओंकारमात्रसे अभिव्यक्त होनेवाले, प्रकृतिसे परे, चित्स्वरूप, आनन्दमय और पूर्णरूप हैं। मुमुक्षु पुरुष आपका स्वरूप ऐसा ही बतलाते हैं। भगवन्! जिनके हृदयमें एक भी कामना नहीं है अथवा जो सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर चुके हैं, वे भी पञ्चमहायज्ञोंद्वारा आपकी आराधना करते हैं और उसके फलस्वरूप आपके दिव्य धाम अथवा दिव्य स्वरूपमें, जो संसार-सागरसे परे है, प्रवेश कर जाते हैं। शम्भो! वे निष्काम अथवा आसकाम पुरुष समत्वबुद्धिके द्वारा सब प्राणियोंमें आपका दर्शन करके क्षुधा-पिपासा, शोक-मोह और जरा-मृत्युरूप छः ऊर्मियोंके प्राप्त होनेपर शान्तभावसे रहते, ज्ञानके द्वारा कर्मफलोंको त्याग देते और ध्यानके द्वारा आपमें प्रवेश कर जाते हैं। मुझमें न जातिके धर्म हैं न वेद-शास्त्रका ज्ञान है। न ध्यानका अभ्यास है और न मैं समाधि ही लगाता हूँ। केवल शान्तचित्त भगवान् शिवको, जो रुद्र, शिव और सोम आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं, भक्तिके साथ प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आपके चरणोंमें भक्ति रखनेसे मूर्ख मनुष्य भी आपके मोक्षमय स्वरूपको प्राप्त कर लेता है। ज्ञान, यज्ञ, तप, ध्यान तथा बड़े-बड़े फल देनेवाले होम आदि कर्मोंका सर्वोत्तम फल यही है कि भगवान् सोमनाथमें निरन्तर भक्ति बनी रहे। जगदाधार शिव ! सब जीवोंके लिये सदा देखे और सुने हुए प्रिय फलकी, स्वर्गकी तथा मोक्षकी प्राप्तिके लिये आपकी यह भक्ति ही सीढ़ी है। धीर पुरुष आपके चरणोंकी प्राप्तिरूपी फलके लिये दूसरी किसी सीढ़ीको नहीं बतलाते। दयालो! इसलिये आपके प्रति मेरी भक्ति बनी रहे। आपके श्रीविग्रहकी सेवाका सौभाग्य प्राप्त होता रहे। दूसरा कोई उपाय नहीं है। ईश्वर! यद्यपि हमलोग पापी हैं, तथापि आप अपनी महिमाकी ओर देखकर हमपर कृपा कीजिये। आप स्थूल, सूक्ष्म, अनादि, नित्य, पिता, माता, असत् और सत्स्वरूप हैं—श्रुतियों और पुराणोंने इस प्रकार जिनका स्तवन किया है, उन परमेश्वर सोमनाथको मैं प्रणाम करता हूँ।
इन दोनोंकी स्तुतियोंसे भगवान् विष्णु और शिव बहुत प्रसन्न हुए और बोले—‘तुम दोनों अत्यन्त दुर्लभ अभीष्ट वर माँगो।’ तब इन्द्रने कहा—‘भगवन्! मेरा राज्य बार-बार अधिकारमें आता और छिन जाता है। जिस पापके कारण
५४- श्रीरामतीर्थकी महिमा
२१० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
ऐसा होता है, वह पाप नष्ट हो जाय। यदि आप दोनों देवेश्वर अत्यन्त प्रसन्न हों तो मेरा सब कुछ सदा स्थिर रहे।' यह सुनकर भगवान् शिव और विष्णुने मुसकराते हुए इन्द्रके वाक्यका अनुमोदन किया और इस प्रकार कहा—'यह गोदावरी नदी ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाला महान् तीर्थ है। यहाँ सबके मनोरथ पूर्ण होते हैं। तुम दोनों यहाँ श्रद्धापूर्वक स्नान करो। इन्द्रके मङ्गलके लिये तथा इनके वैभवकी स्थिरताके लिये बृहस्पति हम दोनोंका स्मरण करते हुए इन्द्रका अभिषेक करें तथा उस समय निम्नाङ्कित मन्त्र भी पढ़ें—
इह जन्मनि पूर्वस्मिन् यत्किंचित् सुकृतं कृतम्।
तत् सर्वं पूर्णतामेतु गोदावरि नमोऽस्तु ते॥
(१२२। ९१)
'गोदावरि ! मैंने इस जन्ममें अथवा पूर्वजन्ममें जो कुछ भी पुण्यकर्म किया हो, वह सब पूर्णताको प्राप्त हो। आपको नमस्कार है।'
