संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ और धान्यतीर्थकी महिमा * २०१
लोकोंमें ऐसा नहीं है, जो सबके मनोरथ सिद्ध कर सके। मेरे कहनेसे शेषनाग वहाँ गये और गङ्गामें स्नान करके हाथ जोड़कर देवेश्वर महादेवकी स्तुति करने लगे—‘तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शंकरको नमस्कार है। जो दक्षयज्ञके विध्वंसक, जगत्के आदि विधाता तथा त्रिभुवनरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके सहस्रों मस्तक हैं, उन भगवान् सदाशिवको नमस्कार है। सबका संहार करनेवाले रुद्रदेवको नमस्कार है। भगवन्! आप सोम, सूर्य, अग्नि और जलरूप हैं; आपको नमस्कार है। जो सर्वदा सर्वस्वरूप और कालरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। सर्वेश्वर शंकर! मेरी रक्षा कीजिये। सर्वव्यापी सोमेश्वर ! मेरी रक्षा कीजिये। जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है। मेरा मनोरथ पूर्ण कीजिये।'
इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर महेश्वरने नागराजको मनोवाञ्छित वर दिया, जो देवताओंसे शत्रुता रखनेवाले दैत्य, दानव तथा राक्षसोंके विनाशमें सहायक था। भगवान्ने शेषनागको शूल देकर कहा—'इससे अपने शत्रुओंका संहार करो।' भगवान् शिवकी यह आज्ञा पाकर शेषनाग सर्पोंके साथ रसातलमें गये। वहाँ उन्होंने शूलसे अपने शत्रु दैत्य, दानव तथा राक्षसोंका वध किया और फिर भगवान् शेषेश्वरका दर्शन करनेके लिये वे गौतमी-तटपर लौट आये। नागराज जिस मार्गसे आये थे, उसमें रसातलसे वहाँतक छेद हो गया था। उस बिलसे गौतमी गङ्गाका अत्यन्त पुण्यदायक जल पातालगङ्गामें जा मिला। इस प्रकार उन दोनोंका संगम हुआ। भगवान् शेषेश्वरके सामने एक विशाल कुण्ड बनाकर शेषनागने उसमें हवन किया। उस कुण्डमें सदा अग्निदेव स्थित रहते हैं। उसमें गङ्गाके जलका संगम होनेसे वह जल गरम हो गया। महायशस्वी शेषनाग महादेवजीकी आराधना करके पुनः अपने अभीष्ट स्थान रसातलमें चले गये। तबसे वह तीर्थ नागतीर्थ एवं शेषतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला, पवित्र तथा रोग और दरिद्रताका नाशक है। उससे आयु एवं लक्ष्मीकी भी प्राप्ति होती है। वह पवित्र तीर्थ स्नान और दानसे मोक्ष देनेवाला है। जो मनुष्य इस प्रसङ्गका भक्तिपूर्वक श्रवण, पाठ अथवा मनन करता है, उसकी सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं। जहाँ शेषेश्वरतीर्थ है और जहाँ शक्ति प्रदान करनेवाले भगवान् शिव हैं, वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर इक्कीस सौ तीर्थ हैं, जो सब प्रकारकी सम्पत्ति देनेवाले हैं।
अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ, धान्यतीर्थ और विदर्भा-संगम तथा रेवती-संगम-तीर्थकी महिमा
**ब्रह्माजी कहते हैं—**गोदावरीके उत्तर-तटपर अश्वत्थतीर्थ, पिप्पलतीर्थ और शनैश्चरतीर्थ हैं। उनका फल सुनो। पूर्वकालकी बात है—देवताओंने महर्षि अगस्त्यसे अनुरोध किया था कि आप विन्ध्यपर्वतको आदेश देकर ऊपर उठनेसे रोकें। महर्षि अगस्त्य धीरे-धीरे सहस्रों मुनियोंके साथ विन्ध्यपर्वतके समीप गये। उन्होंने देखा नगश्रेष्ठ विन्ध्य असंख्य वृक्षोंसे व्यास, सैकड़ों शिखरोंसे घिरा हुआ और बहुत ही ऊँचा है। ऊँचाईमें वह मेरुगिरि और सूर्यसे टक्कर ले रहा है। मुनिके आनेपर विन्ध्यपर्वतने उनका आतिथ्य-सत्कार किया। मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने सब ब्राह्मणोंके साथ