जो इस प्रकार स्मरण करके गौतमी गङ्गामें स्नान करता है, उसका धर्म हम दोनोंकी कृपासे परिपूर्ण होता है तथा वह साधक अपने पूर्वजन्मके दोषसे भी मुक्त होकर पुण्यवान् हो जाता है।'
इन्द्र और बृहस्पतिने 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान्की आज्ञा स्वीकार की और दोनों प्रसन्न होकर उस कार्यमें लग गये। देवगुरुने इन्द्रका महाभिषेक किया। उससे एक नदी प्रकट हुई, जो पुण्या और मङ्गला कहलायी। उस नदीके साथ जो गङ्गाजीका संगम हुआ, वह बड़ा ही पवित्र एवं कल्याणकारक है। इन्द्रकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर जगन्मय भगवान् विष्णु प्रत्यक्ष प्रकट हुए और उनसे इन्द्रने त्रिलोकीका राज्य प्राप्त किया। अतः ('इन्द्रं गामविन्दयत्'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार) भगवान् वहाँ गोविन्दके नामसे विख्यात हुए, क्योंकि इन्द्रने उनसे त्रिलोकमयी गौ प्राप्त की थी। देवगुरु बृहस्पतिने जहाँ इन्द्रके राज्यकी स्थिरताके लिये महादेवजीका स्तवन किया, वहाँ वे सिद्धेश्वर नामसे निवास करते हैं। सिद्धेश्वर नामक शिवलिङ्गकी सम्पूर्ण देवता भी पूजा करते हैं। तबसे वह तीर्थ गोविन्दतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वहीं मङ्गला-संगम, पूर्णतीर्थ, इन्द्रतीर्थ और बार्हस्पत्यतीर्थ भी हैं। उन तीर्थोंमें जो स्नान, दान अथवा किंचिन्मात्र भी पुण्यका उपार्जन किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। वहाँका श्राद्ध पितरोंको अत्यन्त प्रिय है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस तीर्थके माहात्म्यको सुनता, पढ़ता और स्मरण करता है, उसे खोये हुए राज्यकी प्राप्ति होती है। नारद! वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर सैंतीस हजार तीर्थ रहते हैं, जो सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले हैं।
श्रीरामतीर्थकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं— नारद! रामतीर्थ भ्रूणहत्याका नाश करनेवाला है। उसकी महिमाके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इक्ष्वाकुवंशमें दशरथ नामके क्षत्रिय राजा हुए, जो सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात थे। वे इन्द्रकी ही भाँति बलवान्, बुद्धिमान् और शूरवीर थे तथा बलिकी भाँति अपने पिता-पितामहोंके राज्यका पालन करते थे। महाराज दशरथके तीन रानियाँ थीं—कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी। वे तीनों कुलीन, सौभाग्यशालिनी, रूपवती और सुलक्षणा थीं। राजा दशरथ जब अयोध्याके राजसिंहासनपर आसीन थे और ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजी उनके
- श्रीरामतीर्थकी महिमा * २११
पुरोहितके पदपर प्रतिष्ठित थे, उस समय देशमें न रोग थे न मानसिक चिन्ताएँ। न तो अनावृष्टि होती थी और न अकाल ही पड़ता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रोंको और चारों आश्रमोंको भी पृथक्-पृथक् बड़ा सुख मिलता था। एक समयकी बात है, देवताओं और दानवोंमें राज्यके लिये युद्ध छिड़ गया। न तो उसमें देवताओंकी जीत होती थी और न दैत्यों एवं दानवोंकी ही। वह युद्ध कई दिनोंतक लगातार चलता रहा। इसी बीचमें आकाशवाणी हुई—‘राजा दशरथ जिनका पक्ष ग्रहण करेंगे, वे ही विजयी होंगे, दूसरे नहीं।’ यह सुनकर देवता और दानव दोनों अपनी विजयके लिये राजाके पास चले। देवताओंकी ओरसे वायु शीघ्र जा पहुँचे और राजासे बोले—‘महाराज! देव-दानव-संग्राममें आपको चलना चाहिये। वहाँ यह आकाशवाणी सुनायी दी है कि जिस ओर राजा दशरथ रहेंगे, उसी पक्षकी जीत होगी; अतः आप देवताओंका पक्ष ग्रहण कीजिये, जिससे देवता विजयी हों।’
वायुकी यह बात सुनकर राजा दशरथने कहा—‘वायुदेव! आप सुखपूर्वक पधारें। मैं अवश्य चलूँगा।’ वायुके चले जानेपर दैत्यगण राजाके पास आये और बोले—‘भगवन्! हमारी सहायता कीजिये। महाराज ! विजय आपपर ही अवलम्बित है, अतः आप दैत्यराजकी सहायता करें।’ राजा बोले—‘वायुदेवने पहले मुझसे प्रार्थना की है और मैंने देवताओंकी सहायता करनेका वचन दे दिया है; अतः दैत्य और दानव लौट जायें।’ राजा दशरथने वैसा ही किया। स्वर्गमें पहुँचकर उन्होंने दैत्यों, दानवों तथा राक्षसोंके साथ लोहा लिया। उस समय नमुचिके भाइयोंने देवताओंके देखते-देखते तीखे बाण मारकर राजाके रथकी धुरी तोड़ डाली। राजा बड़े वेगसे युद्धमें लगे थे। उन्हें धुरी टूटनेका पता न लगा। नारद! उस युद्धमें रानी कैकेयी भी राजाके पास ही बैठी थी। उसे रथकी अवस्थाका पता लग गया, परंतु उसने राजाको इस बातकी सूचना नहीं दी। धुरी टूटी देख उसने उसकी जगह अपना हाथ ही लगा दिया। यह बड़ा अद्भुत कार्य था। रथियोंमें श्रेष्ठ महाराज दशरथने कैकेयीके हाथसे थामें हुए रथके द्वारा दैत्यों और दानवोंपर विजय पायी, फिर देवताओंसे अनेक वर पाकर उनकी अनुमति ले वे पुनः अयोध्या लौट आये। आते समय मार्गके बीचमें जब महाराज दशरथने अपनी प्रिया कैकेयीकी ओर दृष्टिपात किया, तब उसका वह साहसपूर्ण कार्य देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। नारद! इस कार्यसे प्रसन्न होकर राजाने कैकेयीको वर दिये। रानी कैकेयीने भी राजाकी आज्ञा स्वीकार करके इस प्रकार कहा—‘महाराज! आपके दिये हुए ये वर आपके ही पास रहें [आवश्यकता पड़नेपर ले लूँगी]।’*
राजा दशरथ पुरस्कारमें अनेक आभूषण देकर अपनी प्रिया कैकेयीके साथ अपने नगरको गये। विजयी होनेसे वे बहुत प्रसन्न थे। तदनन्तर बहुत समयके बाद मुनीश्वर ऋष्यशृङ्गकी कृपासे देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये राजा दशरथके चार देवोपम पुत्र हुए। कौसल्यासे राम, कैकेयीसे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भरत तथा सुमित्रासे लक्ष्मण और शत्रुघ्न
* स तु मध्ये महाराजो मार्गे वीक्ष्य तदा प्रियाम्। कैकेय्याः कर्म तद् दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः॥
ततस्तस्यै वरान् प्रादात्प्रींस्तु नारद सा अपि। अनुमान्य नृपोक्तं कैकेयी वाक्यमब्रवीत्॥
त्वयि तिष्ठन्तु राजेन्द्र त्वया दत्ता वरा अमी॥
(१२३।२९-३१)
२१२
- संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
हुए। वे सभी पुत्र बुद्धिमान्, प्रिय तथा राजाके आज्ञाकारी थे। एक बार महर्षि विश्वामित्र आये और उन्होंने यज्ञकी रक्षाके लिये राजासे राम और लक्ष्मणको माँगा। विश्वामित्र उनके महत्त्वको जानते थे।
राजा दशरथ बोले—मुने! इस बुढ़ापेमें किसी तरह दैवयोगसे मेरे ये बालक उत्पन्न हुए हैं, जो मेरे मनको आनन्द देनेवाले हैं। मैं अपना शरीर और यह राज्य दे दूँगा, किन्तु इन पुत्रोंको न दे सकूँगा।
उस समय वसिष्ठने राजा दशरथसे कहा—‘राजन्! रघुवंशियोंने किसीकी प्रार्थनाको ठुकराना नहीं सीखा है।’ उनके यों कहनेपर राजाने किसी तरह श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा—‘पुत्रो! तुम ब्रह्मर्षि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करो।’ यों कहकर उन्होंने अपने दोनों पुत्र विश्वामित्रजीको सौंप दिये। राम और लक्ष्मणने ‘बहुत अच्छा’ कहकर राजा दशरथको नमस्कार किया और यज्ञकी रक्षाके लिये विश्वामित्रजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक चल दिये। तब महर्षि विश्वामित्रने उन दोनों भाइयोंको माहेश्वरी महाविद्या, धनुर्वेद, शस्त्रविद्या, अस्त्रविद्या, लोकविद्या, रथविद्या, गजविद्या, अश्वविद्या, गदाविद्या तथा मन्त्रद्वारा अस्त्रोंके आवाहन और विसर्जनकी शिक्षा दी। इस प्रकार सम्पूर्ण विद्याएँ प्राप्तकर श्रीराम और लक्ष्मणने वनवासियोंका हित करनेके लिये वनमें ताड़काको मार डाला और हाथमें धनुष लेकर यज्ञकी रक्षा करने लगे। तत्पश्चात् महायज्ञ पूर्ण होनेपर मुनिवर विश्वामित्र दोनों राजकुमारोंके साथ राजा जनकसे मिलने गये। वहाँ लक्ष्मणसहित श्रीरामने राजाओंकी मण्डलीमें अपने गुरुसे सीखी हुई अद्भुत धनुर्विद्याका परिचय दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा जनकने अपनी अयोनिजा कन्या लक्ष्मीस्वरूपा सीताका श्रीरामके साथ विवाह कर दिया। इसी प्रकार लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नका विवाह भी राजा जनकके ही घर हुआ। तदनन्तर दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजा दशरथ समस्त प्रजा और गुरुकी अनुमतिसे श्रीरामको राज्य देने लगे। उस समय मन्थणारूपी दुर्देवसे प्रेरित होकर रानी कैकेयी ईर्ष्यासे व्याकुल हो उठी। उसने श्रीरामके राज्याभिषेकमें विघ्न डाला और उन्हें वनवास भेजनेके लिये कहा। साथ ही उसने वही राज्य भरतके लिये माँगा, परंतु राजाने स्वीकार नहीं किया। पिताके सत्यकी रक्षाके लिये श्रीराम स्वयं ही घोर जङ्गलमें चले गये। सीता और लक्ष्मणने भी उन्हींका साथ दिया। श्रीरामने अपने सद्गुणोंके कारण सत्पुरुषोंके शुद्ध हृदयमें घर बना लिया था। जब श्रीराम राज्यकी तृष्णासे रहित और वनवासके लिये दीक्षित हो लक्ष्मण और सीताके साथ चले गये, तब राम, लक्ष्मण और गुणशालिनी सीताका स्मरण करके महाराजको बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। इधर श्रीरामचन्द्रजी चलते-चलते चित्रकूटमें आये। वहीं उन्होंने तीन वर्ष व्यतीत किये। फिर वहाँसे दक्षिण दिशाकी ओर चलकर वे क्रमशः दण्डकारण्यमें पहुँचे, जो समस्त देशोंमें पवित्र और तीनों लोकोंमें विख्यात है। वह महान् वन दैत्योंसे सेवित होनेके कारण बड़ा भयंकर था। ऋषियोंने भयभीत होकर उसे छोड़ दिया था। श्रीरामने वहाँ दैत्यों और राक्षसोंको मारकर दण्डकवनको ऋषि-मुनियोंके रहनेयोग्य बना दिया। फिर पाँच योजन आगे जाकर वे धीरे-धीरे गौतमीके तटपर पहुँचे। भगवान् शिवकी जो पुञ्जीभूत एवं अनिर्वचनीय पराशक्ति है, वही जलस्वरूपमें प्रकट हुई गौतमी नदी है—ऐसा संत-महात्माओंका कथन है।